Saturday, 7 November 2020

धर्म हित

चलो मान लिया मैं  नफरत फैलाता हूं तो आप किस भाईचारे के भ्रम में जी रहे हैं?
     मैं विदेशी मज़हब और देश-धर्म-समाज के दुश्मनों से न केवल नफरत करता हूं बल्कि बिना किसी आर्थिक लाभ के नफरत फैलाता भी हूं और मरते दम तक फैलाता रहूंगा क्योंकि यही मेरी मातृभूमि, धर्म, समाज के प्रति मेरी प्रतिबद्धता का आईना है।
     अगर यह कानून विरुद्ध है तो देश-धर्म-समाज के लिये इस लचर कानून को तोड़ना मेरे लिये वैसा ही है जैसा की क्रांतिकारियों के लिये अंग्रेजी कानून तोड़ना था।
     अगर आपको लगता है कि मेरी यह नफरत देश के विकास में बाधा है तो आप स्वयं विचार कीजिये कि आप किन दुश्मनों के बीच फंसते जा रहे हैं और उनके साथ भाईचारे से देश को भविष्य में इस्लामिक बनाने से कहीं बेहतर है आज की आपकी नफरत!
     उस विदेशी अरबी मज़हब के प्रति मेरी नफरत है जिसका ध्येय वाक्य है 'दारुल इस्लाम' क्योंकि हमारा ध्येय वाक्य है 'सर्वधर्म सम्भाव' और इन दोनों विचारधाराओं का मेल असंभव है।
     मैं किसी ऐसे विदेशी मज़हब का यहां स्वागत कैसे कर सकता हूं जो मेरे धर्म का उनके यहां स्वागत नहीं करता और जिसका यहां आगमन प्रेम के संदेश से नहीं बल्कि तलवार के संदेश से हुआ हो! (712 ई. मोहम्मद बिन कासिम)
     जो क़ुरआन गैर-मज़हबियों को बुरा बल्कि वाजेबुल कत्ल तक कहती हो, मैं उस क़ुरआन को मानने वाले मज़हबियों को अच्छा कैसे कहूं?
     हां मैं नफरत करता हूं उन मुसलमानों से जो हिंदुस्तान के कन्वर्टेड हिंदुओं को 'अल-हिंद-मस्कीन' कहकर जलील करते हैं यानि मेरी नफरत रैबीज़ और उस रैबीज़ग्रस्थ भेड़िये से है जिसने मेरे डॉगी को काटा पर मेरी नफरत मेरे डॉगी से नहीं है।
     जब हम अंग्रेजों के शासन को उखाड़ फैंकने की क्षमता सिद्ध कर चुके हैं तो हम 'गजवा-ए-हिंद' को भी उखाड़ फेंकने की क्षमता रखते हैं यानि अगर इस्लाम गजवा-ए-हिंद तक भी पहुंच गया तो भी इस सनातन भूमि पर उसका अंत निश्चित है।
     जो देश आज अखंड नहीं और अलग हो चुके खंडों में हिंदू सुरक्षित नहीं तो अब कैसा और किससे भाईचारा?
     जो आपकी लड़की ले तो सकता है पर दे नहीं सकता उससे कैसा भाईचारा?
     जो आपको अपने मज़हब में शामिल करने के लिए हर प्रपंच कर सकता है पर उसका मज़हब छोड़ने वाले का कत्ल करने के लिये उसे ढूंढता है उससे कैसा भाईचारा?
     जो आपके हिंदू बहुल इलाके में आराम से रह सकता है पर उसके बहुल यानि कश्मीर घाटी में आपको नहीं रहने दे सकता उससे कैसा भाईचारा?
     जो आपके मंदिर, गुरुद्वारे के प्रांगण में नमाज पढ़ सकता है पर उसकी मस्जिद में आपको भजन-कीर्तन की अनुमती नहीं दे सकता उससे कैसा भाईचारा?
     जो आपके शासन में हज़ के लिये सब्सिडी लेता रहा पर उसके शासन में आपसे जजिया कर लेता रहा उससे कैसा भाईचारा?
     जो दिन में 5 बार आप ही पर अजाब डालने की अल्लाह से दुआ करता हो उससे कैसा भाईचारा?
     जो सनातनियों की इस भूमि पर शरिया लॉ, गजवा-ए-हिंद, निजाम-ए-मुस्तफा और दारुल इस्लाम की बात करता हो उससे कैसा भाईचारा?
     जिनका एक भी आदर्श यहां की सभ्यता-संस्कृति का कायल नहीं हो उनसे कैसा भाईचारा?
     जो आपके बहुसंख्यक होने पर आपको भाई कहते हों पर उनके बहुसंख्यक होने पर आपको काफिर कहते हों उनसे कैसा भाईचारा?
     जिनका आज तक का एक-एक वोट देश नहीं कौम की खातिर गया हो उनसे कैसा भाईचारा?😡😡
     भाईचारे से हुए हर नुकसान की भरपाई अब केवल नफरत की शुरुआत से ही संभव है,🙏🙏🚩🚩

Thursday, 1 October 2020

नेताजी सुभाष चंद्र बोस। ICS


जिस ICS की नौकरी के लिए लोग 4 साल तैयारी करते थे, नेताजी ने 7 महीने में क्लियर करके इस्तीफा दे दिया था।


दोस्तों क्या आपको पता है अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को ऑफर किया था कि यह जो सत्ता चल रही है इसमें हमारे साथ शामिल हो जाओ, तुम भी लूटो, हम भी लूटें. सारे क्रांतिकारियों ने साफ मना किया था कि तुम्हारी इस लुट की व्यवस्था में हमें शामिल नहीं होना, हमें तो संपूर्ण आजादी चाहिए. संपूर्ण स्वराज्य चाहिए और जिस क्रांतिकारी ने यह बात सबसे पहले कही थी उन्हीं का नाम था नेताजी सुभाष चंद्र बोस. क्या आपको मालूम है उनके जीवन की विडंबना क्या थी उनको आईसीएस (ICS) की नौकरी में सेलेक्ट होना पड़ा. उनके पिताजी की इच्छा की पूर्ति के लिए, क्योकि पिता जी चाहते थे कि मेरा बेटा कलेक्टर बने और बेटे को बार-बार वह ताना मारते थे कि तू बन नहीं सकता. तू होशियार कम है, तेरे पास तैयारी नहीं है, इसलिए बहाना बनाता रहता है. तो बेटे ने अपनी पात्रता सिद्ध करने के लिए परीक्षा दी और उस जमाने में आई सी एस की परीक्षा देने के लिए चार-चार साल लोग पढ़ाई करते हैं. नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सिर्फ 7 महीने पढ़ाई की थी और उतनी पढ़ाई में उन्होंने आई सी एस के टॉपर की लिस्ट में चौथी पोजीशन पाई थी. उस जमाने में आईसीएस टॉप करना किसी भारतीय लड़के के लिए संभव ही नहीं था, क्योंकि इस परीक्षा में अंग्रेज टॉप किया करते थे. वह पहले भारतीय व्यक्ति थे जिनको टॉपर लिस्ट में चौथा स्थान मिला।


एक बहुत मजेदार घटना है वह लंदन गए थे, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेकर आईसीएस की परीक्षा में बैठे थे. जिस दिन रिजल्ट आया, उनके सहयोगी रिजल्ट देखने के लिए गए थे, लेकिन वह नहीं गए तो उनके सहयोगियों ने नाम देखा तो कहीं नहीं मिला तो उनको आकर कहा कि तुम तो पास ही नहीं हुए तो उन्होंने कहा ठीक है कोई बात नहीं पास नहीं हुआ तो.

शाम को ब्रिटिश गवर्नमेंट के डिपार्टमेंट का सेक्रेटरी आया और नेताजी को बोला कि तुम्हारा नाम पास होने वालों में नहीं है, ऊपर वाली लिस्ट में है और वह लिस्ट अभी तक लगी नहीं है. अब सुभाष चंद्र बोस को दुविधा हो गई कि मैं तो आईसीएस हो गया. अब मुझे कलेक्टर होना पड़ेगा. कलेक्टर होने का मतलब भारतियों को लूटना पढ़ेगा, लूट का कुछ हिस्सा अंग्रेजों को देना पड़ेगा. तो उनके मन में यह शुरू हुआ कि या तो मैं इस लूट में शामिल हो जाऊं या लूट की व्यवस्था के बाहर निकल कर देश के लिए काम करूं

अंत में उनके दिल ने कहा कि तुमको तो लूट में शामिल नहीं होना है क्योंकि तुम्हारा जन्म इसके लिए नहीं हुआ है. उन्होंने नौकरी को रिजाइन कर दिया. जब उन्होंने इस्तीफा दिया था ब्रिटिश सिस्टम में हड़कंप मच गया था क्योंकि भारत के कई लड़के पहले आईसीएस बन चुके थे किसी में हिम्मत नहीं हुई थी इस्तीफा देने की. सुभाष चद्र बोस जी ने इस्तीफा दिया और इस्तीफे में उन्होंने लिखा कि मै इस तंत्र में शामिल इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि मेरी भारत माता की लूट के लिए यह तंत्र बना है और मैं मेरे देश को लुटू यह मेरा दिल मुझे गवाही नहीं देता. इसलिए मै छोड़ रहा हूं. नेताजी ने रिजाइन किया, बोरिया बिस्तर समेट के भारत आ गए, पिताजी के दिल पर वज्रपात हो गया कि बेटे ने आईसीएस को लात मार दी. तो बेटे ने पिता को समझाया कि मै हर बार इस नौकरी को तो लात ही मारूंगा. जब तक यह व्यवस्था भारत को लूटने की व्यवस्था है. मैं इसमें शामिल नहीं हो सकता.

इसलिए नेता जी ने आईसीएस को छोड़ा और जैसे ही आईसीएस छोडी उन्होंने तो सारा देश उनके लिए खड़ा हो गया. जब वह लंदन से वापस आए थे उस समय पानी के जहाज चला करते थे. बंबई में उतरे थे जो हुजूम बंबई में निकला था। वो तो गजब के लोग थे उन्होंने उसी दिन कह दिया था कि अब तो भारत आजाद हो जाएगा क्योंकि जब मुझे समर्थन देने के लिए इतने लोग भारत में है तो मैं जब गांव गांव जाऊंगा तब कितने लोग खड़े हो जाएंगे. उसी कॉन्फिडेंस से उसी आश्वासन पर उन्होंने आजाद हिंद फौज का गठन किया था. और जब फौज बनाई थी तब माताओं ने अपने मंगलसूत्र उतार के उन को दान किए थे. एक मां उनके पास आई थी अपने अंधे बेटे को लेकर कि इसको फौज में ले लो तो उन्होंने कहा इसको तो दिखाई नहीं देता तो बेटे ने कहा कि दिखाई तो नहीं देता लेकिन आप की फौज में आ जाऊंगा तो दुश्मन की एक गोली तो कम कर ही दूंगा. 
दोस्तों बहुत ही दुःख की बात है कि ये लूट का तंत्र आज भी चल रहा है, जो कानून अंग्रेज बनाकर गए थे वो आज भी चल रहे है।

Friday, 25 September 2020

आदर्श युवा

एक बात मेरी समझ में कभी नहीं आई कि 
ये फिल्म अभिनेता (या अभिनेत्री) ऐसा क्या करते हैं कि इनको एक फिल्म के लिए 50 करोड़ 
या 100 करोड़ रुपये मिलते हैं?

सुशांत सिंह की मृत्यु के बाद यह चर्चा चली थी कि 
जब वह इंजीनियरिंग का टॉपर था तो फिर उसने फिल्म का क्षेत्र क्यों चुना?

जिस देश में शीर्षस्थ वैज्ञानिकों , डाक्टरों , इंजीनियरों , प्राध्यापकों , अधिकारियों इत्यादि को प्रतिवर्ष 10 लाख से 20 लाख रुपये मिलता हो, 
जिस देश के राष्ट्रपति की कमाई प्रतिवर्ष 
1 करोड़ से कम ही हो-
उस देश में एक फिल्म अभिनेता प्रतिवर्ष 
10 करोड़ से 100 करोड़ रुपए तक कमा लेता है। आखिर ऐसा क्या करता है वह?
देश के विकास में क्या योगदान है इन भड़वों का? आखिर वह ऐसा क्या करता है कि वह मात्र एक वर्ष में इतना कमा लेता है जितना देश के शीर्षस्थ वैज्ञानिक को शायद 100 वर्ष लग जाएं?

आज जिन तीन क्षेत्रों ने देश की नई पीढ़ी को मोह रखा है, वह है -  सिनेमा , क्रिकेट और राजनीति। 
इन तीनों क्षेत्रों से सम्बन्धित लोगों की कमाई और प्रतिष्ठा सभी सीमाओं के पार है। 

यही तीनों क्षेत्र आधुनिक युवाओं के आदर्श हैं,
जबकि वर्तमान में इनकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगे हैं। स्मरणीय है कि विश्वसनीयता के अभाव में चीजें प्रासंगिक नहीं रहतीं और जब चीजें 
महँगी हों, अविश्वसनीय हों, अप्रासंगिक हों -
तो वह देश और समाज के लिए व्यर्थ ही है,
कई बार तो आत्मघाती भी।

सोंचिए कि यदि सुशांत या ऐसे कोई अन्य 
युवक या युवती आज इन क्षेत्रों की ओर आकर्षित होते हैं तो क्या यह बिल्कुल अस्वाभाविक है? 
मेरे विचार से तो नहीं। 
कोई भी सामान्य व्यक्ति धन , लोकप्रियता और चकाचौंध से प्रभावित हो ही जाता है ।

बॉलीवुड में ड्रग्स या वेश्यावृत्ति, 
क्रिकेट में मैच फिक्सिंग, 
राजनीति में गुंडागर्दी  -  
इन सबके पीछे मुख्य कारक धन ही है 
और यह धन उन तक हम ही पहुँचाते हैं। 
हम ही अपना धन फूँककर अपनी हानि कर रहे हैं। मूर्खता की पराकाष्ठा है यह।

*70-80 वर्ष पहले तक प्रसिद्ध अभिनेताओं को     
 सामान्य वेतन मिला करता था। 

*30-40 वर्ष पहले तक क्रिकेटरों की कमाई भी 
  कोई खास नहीं थी।

*30-40 वर्ष पहले तक राजनीति भी इतनी पंकिल नहीं थी। धीरे-धीरे ये हमें लूटने लगे 
और हम शौक से खुशी-खुशी लुटते रहे। 
हम इन माफियाओं के चंगुल में फँस कर हम
अपने बच्चों का, अपने देश का भविष्य को
बर्बाद करते रहे।

50 वर्ष पहले तक फिल्में इतनी अश्लील और फूहड़ नहीं बनती थीं।  क्रिकेटर और नेता इतने अहंकारी नहीं थे - आज तो ये हमारे भगवान बने बैठे हैं। 
अब आवश्यकता है इनको सिर पर से उठाकर पटक देने की - ताकि इन्हें अपनी हैसियत पता चल सके।

एक बार वियतनाम के राष्ट्रपति 
हो-ची-मिन्ह भारत आए थे। 
भारतीय मंत्रियों के साथ हुई मीटिंग में उन्होंने पूछा -
" आपलोग क्या करते हैं ?"

इनलोगों ने कहा - " हमलोग राजनीति करते हैं ।"

वे समझ नहीं सके इस उत्तर को। 
उन्होंने दुबारा पूछा-
"मेरा मतलब, आपका पेशा क्या है?"

इनलोगों ने कहा - "राजनीति ही हमारा पेशा है।"

हो-ची मिन्ह तनिक झुंझलाए, बोला - 
"शायद आपलोग मेरा मतलब नहीं समझ रहे। 
राजनीति तो मैं भी करता हूँ ; 
लेकिन पेशे से मैं किसान हूँ , 
खेती करता हूँ। 
खेती से मेरी आजीविका चलती है। 
सुबह-शाम मैं अपने खेतों में काम करता हूँ। 
दिन में राष्ट्रपति के रूप में देश के लिए 
अपना दायित्व निभाता हूँ ।"

भारतीय प्रतिनिधिमंडल निरुत्तर हो गया
कोई जबाब नहीं था उनके पास।
जब हो-ची-मिन्ह ने दुबारा वही वही बातें पूछी तो प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य ने झेंपते हुए कहा - "राजनीति करना ही हम सबों का पेशा है।"

स्पष्ट है कि भारतीय नेताओं के पास इसका कोई उत्तर ही न था। बाद में एक सर्वेक्षण से पता चला कि भारत में 6 लाख से अधिक लोगों की आजीविका राजनीति से चलती थी। आज यह संख्या करोड़ों में पहुंच चुकी है।

कुछ महीनों पहले ही जब कोरोना से यूरोप तबाह हो रहा था , डाक्टरों को लगातार कई महीनों से थोड़ा भी अवकाश नहीं मिल रहा था , 
तब पुर्तगाल की एक डॉक्टरनी ने खीजकर कहा था -
"रोनाल्डो के पास जाओ न , 
जिसे तुम करोड़ों डॉलर देते हो।
मैं तो कुछ हजार डॉलर ही पाती हूँ।"

मेरा दृढ़ विचार है कि जिस देश में युवा छात्रों के आदर्श वैज्ञानिक , शोधार्थी , शिक्षाशास्त्री आदि न होकर अभिनेता, राजनेता और खिलाड़ी होंगे , उनकी स्वयं की आर्थिक उन्नति भले ही हो जाए , 
देश की उन्नत्ति कभी नहीं होगी। सामाजिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, रणनीतिक रूप से देश पिछड़ा ही रहेगा हमेशा। ऐसे देश की एकता और अखंडता हमेशा खतरे में रहेगी।

जिस देश में अनावश्यक और अप्रासंगिक क्षेत्र का वर्चस्व बढ़ता रहेगा, वह देश दिन-प्रतिदिन कमजोर होता जाएगा। 
देश में भ्रष्टाचारी व देशद्रोहियों की संख्या बढ़ती रहेगी, ईमानदार लोग हाशिये पर चले जाएँगे व राष्ट्रवादी लोग कठिन जीवन जीने को विवश होंगे।

 सभी क्षेत्रों में कुछ अच्छे व्यक्ति भी होते हैं। 
उनका व्यक्तित्व मेरे लिए हमेशा सम्माननीय रहेगा ।
आवश्यकता है हम प्रतिभाशाली,ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, समाजसेवी, जुझारू, देशभक्त, राष्ट्रवादी, वीर लोगों को अपना आदर्श बनाएं।

नाचने-गानेवाले, ड्रगिस्ट, लम्पट, गुंडे-मवाली, भाई-भतीजा-जातिवाद और दुष्ट देशद्रोहियों को जलील करने और सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से बॉयकॉट करने की प्रवृत्ति विकसित करनी होगी हमें।

यदि हम ऐसा कर सकें तो ठीक, अन्यथा देश की अधोगति भी तय है।

Sunday, 13 September 2020

बेरोजगार युवा

आइये मिलकर बढ़ती बेरोज़गारी के कारणों पर एक नज़र डालें... 
आज के युवाओं की समस्या

किसी बेरोज़गार से सवाल करो...
1. मजदूरी  करोगे....? 
    - नहीं
2. दुकान पर काम करोगे..? 
    - नहीं
3. बाइक / कार का काम जानते हो..?
    - नहीं
4. बिजली मैकेनिक बनोगे...?
    - नहीं
5. पेंटिंग का काम आता है..?
    - नहीं
6. मिठाई बनाना जानते हो...? 
    - नहीं
7. प्राइवेट कंपनी में काम करोगे? 
     - नहीं... 
8. मूर्तियां, मटके, हस्तशिल्प वगैरह कुछ बनाना आता है? 
     - नहीं.
9. तुम्हारे पिता की ज़मीन है?
     - हाँ.
10. तो खेती करोगे ?
     - नहीं!!!! 

ऐसे 10 - 20 प्रश्न और पूछ लो जैसे - सब्ज़ी बेचोगे ? फ़ेरी लगाओगे? प्लम्बर, बढ़ई / तरखान, माली / बागवान, आदि का काम सीखोगे ??
      - सब का जवाब ना में ही मिलेगा।।

फिर पूछो...
11. भैया किसी  कला मे निपुण तो होगे...?
    - नहीं।। पर मैं B. A. पास हूँ , M.A. पास हूँ I    
      डिग्री है मेरे पास।।
12. बहुत अच्छी बात है पर कुछ काम जानते हो ? कुछ तो काम आता होगा सैकड़ों की संख्या में काम है ?
    - नहीं.  काम तो कुछ नहीं आता I😇

बताओ अब ऐसे युवा बेरोज़गार सिर्फ हमारे ही देश में क्यूँ है?
 क्योंकि हमारा युवा दिखावे की जिंदगी जीने का आदी हो गया है l यहां सबको कुर्सी वाली नौकरी चाहिए जिसमें कोई काम भी ना करना पड़े l ऐसा युवा सच में देश के लिए अभिशाप ही है l जहां अपनी आजीविका के लिए भी काम करने से हिचकिचाता है l
शर्म आनी चाहिए खुद की कमजोरी को बेरोजगारी का नाम देते हुए l
हर साल लाखों बच्चे डिग्री लेके निकलते है पर सच कहूँ तो सब के हाथ में काग़ज़ का टुकड़ा होता है हुनर नहीं l जब तक आप खुद में कुछ हुनर पैदा करके उसको आजीविका अर्जन में प्रयोग मे नहीं लाते तब तक ख़ुद को बेरोजगार कहने का हक़ नहीं है किसी का भी l
रही बात सरकारों की ये तो आती रहेंगी जाती रहेंगी कोई भी सरकार 100% सरकारी रोज़गार नहीं दे सकती l तो मेरे प्यारे देशवासियों, समय रहते भ्रामक दुनिया से निकलने का प्रयत्न करो और अपनी काबिलीयत के अनुसार काम करना शुरू करो l अन्यथा जीवन बहुत मुश्किल भरा हो जाएगा l
जापान और चाइना जैसे देशों में छोटा सा बच्चा अपने खर्च के लिए कमाने लग जाता है l और हम यहां 25-26 साल का युवा वर्ग केवल सरकारों की आलोचना करके समय की बर्बादी कर रहा है l कुछ नहीं होने वाला इनसे। कितने भी आंदोलन कर लीजिए किसी सरकार को कुछ फर्क़ नहीं पड़ने वाला l अंततः परिश्रम अपने आप को ही करना पड़ता है l 
किस्मत रही तो आपको भी जरूर सरकारी नौकरी मिलेगी l लेकिन सिर्फ इसके भरोसे मत बैठो l

Thursday, 10 September 2020

कंगना रनौत

जो कंगना राणावत कल तक एक फिल्मी कलाकार थी वो आज पूरे देश में राष्ट्रवाद और सनातन धर्म की आवाज बुलन्द करने वाली शेरनी बन गई है, केवल एक फिल्म में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का किरदार निभाने से ही किसी के अंदर देश धर्म और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की इतनी हिम्मत आ गई सोचो यदि 1947 के बाद से हमारे देश के बच्चों को किताबों हमारे महान पूर्वजों और सभ्यता व संस्कृति तथा सनातन धर्म की शिक्षा पढ़ाई गई होती, तो आज भारत के हर घर से राष्ट्रभक्त निकलते परंतु अफसोस यह है कि सत्ता में बैठे मुगलों की नाजायज औलादों ने हमे उनके बाप दादाओं के कुकर्मों के बारे में ही पढ़ाया, तथा फ़िल्मों ओर नाटकों में साधु को पाखंडी ठाकुर को बलात्कारी ओर सरदारों को बेवक़ूफ़ बताया गाया जिसका परिणाम यह हुआ कि भारत जैसे सनातन धर्म का मज़ाक़ बनने लगा ओर हम हिंदू भी इसे बेवक़ूफ़ों की तरह बस मनोरंजन समझ कर देखने लग गये जिसका परिणाम आज आपके सामने है, अब भी समय है सत्य को पहचाने । “one women army” 🔥

Wednesday, 9 September 2020

सरकारी का निजीकरण


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आप सुबह उठकर चप्पल पहनते हैं। वह निजी कम्पनी ने बनाया है।

फिर शौचालय जाते हैं, वह भी किसी निजी क्षेत्र ने ही बनाया है।

अब आप साबुन/ हैंडवाश से हाथ धोते हैं, वह भी निजी क्षेत्र ने बनाया है।

अब आप ब्रश उठाते हो और उस पर मंजन लगाते हो, वह भी निजी क्षेत्र ने बनाया है। 

अब आप बाहर निकलते हैं और तौलिये से मुंह पोछते हैं और सोफे/ कुर्सी पर बैठते है, यह भी निजी क्षेत्र ने बनाया है। 

इसके बाद अब आप मोबाईल चलाते हैं और तीव्र गति से फेसबुक देख रहे होते हैं, यह सब भी निजी क्षेत्र ने बनाया है।

अब आपकी पत्नी आपके लिये नाश्ता बना रही हैं, जो निजी क्षेत्र का ही है।

जिस बर्तन में परोसा गया और जिस बार से उसे धोया गया और धुलने के लिये जिसको रखा भी गया, वह सब भी निजी क्षेत्र के है।

अब आप नहाने जाते हैं और शैम्पू, बाडी वाश, रेजर का इस्तेमाल करते हैं, सब भी निजी क्षेत्र का है।

नहाने के बाद आप जो तेल, क्रीम, पाउडर, कंघा आदि इस्तेमाल करते हैं, वह सब भी निजी क्षेत्र का है।

उसके बाद आप जो कपड़े, बेल्ट, टाई, पर्स पहनते हैं, वह भी निजी क्षेत्र का है।

अब आप अपने गाड़ी, कार आदि को स्टार्ट करते हैं या फिर आटो, टेम्पो, रिक्सा पकड़ते हैं, वह भी निजी क्षेत्र का है। 

अब आप उन 1% लोगों में नहीं हैं, जो सरकारी नौकर हैं, तो आप जिस गली, मुहल्ले, दुकान, माल, आफिस में जा रहे हैं, वह भी निजी क्षेत्र का है।

आप दोपहर में जो टिफ़िन लेकर गये थे खाने के लिये, वह भी निजी क्षेत्र का है। 

दोपहर के बाद आप थोड़ा चाय सिगरेट काफी के लिये कार्यालय के बाहर आते हैं, वह भी निजी क्षेत्र का है।

अब संध्या हो आयी है, घर लौट रहे है, उसी निजी क्षेत्र के वाहन से...

घर में टीवी देख रहे हैं, कोई चैनल लगाया, पंखा चलाया, थकान मिटाई, यह सब निजी क्षेत्र का है। 

अभी अभी दूध वाले ने आवाज लगाई, कपड़े धोने वाला कपड़ा लेकर आया, यह सब निजी क्षेत्र के हैं। 

अब आप अपने बच्चो के साथ बैठे हैं, बच्चो को चकित करने के लिये आपने अचानक कुछ चाकलेट और खिलौने निकाले, यह सब निजी क्षेत्र के हैं। 

अब आप अपनी  पत्नी के साथ बच्चो कोलेकर जिस टेबल कुर्सी पर बैठकर खा रहे हैं, वह भी निजी क्षेत्र का है।

अब 09 बज चुके हैं। आप ने गलती से NDTV लगा दिया वहा रवीश कुमार प्रकट हुए, वह भी निजी क्षेत्र के हैं।

उन्होने बताया की मोदी निजीकरण करके देश बेच रहे हैं। 😂

अब आप अपने निजी पत्नी के साथ निजी क्षेत्र द्वारा बनाये बिस्तर और पलंग पर बैठकर इस निजीकरण से बेहद चिंतित हैं। आपकी रातों की नींद गायब है। 

ईश्वर आप का कल्याण करें।
 
सरकारों का काम नहीं है उद्योग चलाए, जो पूंजी लगा रहा है उसे ही उद्योग चलाने दे, दर्द उसे ही है जिसका कुछ अपना लगा हुआ है l

इस प्रेषिका (पोस्ट) को आप गर्व से विनिमय (शेयर ) करें ताकि जन जन तक मेरा ये संदेश पहुंचे और  इस प्रेषिका (पोस्ट) की सार्थकता सिद्ध हो ....

✍️✍️

Sunday, 6 September 2020

कोरोना महामारी

अगले 15 दिन कोरोना के संक्रमण में बेहद खराब होने वाले हैं। पॉजिटिव कैसे बढ़ेंगे। भारत पीक की ओर बढ़ रहा है। इंदौर में सब खोल दिया गया है और अब इस महामारी के फैलने की प्रोबेबिलिटी बेहद बढ़ गई है। 

आप सभी की जानकारी के लिए बता दूं कि इंदौर के सभी प्राइवेट हॉस्पिटल्स भरे हुये हैं। जी हां यह आपके लिए चेतावनी है। आप लाखों रुपये देकर भी बेड/ ICU नही जुगाड़ पाएंगे यह तथ्य है इंदौर का। और कड़वा सच यह भी है कि आप MY हॉस्पिटल में भर्ती होने का साहस भी नही जुटा पाएंगे। 

अब अच्छा यही है कि आप पूर्ण सावधानी, मास्क पहनना और फिजिकल डिस्टेंसिंग का पालन करें और बीमार न पड़े यही सबसे बड़ा इलाज है। 

अभी संक्रमण का दौर मध्यम वर्गीय और उच्च वर्गीय परिवारों, ऑफिस, संस्थानों में हैं और उन नई जगहों में है जहां कभी कोई हिस्ट्री नही रही। ऐसे ऐसे  परिवार और जगहों से कैसे आ रहे हैं जिनके बारे में।आप।सोच नही सकते। नेताओं का, अधिकारियों और व्यापारी इसकी गिरफ्त में हैं। जिसकी भी जांच हो रही है वह पॉजिटिव निकल रहा है। यदि ये बढ़ता रहा और आपको स्वास्थ्य सुविधा न मिली तो सोचिए क्या होगा। 

यदि आप बीमार हुए तो ध्यान रखिये होम आइसोलेशन के अलावा कोई चारा नही, वैक्सीन तो अगले साल के पहले नही आ रही। 

सिर्फ दो इंजेक्शन Remdesivir जैसे जिनकी भी बेहद शॉर्टेज है , इतनी कि मारामारी, ब्लैक सब चल रहा है, कुछ भी करने पर अस्पताल में पलंग की जुगाड़ भी न हो पाएगी। 

आज डॉ निशांत खरे साहब से चर्चा के दौरान भी यही बात सामने आई कि अगले 15 दिन बेहद चुनौतियों से भरे हैं । 50-55 से 250-300 तक तो आ ही गए हैं रोज़ाना के केसेस। 

भारत तेज़ी से संक्रमण के दौर में है। आपकी जरा सी भूल और असावधानी न सिर्फ आपको बल्कि घर के सभी सदस्यों पर भारी पड़ेगी। 

शहरी खाने , प्रदूषित हवा पानी, धूप न मिलना, AC की हवा ने आपकी इम्युनिटी तो पहले ही निचले स्तर पर ला दी है। 

अब सिर्फ 2 तरीके हैं, 1) मास्क हमेशा पहनना है, बात करते वक्त भी 2) फिजिकल डिस्टेंसिंग बनाये रखें, घर और ऑफिस दोनों में। 

बेहद चौंकाने वाले आंकड़े भारत से मिल रहे हैं अब रोज़ 90 हजार का आंकड़ा छू लिया है हमने। दुनिया में दूसरे नंबर पर है भारत कोरोना में। ज्यादा देर नही हम नम्बर 1 हो जाएं। आर्थिक कारणों से आपका बाहर निकलना अत्यंत आवश्यक हो सकता है पर लापरवाही आपके आर्थिक, सामाजिक दोनों जीवन को हिलाकर रख देगी। इसलिए ऐसे जिये जैसे रस्सी पर नट चलता है। 

चेतिये इसके पहले देर हो जाये।

Saturday, 29 August 2020

हम अभी कहाँ है ? हिंदू संगठित है या नही ? हमारा भविष्य के लिए कर्तव्य ?

जो कहने जा रहा हूँ, उसे दुर्बल चित्त वाले नहीं पढ़ें तो ही अच्छा!!
मैं नहीं चाहता, सरस्वती की प्रेरणा से आधी रात को जागकर लिखी जाने वाली इस पोस्ट की गंभीरता और महत्त्व को समझ ही नहीं सकें!
***
हम हिंदुओं में यह महारोग भर चुका है कि जब तक माँ बाप जीवित होते हैं, उस अवसर का लाभ स्वयं के भविष्य को शक्तिशाली बनाने की अपेक्षा मटरगश्ती और बेपरवाही में व्यय कर दिया जाता है।
जब बाप कमा रहा है, उसी अवधि में स्वयं को स्थापित करना बुद्धिमानी है।
लेकिन.... नहीं तब मौजमस्ती करेंगे, "जो होगा देखा जाएगा" के डायलॉग मारेंगे और जिन वर्जित गलियों में झांकना भी पाप है, एक बार कौतुक से ही सही, उधर टहल कर जरूर आएंगे!! क्योंकि अब्बा सब सम्भाल लेंगे न!!
***
सुशांत सिंह एक उदाहरण है, परिवार के होते हुए भी परिवार से दूर रहा। अपने क्या होते हैं?
अपनों के बीच होना क्यों जरूरी है?
परायों में अपने उपलब्ध रहना कितना जरूरी है?
बन्धु कौन है?
उत्सवे व्यसने प्राप्ते, दुर्भिक्षे शत्रु संकटे।
राजद्वारे श्मशाने च यो तिष्ठति स बन्धवः!!
खुशी में, गम में, अभाव में, संकट में, राज काज में, मृत्युस्थल तक जो साथ दे वह हमारा अपना है!!
हा दुर्भाग्य!! वह इंजीनियरिंग पढ़ गया लेकिन पंचतंत्र का यह वाक्य नहीं पढ़ा।
महत्त्व नहीं समझा। वह गलत लोगों से घिर गया और बेमौत मारा गया। समृद्धि, सफलता और यौवन में अंधा वह स्वयं को शेर समझ बैठा जबकि वह "उस_मासूम_मृगछौने सा था जो कस्तूरी के नशे में मस्त है और चारों तरफ हिंस्रपशु उसे घूर रहे हैं!
***
आज राष्ट्रभक्त लोग अपने सर्वोच्च संरक्षण में है, इससे बेहतर स्थिति इससे पहले तो नहीं ही थी, भविष्य में भी शायद ही हो!!
एक समय था जब भारत माता की जय और जय श्री राम भी नहीं बोल सकते थे।
"मैं हिन्दू हूँ" ऐसा कहने में संकोच होता था।
आज तो विरोधी भी कोट पर जनेऊ पहन रहे हैं। कालनेमियों ने रामनामी ओढ़ रखी है। जनता बहुत जल्दी समझ लेती है। मीडिया की मोनोपोली घट गई है। वामपंथी मंच से भगाए जा रहे हैं। सेक्युलरों को हार्ट अटैक आ रहे हैं।
हममें से बहुत लोग इसे सफलता का चरम समझते हैं।
लेकिन ऐसे अभियानों की प्रकृति समझिए!!
केंद्र-राज्यों में सत्ता होते हुए भी हिन्दू की स्थिति सुशांत सिंह के जैसी ही है। वह मुग्ध भाव से एक चमचमाते मंच पर खड़ा एक मस्ती में जी रहा है। जबकि बिल्कुल नीचे, जिहादी, सेक्युलर और वामपंथी भेड़िये सर ऊँचा कर एकटक घूरे जा रहे हैं!!
****
कल्पना कीजिए कि कल को मोदीजी हमारे साथ न रहे तो हमारी क्या दुर्गति होगी?
आपको संकेत समझ नहीं आ रहे!!
क्या नड्डा जी और अमितशाह के कार्य का अंतर दिखाई नहीं देता?
क्या जिस विशाल लक्ष्य, कल्पना और अपेक्षा का मन में सोचते हैं वह मात्र दो-तीन लोगों से हो जाएगा?
क्या आपके पास इतना समय है?
क्या मोदीजी की उदासी, बढ़ी दाढ़ी, उनके कुछ भूतकाल के कथन, ये सब कुछ कह नहीं रहे??
आज उनके रहते हुए ही ये चारों ताकतें जिस दरिंदगी, कमीनापन और निर्लज्जता से दुस्साहसी होकर हिंदुओं को कच्चा चबा जाने की दिन रात धमकी दे रहे हैं, एक छोटा सा अवसर मिलते ही ये और इनके पीछे की आसुरी शक्तियां पूरे वेग से टूट पड़ने वाली है!!
***
बुद्धिमानी तो यह है कि इन बचे हुए कुछ वर्षों में हिन्दू इतना सबल हो जाये, इतना आक्रामक हो जाए, इतना आत्मनिर्भर हो जाये, इतना द्युतिमान बन जाये कि तीन चार वर्षों में ही भेड़िये हतबल और हमारी चमक से चुंधिया कर वीर्यहीन होकर नष्ट हो जाएं।
बहुत तेजी से हर मोर्चे पर सिद्धता प्राप्त कर ली जाए। परकोटे के घाव भर दिए जाएं, कवच के बंध दृढ़ किये जायें। साम दाम दण्ड भेद पर साझा रणनीति तय कर दी जाए। अपनी दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त की जाय। छिद्रों को बन्द किया जाय।
आखिर हम किस चीज का इंतजार कर रहे हैं? सुरक्षा और रणनीति के विषय में क्यों नहीं सोचते? क्यों छोटी छोटी दुर्बलताओं के वश में अपने सुयोग को दुर्योग बनाने पर तुले हैं?
****
व्यक्ति हमेशा नहीं रहता। हम आप भी नहीं रहने वाले। बाप हमेशा नहीं रहता, उसके जाते ही भार उठाना ही पड़ता है।
यह तो सबने कहीं न कहीं देखा होगा कि "माँ-बाप के जीवित रहते जिन लोगों ने मटरगश्ती की और बाद में अचानक जिम्मेदारी आयी तो दिशाएं शून्य हो गईं", अपने पराए की पहचान ही न रही और बुरी गत देखकर दुनिया ने हँसी उड़ाई, कि # डोकरा_गया_और_डे
रा_बिखरा !!
डेरा बिखरते देर नहीं लगती। उसे संभाले रखना, भावी अनिष्ट से बचने की पूर्व तैयारी और पूर्व योजना बनाना भी समझदार लोगों का दायित्व है। गैर जिम्मेदार, शिकायती, काम बिगाड़ने वाले और रोंदू लोगों को दुनिया बाद में भी कुछ नहीं कहती। संसार यही पूछेगा कि तुम बैठे थे और ये हो कैसे गया?
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अवसर भी कभी कभी ही मिलता है। इतिहास के अनेक ऐसे प्रसंग हैं जब जरा सी असावधानी रखने के कारण पीढ़ियों तक रक्त के आंसू पीने पड़े। पर्वतारोही जानता है, जरा सी गलती की और हमेशा के लिए खाई में लुढ़क जाएगा। आज हरेक विशेषज्ञ इतिहास को लेकर यही भाषण देता है "अगर ये नहीं होता तो ऐसा होता, वैसा होता!" भूल गए क्या?
वो चूक करने वाले कौन थे? किसके पूर्वज थे? क्यों छोटी सी गलतियां भी नहीं सुधार सके?
वे हम ही थे। आज जैसे ही, बेपरवाह, जो होगा देखा जाएगा....का भावुक, गैर जिम्मेदार वाक्य रटने वाले, समय के महत्व को न समझ पाने वाले.... कब तक देखा जाएगा? क्यों देखा जाएगा? बाद में देखोगे, अभी क्यों नहीं देख लेते!!
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एक व्यक्ति कितना भी करे वह पर्याप्त नहीं होता।
जिन देशों को पेट्रोल आदि पड़ी निधि मिली, सम्भाल के अभाव में वे भी दरिद्र हो गए, जबकि इजरायल जैसे देश के पास कुछ नहीं था पर वह सिरमौर हो गया।
जिन समाजों के लिए एक व्यक्ति ने अपने अवतारी पराक्रम से सूरज चांद तारे तोड़कर गोदी में भर दिए, सावधानी के अभाव में यादव भी लुट पिट कर बिखर गए।
जिस ब्रिटेन की जमीन पर कभी सूर्यास्त नहीं होता था, आज उसे अपने मैनचेस्टर को ही बचाये रखने में समस्या आ रही है।
समय को भरोसो कोनी, कद पलटी मार जाए।
केवल नरेंद्र मोदी के भरोसे कब तक?
यह व्यक्ति इस युग का सर्वश्रेष्ठ कर रहा है।
पैरों में बड़े बड़े पत्थर बंधे हैं फिर भी दौड़ रहा है।
हाथों को कई रस्मो रिवाजों, संवैधानिक प्रावधानों ने रोक रखा है, तो भी ये कार्यरत हैं। इस कड़वे सच को अंगीकार कीजिए कि अब मोदीजी बहुत कम वर्ष हमारे साथ रहेंगे।बुद्धिमा
नी दिखाइए। मन को समझाइए कि हमेशा आज जैसी स्थिति नहीं रहने वाली। तब हमें क्या करना होगा?
वही आज करें। अभी से तैयारी करें।
जो कर रहे हैं, दूसरों को बताएं, सिखाएं, समझाएं कि क्या किया जा सकता है।
पूछें कि यह कैसे होगा?
कब तक बाप के माल पर मौज उड़ाते रहोगे?

Saturday, 18 July 2020

zest Square Electronics Fraud Business

दोस्तों आज आपसे एक फ्राड इंस्टाग्राम एकाउंट की बात कर रहा हूँ जो पूरी तरह से फ़र्ज़ी है वहाँ लोगो को नए नए ब्रांड के मोबाइल फोन को सस्ते में बेचने के नाम पर लोगो से ठगी की जा रही है। 

वर्तमान में उस एकाउंट द्वारा लगभग 260 लोगों से लाखों रुपये ली ठगी कर ली है। 

इनका पूरा टीम दिल्ली मुम्बई बेंगलुरू गुजरात मे फैला हुआ है जो ऑनलाइन मोबाइल के नकली बिल दिखाकर व दुसरो की पोस्ट फ़ोटो दिखा कर ठगी कर रहे है ऐसे लोगो से सावधान रहें

#ZestSquareElectronics 


वर्तमान में एकाउंट सस्पेंड कर दिया गया है। परंतु सावधान रहें 
ऐसी कोई भी लालच में आकर ऐसे लुटेरों के वश में न आये 

धन्यवाद जय हिंद

Thursday, 16 July 2020

भगवान की आरती विधि

आरती का अर्थ, विधि तथा महत्व :

व्याकुल होकर भगवान को याद करना, स्तवन करना।

आरती, पूजा के अंत में धूप, दीप, कर्पूर से की जाती है। इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। हिंदू धर्म में अग्नि को शुद्ध माना गया है। पूजा के अंत में जलती हुई लौ को आराध्य देव के सामने

एक विशेष विधि से घुमाया जाता है।

इसमें इष्टदेवता की प्रसन्नता के लिए दीपक दिखाने के साथ ही उनका स्तवन और गुणगान भी किया जाता है। यह उपासक के हृदय में भक्ति दीप प्रज्वलित करने और ईश्वर का आशीर्वाद ग्रहण करने का सुलभ माध्यम है।

आरती चार प्रकार की होती है

दीप आरती

जल आरती 

● धधूप, कपूर, अगरबत्ती से आरती 

पुष्प आरती

दीप आरती :- दीपक लगाकर आरती का आशय है, हम संसार के लिए प्रकाश की प्रार्थना करते हैं।

जल आरती :- जल जीवन का प्रतीक है। आशय है कि हम जीवन रूपी जल से भगवान की आरती करते हैं।

धूप,कपूर, अगरबत्ती से आरती:- धूप, कपूर और अगरबत्ती सुगंध का प्रतीक है। यह वातावरण को सुगंधित करते हैं तथा हमारे मन को भी प्रसन्न करते हैं।

पुष्प आरती :- पुष्प सुंदरता और सुगंध का प्रतीक है। अन्य कोई साधन न होने पर पुष्प से भी आरती की जाती है।

आरती एक विज्ञान है। आरती के साथ – साथ ढोल, नगाड़े, तुरही, शंख, घंटा आदि वाद्य भी बजते हैं। इन वाद्यों की ध्वनि से रोगाणुओं का नाश होता है। वातावरण पवित्र होता है। दीपक और धूप की सुगंध से चारों ओर सुगंध का फैलाव होता है। पर्यावरण सुगंध से भर जाता है।

आरती के पश्चात मंत्रों द्वारा हाथों में फूल लेकर भगवान को पुष्प समर्पित किए जाते हैं तथा प्रार्थना की जाती है।

पूजा में आरती का इतना महत्व क्यों हैं इसका जवाब स्कंद पुराण में मिलता है। पुराण में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता

पूजा की विधि नहीं जानता लेकिन सिर्फ आरती कर लेता है तो भगवान उसकी पूजा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेते हैं।

आरती करते हुए भक्त के मन में ऐसी भावना होनी चाहिए, मानो वह पंच-प्राणों की सहायता से ईश्वर की आरती उतार रहा हो।
घी की ज्योति जीव के आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानी जाती है। यदि भक्त अंतर्मन से ईश्वर को पुकारते हैं, तो यह पंचारती कहलाती है। आरती प्रायः दिन में एक से पांच बार की जाती है। इसे हर प्रकार के धार्मिक समारोह एवं त्यौहारों में पूजा के अंत में करते हैं।


आरती करने का समय :

1- मंगला आरती
2- शृंगार आरती
3- राजभोग आरती
4- संध्या आरती
5- शयन आरती

1- मंगला आरती :

यह आरती भगवान् को सूर्योदय से पहले उठाते समय करनी चाहिए।

2- श्रृंगार आरती :

यह आरती भगवान् जी की पूजा करने के बाद करनी चाहिए।

3- राजभोग आरती :

यह आरती दोपहर को भोग लगाते समय करनी चाहिए और भगवान् जी की आराम की व्यवस्था कर देनी चाहिए।

4- संध्या आरती :

यह आरती शाम को भगवान् जी को उठाते समय करनी चाहिए।

5- शयन आरती :

यह आरती भगवान् जी को रात्री में सुलाते समय करनी चाहिए।
एक पात्र में शुद्ध घी लेकर उसमें विषम संख्या (जैसे 3, 5 या 7) में बत्तियां जलाकर आरती की जाती है। इसके अलावा कपूर से भी आरती कर सकते हैं। सामान्य तौर पर पांच बत्तियों से आरती की जाती है, जिसे पंच प्रदीप भी कहते हैं।
आरती पांच प्रकार से की जाती है। पहली दीपमाला से, दूसरी जल से भरे शंख से, तीसरी धुले हुए वस्त्र से, चौथी आम और पीपल आदि के पत्तों से और पांचवीं साष्टांग अर्थात शरीर के पांचों भाग (मस्तिष्क, हृदय, दोनों कंधे, हाथ व घुटने) से
पंच-प्राणों की प्रतीक आरती मानव शरीर के पंच-प्राणों की प्रतीक मानी जाती है
आरती की थाली या दीपक को ईष्ट देव की मूर्ति के समक्ष ऊपर से नीचे, गोलाकार घुमाया जाता है। इसे घुमाने की एक निश्चित संख्या भी हो सकती है व गोले के व्यास भी कई हो सकते हैं।
इसके साथ आरती गान भी समूह द्वारा गाया जाता है (कई जगह गान गाने का विधान नहीं मिलता)। जिसको संगीत आदि की संगत भी दी जाती है। आरती होने के बाद पंडित या आरती करने वाला आरती के दीपक को उपस्थित भक्त-समूह में घुमाता है,
लोग अपने दोनों हाथों को नीचे को उलटा कर जोड़ लेते हैं व आरती पर घुमा कर अपने मस्तक को लगाते हैं। इसके दो कारण बताये जाते हैं।
एक मान्यता के अनुसार ईश्वर की शक्ति उस आरती में समा जाती है, जिसका अंश भक्त मिल कर अपने अपने मस्तक पर ले लेते हैं। दूसरी मान्यता के अनुसार ईश्वर
की नजर उतारी जाती है, या बलाएं ली जाती हैं व भक्तजन उसे इस प्रकार अपने ऊपर लेने की भावना करते हैं, जिस प्रकार एक मां अपने बच्चों की बलाएं ले लेती है। ये सांकेतिक होता है, असल में जिसका उद्देश्य ईश्वर के प्रति अपना समर्पण व प्रेम जताना होता है।

🙏🌹हर हर महादेव🌹🙏🏻

Tuesday, 7 July 2020

नेहरू की सच्चाई

मैं अपनी यह बहुत पहले लिखी पोस्ट फिर से पोस्ट कर रहा हूं क्योंकि एक मित्र एक पोस्ट पर बहस कर रहे हैं कि नेहरू को सिर्फ पहिया मिला था नेहरू ने मेहनत से उसे स्कूटर बनाया

कांग्रेसी और वामपंथी इतिहासकारों ने एक साजिश के तहत ये झूठ फैलाया है की नेहरु आधुनिक भारत के निर्माता है .... सच्चाई ये है की अंग्रेजो ने नेहरु को एक तेज रफ्तार में चलती गाड़ी का स्टीयरिंग थमाया था ..

भारत में पहला छोटा हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट अंग्रेजो ने दार्जिलिंग में 1897 में बनाया था जो 130 किलो वाट का था .. भारत में पहला बड़ा हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट मैसूर के राजा ने कोलर के खान से सोना निकालने के लिए कावेरी नदी पर शिवसमुद्रम फाल पर 1887 में बनाया जो 1902 में पूरा हुआ .. ये 6 मेगावाट का था .. इसका ठेका अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक को दिया गया था .. शीप से टरबाइन और अन्य साजोसामान आये फिर उन्हें सैकड़ो हाथियों पर लादकर साईट तक ले जाया गया था ..
आजादी तक भारत में कुल 230 छोटे बड़े पॉवर प्रोजेक्ट कार्यरत थे जिसमे कई कोयला आधारित थर्मल प्रोजेक्ट भी थे ..
दोराबजी टाटा ने 1910  में ही टाटा पावर नामक कम्पनी बनाई थी ... दोराबजी ने टाटा पॉवर द्वारा 1915 में महाराष्ट्र के खोपोली ने 72 मेगावाट का विशाल पावर प्रोजेक्ट बनाया .. टाटा पावर ने 1947 तक भारत में 23 बड़े पॉवर प्रोजेक्ट बना चुकी थी और बम्बई, दिल्ली और कोलकाता में इलेक्ट्रिक डिस्ट्रीब्यूशन नेट्वर्क बना चुकी थी 
भारत के हैदराबाद,  बीकानेर, जोधपुर, बडौदा, ग्वालियर सहित तमाम रियासतों ने अपने राज्यों में कई पॉवर प्रोजेक्ट बनवाये थे .. 
आपको जानकर आश्चर्य होगा की 1947 तक चीन भारत से पॉवर, रेल, सडक तथा सेना आदि तमाम क्षमताओ में काफी पीछे था .. 
अंग्रेजो ने नेहरु को चाय और काफी के विशाल बगान बनाकर दिए थे .. उन बागानों तक जो काफी दुर्गम पहाड़ो पर थे वहां अंग्रेजो ने सिचाई, रेल, सड़क आदि इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित किये थे ..
अंग्रेजो ने नेहरु को बीस विशाल बंदरगाह और 23 एयरपोर्ट बनाकर दिए थे .. 
अंग्रेजो ने भारत के हर इलाको में आधुनिक युनिवर्सिटी और कालेज खोले .. मद्रास दिल्ली मुंबई करांची में सेंट स्टीफ़न कोलेज, सियालकोट में मरे कोलेज, अजमेर में मेयो कालेज सहित पुरे भारत में 350 कालेज और 23 युनिवर्सिटी अंग्रेजो ने नेहरु को दिया था ..
• Serampore College: हावड़ा  Estd.: 1818.
• Indian Institute of Technology, Roorkee: Estd.: 1847.
• University of Mumbai: Estd.: 1857.
• University of Madras: Estd.: 1857.
• University of Calcutta: Estd.: 1857.
• Aligarh Muslim University: Estd.: 1875.
• Allahabad University: Estd-1887
• पंजाब विश्वविद्यालय – 1882 
• बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय -1916, युनिवर्सिटी ऑफ़ मैसूर -1916, पटना युनिवर्सिटी, नागपूर युनिवर्सिटी काशी विद्यापीठ सहित 49 बड़े विश्वविद्यालय थे .. 1947 तक भारत शिक्षा संस्थानों में तीसरे नम्बर पर था .
अंग्रेजो ने नेहरु को विशाल सेना दी थी .. ब्रिटिश इंडियन आर्मी 1895 में स्थापित हुई थी .. अंग्रेज आठ कमांड बनाकर गये थे जिसमे 2 पाकिस्तान में चले गये .. ब्रिटिश इंडियन आर्मी प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में बहादुरी से लड़ी थी .. अंग्रजो ने नेहरु को 45 सैनिक छावनियां और विशाल रोयल एयरफोर्स दिया था .. भारत विश्व में तीसरा देश था जिसने वायुसेना बनाया .. यानी चीन के पहले ही अंग्रेजो ने भारत को विशाल और आधुनिक वायुसेना बनाकर दी थी ..

आज देश में जितना भी रेलवे नेट्वर्क है उसका 67% 1947 तक बन चूका था .. भारत का ये विशाल रेल नेट्वर्क नेहरु का नही बल्कि अंग्रेजो का देन है .. उन्होंने विशाल नदियों पर पुल बनाये दुर्गम पहाड़ो को काटकर रेल लाइन बनाई .. भारत विश्व में चौथा देश और एशिया का पहला देश है जहाँ रेल चली .. भारत में 1853 को रेल चली .. जबकि इसके 30 साल बाद चीन में रेल चली ..

भारत में पहली लिफ्ट ओटिस कम्पनी ने 1890 में मैसूर पैलेस में लगाया था ...भारत में विशाल चाय बागन और सागौन के लकड़ी के बागान लगाने वाली कम्पनी पारसी वाडिया खानदान की थी जिसका नाम था बाम्बे बर्मा ट्रेडिंग कम्पनी लिमिटेड .. ये कम्पनी 1863 में बनी थी ..और एशिया की बड़ी कम्पनी थी ..

1865: ALLAHABAD BANK
1892: BRITANNIA INDUSTRIES LTD
1895: PUNJAB NATIONAL BANK
1897: CENTURY TEXTILES AND INDUSTRIES LTD
1897: GODREJ AND BOYCE MANUFACTURING CO. LTD
1899: CALCUTTA ELECTRICITY SUPPLY CORPORATION
1902: SHALIMAR PAINT COLOUR AND VARNISH CO.
1903: INDIAN HOTELS CO. LTD
1908: BANK OF BARODA
1911: TVS
1904: KUMBAKONAM BANK LTD
1905: PHOENIX MILLS LTD
1906: CANARA BANKING CORP. (UDIPI) LTD
1906: BANK OF INDIA
1907: ALEMBIC PHARMACEUTICALS LTD
1907: TATA STEEL LTD सहित चार सौ से ज्यादा बड़ी कम्पनियां 1947 में पहले बन चुकी थी ..और 80 से ज्यादा बैंक थे 

यानी चाहे शिक्षा हो या बैंकिग हो या इन्फ्रास्ट्रक्चर हो या रेलवे हो या उर्जा हो .. 1947 तक भारत हर फिल्ड में टॉप पर था .. फिर भी कांग्रेसी कहते है की नेहरु आधुनिक भारत के निर्माता है .. कांग्रेसी इस तरह से प्रचारित करते है जैसे 1947 तक भारत एकदम पिछड़ा था .. कोई स्कुल तक नही था .. लोग लालटेन युग में जीते थे .. फिर नेहरु आये और मात्र 2 सालो में भारत को आधुनिक बना दिया

Sunday, 14 June 2020

सुशांत सिंह राजपूत

सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या कर ली पर विशेष

कब किसके मन में क्या चलता है कोई
नहीं जानता, हमारा लक्ष्य यही होना
चाहिए कि कभी भी किसी को बुरा
भला ना कहें, जितना हो सके आपस
में प्रेम और सद्भाव रखें। कौन कब
चला जाएगा ये सिर्फ़ महादेव जानते
हैं। ईश्वर उनके परिवार को हिम्मत दे।

लाइम लाइट और चकाचौंध में जो
जितना ज्यादा भीड़ से घिरा होता है
उतना ज्यादा अकेला होता
है...आत्महत्या किसी बात का
समाधान तो नहीं...लोग खप जाते है
संघर्ष करते करते पर हिम्मत न
हारते..स्ट्रांग बनिये, औरों के लिए न
सही अपने लिए अपने हीरो बनिये,
अपने आप को आईने में देख कर
फील होना चाहिये आने दे जो भी
संकट आये,देख लेंगे, लड़ लेंगे...! 

एक बात तो क्लियर है जो जैसा
दिखता है वो वैसा एक्चुअल में होता नही है, बाहरी लाइम लाइट की
चकाचौंध में जीने वाले अक्सर अंदर
से बहुत ही अकेले होते है। भले ही
अरबो की संपत्ति अर्जित की हो परंतु
सब छोड़ कर निकल लिए। सोचता हूं
कि स्ट्रेस लेवल भी कितना हाई हुआ
होगा की ऐसे फैसले सेलेब्रेटी लेते है।

कभी कभी इंसान ना टूटता है ना
बिखरता है बस हार जाता है कभी
किस्मत से तो कभी अपनों से।

कारण तो नही पता बस यही बोल
सकते है कि कुछ अपनो का ही खेल
होगा बरना इतना अच्छा सितारा
दुनिया नही छोड़ता।

दिखाई बेसक किसी को न दे, पर
शामिल ज़रूर होता है,
हर खुदकुशी करने वाले का कोई न
कोई कातिल ज़रूर होता है।

संघर्ष जीवन बनाने के लिये होता तो
जी भी लेता,
जब संघर्ष रिश्तों से होने लगे तो वो
एक पल बर्दास्त ना कर सका।।

इंसान जब अपनी उम्र और अपनी
काबिलियत अधूरी छोड़ देता है तो
उसका दु:ख उन्हें भी होता है जो उस
व्यक्ति पर विश्वास करते थे।
 
मेरे जैसे कई लोग है जो सुशांत
राजपूत से काफी लगाव रखते थे,
उस मुस्कुराते चेहरे को देखो तो कभी
विश्वास ही नहीं हो सकता की इनको
भी कोई दुःख रहा होगा।

आपका ये फैसला बहुत से कलाकारों
के और आपको चाहने वालों के
हौसले तोड़ेगा। 
और सरफराज़ धोखा दे गया 

निष्कर्ष

हम हार जीत, 
सक्सेस फेलियर में 
इतना उलझ गए है, 
की ज़िन्दगी जीना भूल गए है! 
ज़िन्दगी में अगर कुछ सबसे ज़्यादा इम्पोर्टेन्ट है, तो वो है खुद ज़िन्दगी!

बहुत ही दुःखद 
ॐ शान्ति ॐ शान्ति ॐ शान्ति विन्रम श्रद्धांजलि 💐 

Thursday, 4 June 2020

चीन वायरस

कुछ वर्ष पहले डिस्कवरी चैनल पर मैं एक कार्यक्रम देख रहा था जो कि आहार खानपान आदि पर आधारित था ..........

हालाँकि इस तरह के कार्यक्रम में अपनी कोई विशेष रुचि तो नही फिर भी अनमने मन से देख ही रहा था।

तो उस कर्यक्रम में दिखाया गया कि केरल की एक महिला के घर कोई विशेष अतिथि आने वाले थे,
तो महिला ने विशेष अतिथि के लिए विशेष भोजन बनाने का विचार किया और चल पड़ी स्थानीय बाजार
कुछ विशेष खरीदारी करने ...........

वो गई एक माँस के बाजार में और

दुकानदार से पूछा -: कुटिपाई है ?

दुकानदार-: नही है ।

अब अपनी भी थोड़ी उत्सुकता जगी
कि ये कुटिपाई  क्या होता भई ?

उस महिला ने  10-12 दुकानों पर पूछा तब एक दुकानदार ने हामी भरी कि हाँ मेरे पास कुटिपाई है ......

और उसने महिला को कुटिपाई उपलब्ध कराया
और चैनल वालों ने कुटिपाई का वर्णन किया,
तब मैँ एकदम से सन्न रह गया !!!

 क्या होता है कुटिपाई ???????????

एक गर्भवती बकरी जिसका प्रसव का समय बिल्कुल  समीप हो मतलब एक या दो दिन में ही प्रसव होने वाला हो मतलब गर्भस्थ शिशु पूर्ण हो चुका होता है तब उस बकरी की हत्या करके उस गर्भस्थ शिशु को निकाला जाता है और वो होता है "कुटिपाई" !!!

फिर वो महिला बताने लगी कि
कुटिपाई बहुत स्वादिष्ट होता है नरम होता है,
जल्दी पकता है,
चबाने में आसानी होती है,
पचाने में आसानी होती है, 
ईट्स सो डिलिशियस !!!

और मैँ बैठा बैठा सोच रहा कि
इंसान और हैवान में क्या फर्क रह गया ?

मित्रों कुछ समय पहले शायद डिस्कवरी का ही एक वीडियो सामने आया था कि एक शेरनी ने एक मादा बन्दर का शिकार किया और जब उसका पेट फाड़ा तो उसमें से एक सम्पूर्ण शिशु बाहर आया तो शेरनी की ममता जाग उठी और शिशु को दुलारने लगी .....
और शायद उस शिशु का उसने पालन पोषण भी किया ।

अभी हाल में ही एक वीडियो आया जिसमे एक मगरमच्छ एक मादा हिरन को पकड़ लेता है कुछ देर दबोचने के पश्चात मगरमच्छ को अहसास होता है कि मादा हिरन गर्भवती है तो वो अपने जबड़े खोल उस मादा हिरन को आजाद कर देता है .............

 ये सब क्या है भई ????????

मनुष्य मनुष्यता भूल रहा सिर्फ जीभ के स्वाद के लिए उसे गर्भस्थ शिशु चाहिए ........

मनोरंजन के लिए एक हथिनी की क्रूर हत्या .............

और हाँ एक बात और याद आई ......
चीन का बेबी सूप ......
घिन्न आने लगी स्वयं को मनुष्य कहने में  ।
और दूसरी तरफ जानवर  क्या दिखा रहे वो देखिए ........

मतलब एक तरह से जानवर और मनुष्य एकदूसरे से अपना व्यवहार की  अदला बदली  कर रहे .......
क्या पृथ्वी का अंत निकट है ?
ये कोरोना ये आँधी तूफान बवंडर भूकम्प साइक्लोन  आदि ..........
रहने लायक नही रही ये पृथ्वी आओ करें आह्वान कि खोल दो तीसरी आँख हे नटराज.........
हो जाने दो ताण्डव फिर से .....

अब तो सच मे फट ही पड़े ये पृथ्वी और समा ले स्वयं में इस तमाम  प्रकृति  को ........ 
फिर से सृजन करें ब्रह्मा .......

नई धरती नया आसमान हो ।
  जहाँ इंसान का मतलब इंसान हो।।


Wednesday, 3 June 2020



केरल में 100% साक्षरता है,
जागरूकता 0% है,
"अरब वेस्ट लेफ्ट' कट्टरता क्रूरता तो 786% है।
पूरे राष्ट्र में दारू पीने में नम्बर 1 राज्य है,

पूरे राष्ट्र में सबसे अधिक अपराध , राजनैतिक हत्याएं वही होती है।

केरल में हिन्दु अब राजनीतिक रूप में अल्पंसख्यक है।
केरल में धर्मातरण सबसे अधिक हो रहा है।

केरल में जानवरों के ऊपर होती हिंसा कोई नई बात नही है। गर्भवती हथनी को पटाखों से भरा हुआ अनानास फल खिला दिया जो मुँह में ही फट गया , खून अधिक बहने से गर्भवती हथनी की मृत्यु हो गई, जिस इलाके में हुआ वहाँ 70% मजहबी है, वहाँ पहले भी कुत्ते बिल्ली पक्षी आदि की हत्या होती रही है, कुछ दिन पहले भी वहाँ एक हाथी मारा गया था।

सिर्फ अंग्रेजी भाषा का ज्ञान होना इसका मतलब 100% साक्षरता नही है। भारत मे अंग्रेजी भाषा अब स्टेटस सिंबल बन गया है जबकि असल मे यह सिर्फ गुलाम मानसिकता का स्टेटस सिम्बल है। अंदर से खोकले किरदार है।

आज भारत के अधिकतर पढे लिखे युवाओ को कम से कम 3 भाषाओ का ज्ञान है - क्षेत्रीय/राज्य भाषा, हिन्दी, अंग्रेजी। हमको इस बात पर गर्व होना चाहिए जबकि 'अमेरिका ब्रिटैन' की जनता को सिर्फ अंग्रेजी ही आती है। अंग्रेजी भाषा हमको अमेरिका आदि से व्यापार करने में मदद करती है।

"जापान यूरोप चीन" आदि राष्ट्र अपनी अपनी भाषाओ को बोलते है। वह सब विकसित राष्ट्र बने, वह अंग्रेजी सीखने बोलने से विकसित राष्ट्र नही बने, उनको अपनी "मातृभाषा राष्ट्रभाषा संस्कारो रीति रिवाजों पूर्वजो" पर गर्व था, उस आत्मविश्वास की वजह से आगे बढे।

'जापान जर्मनी इटली' तो WW2 में तानशाह राष्ट्र थे, वह WW2 में पूर्ण रूप से बर्बाद हो चुके थे परन्तु उन्होंने अपने इतिहास को अपना वर्तमान कभी नही बनने दिया। वह लोकतांत्रिक बने, वह विकसित राष्ट्र बने, पिछली गलतियों से सीख कर खुद में निरन्तर सुधार करते रहे ओर आगे बढे। वह अंग्रेज नहीं बने, वह इस बात को समझे कि गलती उस समय के तानाशाह नेतृत्व एवं तनाशाह सत्ता पक्ष की थी, गलती कभी भी हमारे "राष्ट्र समाज जनता पूर्वजो संस्कारो भाषा" की नही थी।

परन्तु हम उस बात को क्यूँ नही समझते, हमारे भारतिय समाज में जातिवाद एक भयंकर समस्या है, यह समस्या "अरबी आक्रमणकारियों, मुग़लो अंग्रेजो" के 1200 साल के शासन में खत्म क्यूँ नही हुई?? क्योंकि इनका मकसद ही हर समस्याओ को विकराल रूप देना था, गुलामो का कभी कोई विकास नही करता, गुलामो का सिर्फ शोषण होता है।

पहले शरीरिक गुलामी होती थी, अब मानसिक गुलामी होती है। शरीरिक गुलामी में कोहलू के बैल की तरह काम लिया जाता है जबकि मानसिक गुलामी में "मुर्गी बकरे" की तरह पिंजरे जंजीर में रख कर 'दाना चारा' खिला कर एक दिन हलाल किया जाता है।

मानसिक गुलामी में सच्चाई जीवन के अंतिम क्षणों में पता चलती है और शरीरिक गुलामी में सच्चाई हर क्षण पता चलती है।

शरीरिक गुलामी से व्यक्ति तो आजाद हो सकता है परन्तु मानसिक गुलामी से व्यक्ति को मृत्यु ही आजाद करवाती है।

परन्तु जागरूकता से अगर "मन और मस्तिष्क" के बंद दरवाजे खुल जाए, फिर व्यक्ति सत्य को 'देखना समझना जानना अपनाना' सीख जाए तो ही मानसिक गुलामी से बचा जा सकता है।

केरल में दारू पीने वाले 90% हिन्दू है जो अधिकतर वामपंथी है, नास्तिक होना फैशन है, नास्तिक बन कर सिर्फ हिन्दुओ को गाली दो, अरब वेस्ट को ताली दो, जब इनकी दारू पीकर जिंदगी होती बर्बाद, तब शरू होता अरब या वेस्ट में धर्मातरण का काम, इनकी महिला बच्चे जाते फादर या लोलवी के पास क्योंकि बापू है बेवड़ा नही अब किसी भी काम का।

आर्थिक रुप से बर्बाद परिवार की महिला बच्चो को तब ठेकेदार धर्मातरण भत्ता देते ताकि गुजर जाए इनका कठिन समय ताकि अगली पीढ़ी जब बड़ी हो तो वह अपनी कमाई से देगी इनको हर महीने दान। देखो, चल पड़ी दुकान। कुछ साल की इन्वेस्टमेंट, बाद में पूरी उम्र की कमाई। 

यही पंजाब में हो रहा है, दारू नशा पानी की तरह बिक रहा है, युवा और उनके परिवार बर्बाद हो रहे है, बर्बाद हुए परिवार ही धर्मातरण का शिकार हो रहे है। पँजाब अगले 15 वर्षो में अब भविष्य का केरल है।

पँजाब में 70% रिज़र्व समाज को वेस्ट में धर्मातरण करवाया जा रहा है। मुफ्त अंग्रेजी कान्वेंट शिक्षा का लालच आदि चीजो से प्रलोभन दिया जा रहा है। धर्मातरण की दुकान कुनबों के शासन में खुलेंआम काम करती है, भगवा (अकाली भाजपा) के शासन में छुप कर काम करती है।

यह कोई निस्वार्थ समाज सेवा नही है, यह तो मदद करने के बाद फिर धर्मातरण करके उनके अहसान का बदला चुकाने वाली बात है।

धर्मातरण के बाद इनको अपने पुराने "संस्कारो रीति रिवाजों राष्ट्र" के खिलाफ 'नफरत झूठ जहर' को भरा जाता है। हर शुक्रवार या रविवार इनका ब्रेनवाश किया जाता है, इनको कट्टरपंथी अलगावादी बनाया जाता है।

धर्मातरण के बाद सिर्फ एक हिंन्दु परिवार कम नही होता है बल्कि एक कट्टरपंथी परिवार का जन्म होता है जो अगली कई पीढ़ियों तक समाज मे हिन्दुओ और राष्ट्र के प्रति नफरत जहर को ही फैलायेगा।

इस कुकर्म मे जातिय ठेकेदार भी मिले होते है, उनको लोलवी - मादरी द्वारा अधिक से अधिक जनता को धर्मातरण करवाने के बदले माल में हिस्सा मिलता है। नेताओ को बना बनाया वोट बैंक मिलता है। ठेकेदार बस किसी बर्बाद परिवार को ढूंढते है, उसकी मजबूरियों को अपना फायदे के लिए उठाते है। यह समाजसेवा के नाम पर सिर्फ धर्मातरण का धंधा है।

इसका एक ही उपाय है कि हिन्दुओ (सनातन, सिख, जैन, बौद्ध, आर्य समाज आदि) अधिक से अधिक गरीब और बर्बाद हुए परिवारों की मदद करे। मुफ्त अच्छी शिक्षा स्वस्थ्य आदि उपलब्ध करवाए, इससे पहले की धंधे वाले इनको अपने कब्जे में कर ले, सेवा वालो को इनकी मदद करनी चाहिए।

सरकार अधिक से अधिक 'धर्मातरण विरोधी' कानून ले आएगी, तब भी धर्मातरण का काम छुप छुप कर होगा, वह नाम हिन्दू ही रखेगे परन्तु काम अरब वेस्ट के करेगे, एक दिन जब संख्या बल उनके पास होगा, तब सरकार बदल कर कानून को भी बदल देंगे।

Saturday, 16 May 2020

कोरोना वैश्विक महामारी के कारण पलायन कर रहे मजदूरों के बारे में चर्चा करते है।
लोगों के पलायन के जो दृश्य लगातार सामने आ रहे हैं उसे देख कर द्रवित होना स्वाभाविक है। इस दृश्य को देखते ही कई सवाल दागे जाते हैं कि , देखो सरकार कितनी निष्ठुर है,,, गरीब की किसी को चिंता नहीं है,,, लोग भूख प्यास से मर रहे हैं किसी का ध्यान नहीं है,,,, हवाई जहाज से विदेशों में बैठे लोगों को लाया जा सकता है तो इन गरीबों को घर तक क्यों नहीं पहुंचाया जा सकता?? आदि आदि कई सवाल होते हैं,,

अब मैं जो बात लिखूंगा वह आपको असहज कर सकती है, बुरी लग सकती है, मुझे अंधभक्त की उपाधि दिला सकती है और साथ ही मेरी संवेदनशीलता पर भी सैकड़ों प्रश्न खड़े कर सकती है, फिर भी अपनी बात लिख रहा हूं।।

आखिर इन सवालों में सिर्फ सरकार को निशाना बनाना कहां तक उचित है क्या इस देश के लोगों की देश के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है,,,

लॉर्ड थॉमस बेबिंगटन मैकाले ने 2 फरवरी 1835 को ब्रिटेन की संसद में कहा था कि

"मैं भारत के कोने कोने में घूमा जहां मुझे एक भी व्यक्ति ना तो भिखारी मिला ना चोर मिला। भारत के लोग गुणवान और ऊंचे चरित्र के हैं क्योंकि वहां की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत इतनी उन्नत है कि उसे नष्ट किए बिना भारत को गुलाम बनाना संभव नहीं है"
और उसके बाद लॉर्ड मैकाले ने शिक्षा पद्धति लागू करते हुए लिखा कि "जो शिक्षा पद्धति मैं लागू कर रहा हूं उसके पाठ्यक्रम के अनुसार यहाँ के शिक्षित युवक देखने में हिंदुस्तानी लगेंगे किंतु उनका मस्तिष्क अंग्रेजियत से भरा होगा।"

अब_विषय_पर_आते_हैं,,,

जो मजदूर ट्रकों में 3000 से 8000 रुपए और इससे अधिक भी किराया देकर जा रहे हैं।
इतने पैसों के होते हुए वो भूख प्यास से परेशान कैसे हो सकते हैं?

सरकार ने तो कहा था कि जो जहां है वहीं रहे। तीन महीने का राशन भी दिया है, प्रत्येक शहर में स्थानीय प्रशासन और जो समाजसेवियों की भरमार है वो किसी को भूखा नहीं सोने दे रहे हैं तो यह तो साफ है कि इन्हें भूख के कारण पलायन करने विवश नहीं होना पड़ा। कई वर्षों से काम कर रहे अनेक मजदूर तो अपने घर भी बसा चुके थे।

लेकिन बीमारी के भय से और भविष्य की अनिश्चितता को देखकर चलने वाली अफवाहों ने पलायन की भेड़ चाल को विभीषिका में बदल दिया।

अब सोचिए कि ये गांव आकर आखिर कर क्या लेंगे? क्योंकि गांव में काम न होने से ही तो अन्य जिलों या प्रदेशों में गए थे। और क्या इनके गांव में बीमारी और संक्रमण का खतरा नहीं है? जब पूरी दुनिया इस बीमारी से अछूती नहीं है, भारत अछूता नहीं है, जो हाल अभी ये लोग जहां थे वहां का है वही हाल गांव का है, तो फिर वापस लौटने का मकसद क्या ? सिवाए भय और अज्ञानता के!!
अब यह जरूर हो गया है कि अभी तक संक्रमण से मुक्त रहे गांवों में भी संक्रमण का खतरा इन्होंने पैदा कर दिया है।

लोग इधर उधर न जाएं, संक्रमण न फैले इसलिए सरकार ने पब्लिक ट्रांसपोर्ट बन्द किए थे। लॉकडाउन का भी उद्देश्य यही है।

सरकार लोगों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने की व्यवस्था कर रही है। 10 मई तक ऐसे 5 लाख मजदूरों को सरकार ने अपने खर्चे पर गंतव्य तक पहुंचाया भी और इस तारीख तक सिर्फ चार हजार व्यक्तियों को ही विदेशों से विमान से स्वदेश (भारत) लेकर आए। संक्रमण न फैले इसलिए इन सभी को क्वॉरेंटाइन कराया गया। सरकार के यह प्रयास अभी भी जारी है लेकिन फिर भी मजदूर मानने तैयार नहीं है।

भारत के भीतर एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश या एक जिले से दूसरे जिले में फंसे होना और विदेशों में फंसे होना दो अलग अलग बातें हैं, दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। विदेश में फंसे रहना अधिक तकलीफ दायक है, वहां कोई अपना नहीं है ना सरकार, ना धर्म, ना धरती, ना जात, ना लोग।

यहां यह भी समझ लें कि विदेशों से आने वालों को क्वॉरेंटाइन करने के एवज में शुल्क लिया गया है। जबकि गरीबों से परिवहन का किसी तरह का कोई शुल्क नहीं लिया गया फिर चाहे किराया केंद्र_सरकार ने दिया हो, प्रदेश सरकार ने दिया हो, या कथित तौर पर हल्ला मचाने वाली कांग्रेस ने दिया हो,,,

लेकिन इन गरीब मजदूरों को सरकार की कोई बात नहीं मानना, इसलिए दस और पंद्रह गुना किराया देकर लोडिंग वाहनों में ठसाठस भरकर आ रहे हैं। सरकार को सूचना नहीं दे रहे, स्क्रीनिंग और क्वॉरेंटाइन से बचना चाह रहे हैं। अब सरकार क्या करे ?? विपक्ष तो सरकार के सिस्टम को फेल करने पर आमादा है ही उसे किसी के जीवन मृत्यु से कोई लेना देना नहीं है, उसका मकसद त्रासदी में भी राजनीति के सुनहरे अवसर तलाशना है।।

यदि सरकार इस पलायन को रोके तो कहा जाएगा कि मजदूरों की, गरीबों की सुनवाई नहीं हो रही। यानि जिन्हें सरकारों कोसना है वो हर हाल में सरकार को कोसेंगे।

इस भीड़ को देखकर सामान्य बुद्धि का आदमी भावुक है।
भावुक और भड़भडिया लोग भी  शाब्दिक कोहराम मचाने में लगे हैं।।

ऐसे लोग ताना भी दे रहे हैं कि हमने सड़कों पर देखा है,,, हमने मजदूरों से बात की है,,, तुम क्या जानो उनका दर्द,,, घर में बैठे-बैठे बातें कर रहे हो। कुछ तो यहां तक बोलते हैं कि सच को सच कहना सीखो भाई साहब,,

जिन्हें सन 1947 के विभाजन के समय हिंदु मुस्लिम दंगों की वास्तविक त्रासदी नहीं पता कि उस समय 10 लाख हिंदू मारे गए थे और 75 हजार माता बहनों को अगवा कर लिया गया था वो भी कह रहे हैं कि सन 47 से बुरी हालत है।।

ठीक है भाई तर्क के लिए सारी बात मान ली,, लेकिन इसके लिए  जिम्मेदार कौन है???

ऐसे में यदि हम गहराई से सोचें और पूरे विश्व के हालातों पर नजर डालें, विकसित, अति विकसित देशों की स्थिति देखें तो हम पाएंगे कि इस महामारी से सरकार को नहीं जनता को ही निपटना होगा।

सरकार केवल बचाव के उपाय सुझाने, लोगों में जागरूकता लाने और उपलब्ध संसाधनों का अधिक से अधिक उपयोग करते हुए लोगों के कल्याण के उपाय कर सकती है इससे अधिक कुछ नहीं।

यह स्थिति ठीक वैसे ही है जैसे परिवार के किसी आयोजन में 500 लोगों को न्यौता दिया जाए और अचानक 2000 लोग आ जाएं। ऐसे में सभी के खाने-पीने, लाने ले जाने, रुकने की व्यवस्था मिनटों में नहीं हो पाएगी।

दरअसल गरीब और मजदूर सरकार की सुनने के लिए तैयार नहीं है, उनके सामने भी परिस्थिति विकट है। मकान किराया देने की स्थिति ना होने से, रोजगार का भविष्य अंधकार में दिखाई देने से या अन्य कारणों से ऐसे लोग सरकार की व्यवस्थाओं पर अविश्वास करते हुए अफवाहों का शिकार होकर तमाम प्रतिबंधों के बाद भी अपने घर लौट रहे हैं। ऐसे में सड़क पर सुविधाएं उपलब्ध कराना बहुत मुश्किल है।

फिर भी इस परिस्थिति को देखकर  पेट्रोल पंपों पर पानी और कुछ न कुछ खाने की व्यवस्था सरकार ने की है।

कड़वी बात_यह है कि गरीब तो अभी जहां था वहां भी गरीब था अब जहां जा रहा है वहां भी गरीब रहेगा।

...तो फिर वो जहां था वही रहता और वहीं रहकर सरकार से लड़ता तो, ना पलायन की त्रासदी झेलना पड़ती और ना देश के लिए संकट की स्थिति बनती। लेकिन इतना कठोर सोचने के लिए ना तो गरीबों की सोच विकसित हो पाई और ना ही हम जैसे भावुक लोगों की क्योंकि हम मैकाले के कथन अनुसार जीवन जी रहे हैं।

आज देश के हर नागरिक की जिम्मेदारी यह है कि वह किसी भी स्थिति में कोरोना को फैलने से रोके फिर वह चाहे गरीब हो या अमीर जो कोरोना फैलाने की स्थिति निर्मित करेगा वह कहीं ना कहीं गलती ही कर रहा है।
आज सभी को सैनिक जैसी सोच रखने की जरूरत है।

शायद आज मेरी यह बात भावुक मन से समझ में ना आए लेकिन एक दिन इसे समझना ही होगा।

अब इस तरह सोचें

यदि सैनिक भी अपना घर, अपना गांव, अपना परिवार, अपना भविष्य, और सिर्फ अपने जीवन के बारे में सोचने लगेगा तो देश का क्या होगा???

सरकार के प्रतिबंधों के बाद भी जत्थे के जत्थे जाते देखकर यदि नाको पर खड़े पुलिस के जवान भी सोचने लगें कि जब लोग मानते ही नहीं तो हम यहां क्यों खड़े रहें, तब क्या होगा??

संक्रमण छुपाकर या संक्रमण फैला कर इधर उधर जा रहे लोगों को देखकर डॉक्टर कह दें कि जब इन्हें मरना ही है ये नहीं सुधर रहे तो हम जान जोखिम में डालकर इलाज क्यों करें, तब क्या होगा??

यदि सभी लोग केवल खुद के बारे में सोचने लगे और देश के सिस्टम को बिगाड़ने पर उतारू हो जाएं तो इस देश को सरकार तो ठीक है भगवान भी नहीं बचा सकते।।

इस देश के हर नागरिक को देश के प्रति जागरूक होना पड़ेगा फिर वह अमीर हो, गरीब हो, दलित हो, सवर्ण हो, अधिकारी हो या कर्मचारी हो।

(नोट - मेरे इस लेख से सहमत होना जरूरी नहीं है, लेकिन उम्मीद है कि इसे पूरा पढ़ने पर आप भावुकता को त्याग कर, सैनिक मन से विचार अवश्य करेंगे।)


Wednesday, 29 April 2020

किसी कांग्रेस पोषित एक्टिविस्ट ने एक आरटीआई फाइल करी थी, उसके मुताबिक सरकार ने 68000 करोड़ रुपया कॉरपोरेट्स का माफ़ कर दिया! (ध्यान रहे "माफ़" शब्द का इस्तेमाल सरकार के खिलाफ प्रोपोगंडा के तहत किया जा रहा है जबकि सही शब्द "राइट ऑफ" होता है)

इन एक्टिविस्ट महोदय का कहना है कि संसद में फरवरी 2020 में अनुराग ठाकुर से जब एनपीए पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने जवाब नहीं दिया इसका, जिसके कारण ये आरटीआई फाइल की थी और इसमें पता चला कि सितम्बर 2019 तक 68000 करोड़ रुपया कॉरपोरेट्स का माफ़ (राइट ऑफ) कर दिया गया है जिसमें मेहुल चौकसी आदि कई डिफॉल्टर्स शामिल है!

ये पूरी तरह से एक प्रोपोगंडा है जिसे बड़ी चालाकी से आरटीआई की आड़ में प्लांट किया गया है!

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जी 2019-20 के बजट सत्र में 5 जुलाई 2019 को एनपीए के विषय में जानकारी दे चुकी है! "Non-performing asset (NPAs) have been down by Rs 1 lakh crore in the last one year and there is recovery of Rs 4 lakh crore over the last four years in NPAs"

आप ये भी जानकर हैरान हो जाएंगे कि कांग्रेस के मात्र 6 सालों में 2008-2014 तक लगभग 36 लाख करोड़ रुपया बैंकों द्वारा कॉरपोरेट्स को दिए गए! जबकि 1947-2008 तक बैंकों ने मात्र 18 लाख करोड़ रुपए का ऋण बांटा था! इसका जिक्र स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने किया है!

आप ये भी जानकर हैरान हो जाएंगे कि कांग्रेस ने जब मोदी जी को सत्ता सौंपी तब बैंकिंग सेक्टर लैंडमाइन पर बैठा था, पूरी तरह बर्बाद हो चुका था!

जब मोदी सरकार सत्ता में आई तो सरकार ने बैलेंस शीट को क्लियर करने के लिए 2015 में आरबीआई से एसेट क्वालिटी रिव्यू (AQR) करने को कहा!

आप ये भी जानकर हैरान हो जाएंगे कि जब कांग्रेस ने मोदी सरकार को सत्ता सौंपी थी तो कुल एनपीए 2 या 2.5 लाख करोड़ बताया था! इसका जिक्र स्वयं प्रधानमंत्री भी कर चुके है।

जब पारदर्शी जांच हुई तो परिणाम में जो आंकड़े एनपीए के रूप में सामने आए वो चौंकाने वाले थे! आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार एनपीए:

31 मार्च 2015 : 2,67,065 करोड़ से बढ़कर
31 मार्च 2018 : 8,45,465 करोड़ हो गया

इसका कारण भी पीएम मोदी बता चुके है, बहुत से बैंक अधिकारियों की मिली भगत के कारण बहुत से मामले दबाए गए थे, ईमानदारी से जांच हुई तो वास्तविक शुद्ध एनपीए निकल कर बाहर आया!

सरकार की मान्यता, संकल्प, पुनर्पूंजीकरण और सुधारों की 4R की रणनीति के परिणामस्वरूप एनपीए 1,35,366 करोड़ घटकर:
31 मार्च 2019 : 7,10,109 करोड़ रुपए हो गया (2 जुलाई 2019 को आरबीआई द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार)

आरबीआई के अनुसार, शुद्ध एनपीए वित्त वर्ष 2017-18 में 6% से घटकर वित्त वर्ष 2018-19 में 3.7% हो गया!

कर्ज माफी के प्रोपोगंडा पर बोलते हुए खुद प्रधानमंत्री मोदी कई बार कह चुके है कि हमारी सरकार ने किसी भी कॉरपोरेट्स का एक रुपया भी कर्जा माफ़ नहीं किया है!

तो फिर जो घड़ी घड़ी खबरें चलती है कि फलाने उद्योगपति का इतना कर्जा माफ़ कर दिया, वो क्या है ?

"माफी" सही शब्द नहीं है, ये शब्द प्रोपोगंडा शब्द है! जनता को भ्रमित करने के लिए दरबारी मीडिया द्वारा इसका इस्तेमाल किया जाता है! सही शब्द है "राइट ऑफ" इसका मतलब ऋण माफ करना नहीं होता! यह सामान्य प्रक्रिया है जो आरबीआई द्वारा की जाती है, बैड लोन को "राइट ऑफ" करके बैलेंस शीट क्लियर की जाती है! राइट ऑफ मतलब "बट्टे खाते में डालना".

अब इसमें मजे की बात यह है कि कांग्रेस के कुशासन में 36 लाख करोड़ का कर्ज दिया गया लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि इस ऋण से जो एनपीए क्रिएट हुआ उसको वसूल करने के लिए 2016 तक कोई ठोस कानून ही नहीं था! बेचारे बैंक्स कॉरपोरेट्स के चक्कर लगा लगा के थक जाते थे पर मजाल है कि माल्या, मेहुल, नीरव जैसे कॉरपोरेट्स बैंकों को पैसा चुकाएं?

फिर मोदी सरकार ने 2016 में बनाया "इन्सोलवेंसी एंड बैंकरप्सी कानून" शुरुआत में इसे स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था, लेकिन इसमें समय के साथ अमेंडमेंट होते गए और यह एनपीए वसूल करने का ठोस कानून बन गया!

मोदी सरकार की सख्त कार्यवाही और आईबीसी कानून से डरकर माल्या, नीरव, मेहुल जैसे लोग देश छोड़कर भागने लगे.. क्योंकि अब लोन रिकंस्ट्रक्शन के नाम पर और लोन देना बंद कर दिया गया था, कांग्रेस के समय खूब मलाई काट रहे थे ये लोग अब ऋण चुकाने की बारी आई तो भागने लगे..

फिर मोदी सरकार ने 2018 में बनाया "भगोड़ा आर्थिक अपराधी कानून" इसमें कड़े प्रावधान किए गए। माल्या, नीरव, मेहुल जैसे भगोड़े आर्थिक अपराधियों की बेनामी संपत्तियां यहां तक की विदेशी संपत्तियां भी जप्त करके नीलाम करके वसूली करने का प्रावधान किया। इसके अलावा सरकार ने सभी बैंकों से 50 करोड़ से अधिक ऋण लेने वाले कॉरपोरेट्स के पासपोर्ट की कॉपी जमा करवाने को कहा! ताकि भविष्य में कोई डिफॉल्टर देश छोड़ कर भाग न सके!

भगोड़े आर्थिक अपराधियों के संबंध में कुछ तथ्य:

1 फ़रवरी 2019 विजय माल्या के ट्वीट के अनुसार वो 9000 करोड़ लेकर भागा था लेकिन एजेंसियों द्वारा उसकी 13000 करोड़ से अधिक संपत्ति जब्त की जा चुकी थी!

नीरव मोदी ने 6400 करोड़ का बैंक फ्राड किया, अप्रैल 2019 तक एजेंसियों द्वारा इसकी 4744 करोड़ की संपत्ति अटैच की जा चुकी है।

मेहुल चौकसी ने 6100 करोड़ का बैंक फ्राड किया, जुलाई 2019 तक एजेंसियों द्वारा इसकी 2534.7 करोड़ की संपत्ति अटैच की जा चुकी है।

इसके अलावा नीरव मोदी लंदन की जेल में सजा काट रहा है। विजय माल्या की प्रत्यर्पण के खिलाफ दायर अर्जी खारिज हो चुकी है। मेहुल चौकसी के प्रत्यर्पण की कार्यवाही चल रही है। एंटीगुआ के प्रधानमंत्री ने सितंबर 2019 में बयान दिया था कि जल्द ही मेहुल चौकसी भारत को सौंप दिया जाएगा!

ये सब किया है मोदी सरकार ने! मोदी सरकार पर कोई भी निराधार आरोप लगाने से पहले तथ्यों को जांच लेना चाहिए!


Wednesday, 15 April 2020

मैं मनुवाद का सताया हुआ भारत का मूलनिवासी हूँ ।
 मै अगर बौद्ध धर्म को अपनाना चांहू तो
आप मुझे किस जाति का बौद्ध बनाओगे ॽॽॽ

ऊँची जाती वाले सवर्ण बौद्ध ॽॽॽ
सामान्य जाती के बौद्ध ॽॽॽ
या फिर नीच कुजात अछूत शुद्र जाती के बौद्ध ॽॽॽ

क्या कहा !! बौद्ध में जाति-भेद नहीं होता ? 🙄🙄🙄
तो फिर ये
▪हीनयान
▪महायान
▪वज्रयान
▪भीमयान
▪थेरवाड
▪त्रिलोक
▪गरा
▪दरा
▪बेता
▪बेदा
▪फल्पा
▪थल्पा
▪दोम्बा
▪जोम्बा
▪बोडो
▪नोनो
क्या होते हैं ???

या फिर आप मुझे नीच,कुजात,अछूत, शूद्र जाती का बौद्ध बनाओगे --जैसे कि
▪बुराकुमिन
▪पयाक्युन
▪यांग्बान
▪बीकजोंग
▪जिआंमिन
▪रोधियास
▪राग्यब्पा
▪वज्रधरा
▪मोन
▪गराबा
यह तो बौद्ध धर्म की ऐसी अछूत जातियाँ हैं जिनका किसी भी बौद्ध मंदिर में प्रवेश तक वर्जित है •• तो बौद्ध भिक्षु बनना तो बहुत दूर की बात है।

जाओ भैया जाओ !
पहले अपने अपने घरों की गंदगी साफ करो फिर दुसरो के घरों में तांक झांक करना ।

यू ट्यूब पर burakumin लिखकर देखिये--- बौधों का बोध धर्म 100 % खतरे में आ जायेगा क्यो की झूठ की गठरी खुल जाएगी।

Monday, 6 April 2020

क्या श्रीराम ने बाली को अधर्म से मारा था?

जी नहीं ।

संत ब्राह्मण गौ माताओ की कृपा से कुछ पुराने संत महात्माओ के रामायण पर लिखे विचार पढ़ने का अवसर दास को मिला। उसमे कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण भाग जो दास ने पढ़ा वही आगे लिखने जा रहा हूं।

बाली ने श्री रामचंद्र जी पर आरोप लगाये थे की प्रभु ने उसे छिप कर अधर्म से मारा है। प्रायः बहुत से लोग बिना सोचे समझे भगवान् के इस चरित्र को दोषयुक्त दृष्टि से देखते है और कुछ तो कह देते है की प्रभु ने बाली का वध अधर्म से किया । निचे कुछ पूज्य संत महात्माओ के आशीर्वचन दिए गए है जिस से प्रभु की यह लीला संतो किं कृपा से हम मंदबुद्धियो को कुछ समझ सके।

बाली वध के कारण –
१ .श्रीरामजी सत्य-प्रतिज्ञ हैं । यह त्रैलोक्य जानता है कि श्रीराम दो वचन कभी नहीं कहते, जो वचन उनके मुखसे एक बर निकला, वह कदापि असत्य नहीं किया जा सकता। वे मित्र सुग्रीव का दु:ख सुनकर प्रतिज्ञा कर चुके हैं कि – सुनु सुग्रीव मारिहौं एकहि बान। ध्यान देने की बात है की व्याध भय से नहीं छिपता। मुख्य कारण यह होता है कि कहीं शिकार उसे देखकर हाथसे जाता न रहे । यहॉ विटप ओट(वृक्ष की ओट) से इसलिये मारा कि यदि कहीं बाली हमको देखकर भाग गया अथवा छिप गया, अथवा शरणमें आ पडा तो प्रतिज्ञा भंग हो जायगी (एक ही बाणसे मारने की प्रतिज्ञा है) ।

सुग्रीव को स्त्री और राज्य केसे मिलेगा ?पुनः यदि सामने आकर खड़े होते तो सम्भव था कि बाली सेना आदी को सहायता के लिये लाता । यह आपत्ति आती कि मारना तो एक बाली को ही था, पर उसके साथ मारी जाती सारी सेना भी ।यदि सामने आके लड़ते तो सुग्रीव की वानर सेना के वानर भी मारे जाते अतः सुग्रीव को उजड़ी हुई नागरी मिलती। प्रभु भक्त को उजड़ी नागरी कैसे देते? स्मरण रहे कि यहाँ छिपने में कपट का लेश भी नहीं है, यहाँ युद्ध नहीं किया गया है वरन दंड दिया गया है। राजा यदि यथार्थ दंड न दे,तो राजा उस दोष का भागी होता है।

२ -बाली चाहता था कि मेरा वध भगवान् के हाथो से हो, वाल्मीकि रामायण (१८ । ५७ )में बाली प्रभु से कहता है – आपके द्वारा अपने वध की इच्छा से ही ताराद्वारा रोके जानेपर भी सुग्रीव से युद्ध करने के लिये मैं आया था । यही बात मानस के – ” जौ कदाचि मोहि मारिहिं तौ पुनि होउँ सनाथ “ से भी लक्षित होती है । भगवान् अन्तर्यामी हैं, उन्होंने उसकी हार्दिक अभिलाषा (जिसका बाली को छोड़कर और किसीको पता भी न था) इस प्रकार पूर्ण की ।

३ -यद्यपि भगवान् सब कुछ करने मे समर्थ हैं, उनकी इच्छा में कोई वर या शाप बाधक नहीं हो सकता, तथापि यह उनका मर्यादापुरुषोत्तम अवतार है । यद्यपि एक बात कही वर्णन नहीं मिलता परंतु कुछ सज्जनों का मत है कि बाली को देवताओ का वरदान था कि जो तेरे सम्मुख लड़ने के लिये आवेगा उसका आधा बल तुमको मिल जायगा। प्रभु सबकी मर्यादा रखते हैं इसीसे रावणवध के लिये नरशरीर धारण किया; नहीं तो जो कालका भी काल है क्या वह बिना अवतार लिये ही रावण को मार न सकता था ?

जिसके एक सीकास्त्र से देवराज इंद्र के पुत्र को त्रैलोक्य में शरण देनेवाला कोई न मिला, क्या वह सीता जी के उद्धार के लिये वानर कटक एकत्र करता ? सुग्रीव से मित्रता करता? नागपाश मे अपने को बंधवाता इत्यादि। प्रभु तो रावण को अवश्य साकेत वैकुण्ठ धाम में बैठे ही मार सकते थे, पर देवताओं की मर्यादा, उनकी प्रतिष्ठा जाती रहती । प्रभु यदि बाली को सामने से मारते तो उनके वर और शापका कोई महत्त्व नहीं रह जाता । इसीलिये तो श्रीरामदूत हनुमान जी ने भी ब्रह्मदेव का मान रखा और अपने को नागपाश से बंधवा लिया (सुन्दरकाण्ड देखे) ।

कुछ अधिक बुद्धिजीवी लोग एवं आजकल के युवा तर्क करते है की बाली को प्रभु सामने से कभी नहीं मार पाते क्योंकि प्रभु का आधा बल देवताओ के वरदान अनुसार बाली के पास आ जाता। ध्यान रखे प्रभु का बल अतुलित है अनंत है जिसे आप infinite कहते है और infinite का आधा नहीं होता है। प्रभु का समुद्र रुपी बल जीव रुपी घट में आधा भी नहीं समा सकता।

४ -शास्त्र अनुसार छोटा भाई, पुत्र, गुणवान् शिष्य ये पुत्र के समान हैं । कन्या, बहिन और छोटे भाईकी स्त्री के साथ जो कामका व्यवहार करता है उसका दण्ड वध है ।जो मूढ़बुद्धि इनमें रमण करता है, उसे पापी जानना चाहिये। वह सदा राजाद्वारा वधयोग्य है ।

यद्यपि ऐसा पापी वध योग्य है फिर भी प्रभु ने सोचा की बाली हमारे सुग्रीव का भाई है, बाली पत्नी तारा भी प्रभु की भक्ता है अतः श्रीराम जी ने बाली को सुधार का अवसर देना चाहा । प्रभुने बाली को पहली बार नहीं मारा । उसको बहुत मौका दिया कि वह संभल जाय, सुग्रीव से शत्रुभाव छोड़ दे और उससे मेल कर ले, पर वह नहीं मानता । दूसरी बार अपना फूलो का हार चिह्न के रूप में देकर सुग्रीव को प्रभु ने बाली से युद्ध करने भेजा ।अकारणकृपालु भगवान् ने बाली को होशियार किया कि सुग्रीव मेरे आश्रित हो चुका है; यह जानकर भी मम भुजबल आश्रित तोहें जानी उसने श्रीरामचन्द्रजी के पुरुषार्थ की अवहेलना की, उनका अत्यन्त अपमान किया, उनके मित्रके प्राण लेनेपर तुल गया तब उन्होंने मित्र को मृत्युपाश से बचाने के लिये उसे मारा ।

यदि इसमें अन्याय होता हो रामजी कदापि यह न कह सकते कि छिपकर मारने के विषय में न मुझे पश्चाताप है न किसी प्रकार का दु:ख ।ध्यान दे की अंत में बाली ने प्रभु का उत्तर सुनकर श्रीराम से कहा है-

न दोषं राघवे दध्यो धर्मेsधिगतनिश्चय: ।।
प्रत्युवाच ततो रामं प्रांजलिर्वानरेश्वर: ।
यत्त्वमात्थ नरश्रेष्ठ तत्तथैव न संशय: ।।
(वाल्मीकि रामायण ४४-४५ )

अर्थात् उत्तर सुनकर उसने धर्म का निश्चय जानकर राघव जी को दोष नहीं दिया और हाथ छोड़कर बोला कि आपने जो कहा यह ठीक है, इसमें संदेह नहीं । जब स्वयं बाली ही यों कह रहा है तब हमको आज़ श्री रामजी के चरित्र पर दोषारोपण करनेका क्या हक है ?

अब देखना चाहिये कि सरकार ने अपने संक्षिप्त उत्तर मे ऐसी कौन बात कही कि जिससे बाली का समाधान हो गया । उनके उत्तरों से स्पष्ट मालूम होता है कि उन्होंने अपराधका दण्ड दिया । युद्ध करना और दण्ड देना दो पृथक वस्तु हैं । युद्ध शत्रुसे  किया जाता है । और दण्ड अपराधी को दिया जाता है । युद्धके नियम दण्ड देने में लागू नहीं हैं । अपराधी न्यायाधीश से नहीं कह सकता कि तुम मुझ बँधे हुए को फांसी की आज्ञा देकर अधर्म कर रहे हो । मेरे हाथमें तलवार दो, और स्वयं भी तलवार लेकर लड़ो , और मुझे मार सको तो धर्म है नहीं तो फांसी दिलवाना पाप है । न्यायाधीश कहेगा कि मैं लड़ने नहीं आया हूँ तुमने अपराध किया है, उसीका यह दण्ड है।

सरकार का यहीं कहना है कि तुम हमारे शत्रु नहीं हो । यदि तुमसे शत्रुता होती और मैं लड़ने आया होता, पर मैं तो दण्ड देने आया हूँ । तुम अपराधी हो । बन्धु के पत्नी को कुदृष्टि से देखनेवाला वध्य है, पर तुम्हारा अपराध तो और भी बढा-चढा है, तुम दण्डके योग्य हो, और वह दण्ड व्याधकी भाँती वध करना है । वधके दण्डमें तीव्रता लानेके लिये ही तुम्हारा वध व्याध की भाँति करना पड़ा । बस सरकार के उत्तर को ठीक तरह से बाली समझा अत: निरुत्तर हो गया ।

५- श्री रामचंद्र जी को सुग्रीव जब दुंदुभी नामक असुर की अस्तिनिचय और सात ताल वृक्षों को भगवान् श्रीराम जी को दिखाता है । वह कहता की जो भी इन अस्थिपंजर को उठाने में समर्थ होगा और जो एक बाण से इन वृक्षों को काट देगा , वही युद्ध में बाली का वध कर सकता है । इस से भी स्पष्ट है की श्रीराघव जी अपने बल से युद्ध में बाली का वध करने में समर्थ है । परंतु सरकार युद्ध करने आये ही नहीं है ,वे तो बाली के पाप का दंड देने आए है ।

६. बालकाण्ड के इस श्लोक देखा जाए तो भी कारण स्पष्ट होता है – ततः सुग्रीववचनाद्धात्वा वालीनमाहवे ।सुग्रीवमेव तंद्राज्ये राघवः प्रत्यपादयत्  ।।  –  अर्थात श्रीरामने बाली को युद्ध में मारकर सुग्रीव को राज्य दिलाया था ।

७ -एक संत का मत है की बाली ने भगवान् से कहा था – मुझे आपने व्याध की भाँती क्यों मारा? यहाँ संत जी के अनुसार व्याध का मतलब छुप कर नहीं है यहाँ व्याध की भाँती मारना मतलब निर्दयता से मारना है। बाली ने कहा प्रभु अपने मुझे निर्दयता से क्यों मारा? तब प्रभु ने कहा था की तुमने अपने अनुज के पत्नी हा हरण कर लिया था, बुरी दृष्टी डाली तुम्हे ऐसा ही दंड मिलना चाहिए। उन संत जी ने ‘विटप ओट’ का अर्थ वृक्ष की आड़ नहीं माना है, ‘विटप ओट ‘ का अर्थ उन्होंने किया है वृक्ष का सहारा लेकर ।

८ – श्री हनुमान जी लंका में श्री सीता जी से और संजीवनी बूटी लाते समय श्री भारत जी से बाली का श्रीराम के हाथो युद्ध में मारे जाने का वर्णन करते है –वालीनं समरे हत्वा महाकायं महाबलम् (६। १२६। ३८)

९ – एतदस्यासमं वीर्यं मया राम प्रकाशितम् । कथं तं वालीनं हन्तुं समरे शक्ष्यसे नृप ।। ( वाल्मीकिरामायण किष्किन्धा काण्ड ११ । ६८) इसमें वालीनां हन्तुं समरे  का अर्थ हुआ युद्ध में ।
पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी एवं अन्य संत महात्माओ की हम सब पर कृपा है की उन्होंने सरल भाषा में हम मंदबुद्धियो को रामायण जी की कथा को समझाया है।

 समस्त हरि हर भक्तो की जय।


नितिन मुदगल 🚩 धर्मध्वजा वाहक

Sunday, 29 March 2020

द्वितीय दिवस तृतीय कथांश से हमने क्या सीखा:-

1)गुरु विश्वामित्र श्री राम जी को बताते हैं कि वीर वही जो वीरता का प्रदर्शन अपने आडम्बर और अहंकार के लिए न करे, दिव्य अनुसंधान की प्राप्ति भी सरलतापूर्वक ही होती है, गुरु दक्षिणा में मुनि श्रेष्ठ ने भी परहित ही मांगा:-किसी भी निर्दोष मनुष्य का अपनी वीरता से संरक्षण करना ही मेरी सबसे बड़ी दक्षिणा होगी।
2) जब क्षत्रिय रक्षक संरक्षक हो तो अपने तपकर्म से  अनुसंधानकर्ता नये प्रयोग कर उपाय खोज लेता है वहाँ श्री राम ने संरक्षण किया और ऋषियों ने अनुसंधान किया यहाँ सेना और पुलिस संरक्षक है और डाॅक्टर और वैज्ञानिक अनुसंधानकर्ता ।।
3) पीढियाँ बीत जाती है कुल को तारने के लिए लेकिन जब तक दृढ़ निश्चय नही किया जाये तब तक तप कर्म अधिक अवधि तक नही होते अर्थात अधिक अवधि तक भगीरथ जी द्वारा किया तपकर्म ही माँ गंगा के वेग को आदिदेव की जटाओं के माध्यम से धरती तक नियंत्रित कर पाया ।
4) दूसरे के प्रति किया गया छ्ल मृत्युदंड ही देता है वह छ्ल जिसके प्रति किया गया है और जिसने किया है दोनो को नष्ट कर देता है अत: सजग रहे कभी भी आपकी गलती दो परिवारों या दो व्यक्तियों के विनाश का कारण न बने।
5) कितना भी बड़ा राजा हो मर्यादा उसका सबसे कुशल शस्त्र होती है इसलिये श्री राम जी ने गुरु आज्ञा से पुष्प लाने के पूर्व उस माली से आज्ञा ली जिसके अधिकार क्षेत्र में वाटिका थी इसके अलावा गुरु पास हो तो उनकी सेवा और बड़े भ्राता साथ हो तो उनकी सेवा परम कर्तव्य है यह आज बहुत ही प्रेमपूर्वक सिखाया गया।

इसके अलावा माँ गौरी की पूजन कुंवारी कन्या ही करे जो रीति आज भी विवाह के पूर्व मातापूजन के नाम से निभाई जाती हैं अर्थपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया ।।🙏।।


रामायण के चतुर्थ कथांश से आपका क्या अभिप्राय है??

1) स्वयंवर के पूर्व ही श्री राम ने अपने अनुज को पूर्वाभास करा दिया कि परीक्षा की घड़ी में उत्तेजित नही होते,,तत्पश्चात् ये बात उन्होनें श्री परशुराम जी से संवाद तक स्मरण रखी और बाल्य चपलता कर श्री परशुराम जी के आवेश को शनै:-शनै: अहंकार की सीमा तक लेकर आये।
2) स्वयंवर के समय सभी ने श्री राम की शक्ति का आंकलन किया राजाओं ने अहंकारवश तथा महारानी सुनयना जी और जनक जी ने अधीर होकर। जबकि राजहठ पूरा न होते देख धीरज रखना चाहिए न कि अधीर होना चाहिये:- जिसका पालन आज योगी आदित्यनाथ जी सबसे बड़ा राज्य होने के बाद और मोदी जी , अमित शाह जी पूरे देश के लिए कर रहे हैं ।
3) अन्तर्मन के उद्गार हमेशा निराश होने पर ही फूटते है जैसे सभी राजाओं की निर्बलता और अहं देखकर राजा जनक जी के उद्गार फूट पड़े।
4) समय देखकर निर्णय लेना प्रभु की सबसे बड़ी आज्ञा होती हैं जैसे गुरु विश्वामित्र जी ने श्री राम को आज्ञा देने का निर्णय लिया, और मर्यादा का पालन कर सीता जी के प्रेम की अधीरता चित्त में होते हुए भी श्री राम बिना गुरु की आज्ञा के नही उठे।
5) सर्वप्रथम अपने से बड़े का सामना हो तो स्वयं को उनका दास बना लो ये श्री रामजी ने बताया, क्योकि बिना रणभूमि के किसी सभा में क्रोध को क्रोध नही अपितु प्रेम और वात्सल्य ही नियन्त्रित कर सकता है।
6) क्षत्रिय का धर्म स्त्री,गौ,और ब्राह्मण की रक्षा करना होता है आज ये परिस्थिति हमसे विमुख है , क्षत्रिय श्रेष्ठ होकर भी मर्यादा का पालन कर इन्हे प्राथमिकता देता है । ब्राह्मण अपनी आत्मरक्षा के स्त्रोत सदैव पूर्व दिशा में रखता है श्री परशुराम जी  की आत्मरक्षा का स्त्रोत ही क्रोध बन चुका था, लेकिन उस क्रोध के संचय ने अहंकार को जन्म दे दिया। इसलिये जरूरत समाप्त होने पर श्री परशुराम जी ने उस पर श्री राम जी से बाण सन्धान करवाया।

श्री राम ने ससुर जी को भी पिता की संज्ञा दी और उनके पैर छुए आज ये रीति विपरीत हो गई समय के साथ जो कि निराशाजनक है। संस्कारवश मैं कभी पराई स्त्री, और सास-ससुर जी  से पैर नही छुआता तो मैने स्वयं को यहाँ सही पाया🙏



Saturday, 28 March 2020

श्री रामानंद सागर जी द्वारा प्रस्तुत रामायण जी का आज दिनांक 28 मार्च से पुनः आरंभ हुआ।

रामायण के हर क्षण में कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। 

1. जब सूर्य उत्तरायण में प्रवेश करता है उस समय कुछ मांगने से उसकी इच्छा पूर्ण होती है - जैसे राजा दशरथ को संतान प्राप्ति
2. घर मे हवन यज्ञ आदि करवाना चाहिए
3. किसी के समक्ष कुछ मांगने के लिए भिक्षुक बन जाना चाहिए - जैसे राजा दशरथ ऋषि से यज्ञ करवाने के लिए भिक्षुक बने थे
4.विद्या आरंभ का श्रेष्ठ मुहूर्त वसंत पंचमी होता है
5. दिनचर्या शुरू करने से पूर्व स्नान आदि करके ईश्वर को फिर पिता को प्रणाम करना चाहिए
6. राजा दशरथ ने विद्या प्राप्ति के लिए पुत्रो को गुरुकुल भेज था अथार्थ पुत्रो को योग्य बनाने के लिए स्वयं से दूर भी करना पड़े तो करना चाहिए
7. संतान की याद में माँ बाप की भूख भी मर जाती है
8.बच्चो को हर परिस्थिति में जीने की शिक्षा देनी चाहिए क्या पता कब कैसा समय आ जाये
9.भिक्षुक को हमेशा भिक्षा अपरिचित से लेना चाहिए, अपनो से नही।

रामायण के दूसरे कथांश से सीखने वाली बातें :- 

1) योग हमारे जीवन में मन को एकाग्रचित्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है हम योगी होकर ही अपने अन्तर्मन को शरीर से बाहर रखकर अपने विकारो और अहंकार का आंकलन कर सकते है।
2) जब हम आराधना करते हैं तो पूरे चित्त से करे जैसे श्री राम शिव जी का अभिषेक कर रहे थे,,,,वे इतने लीन हो गये कि भगवान स्वयं भक्त की भक्ति में नटराज हो गये,,मनुष्य का नही पता परंतु भगवान सब देख रहे हैं ।
3) विश्वामित्र जैसे ऋषि उस काल के वैज्ञानिक अनुसंधान करते थे उन्होने कहा कि तप के बीच क्रोध वर्जित है इसलिए राक्षसों को श्राप नही दिया जा सकता,,अर्थात बिना किसी क्रोध और मन को विचलित किये बिना हमारे वैज्ञानिक भी कोरोना की दवाई ढूँढ सकते हैं । क्रोध तभी करे जब आवश्यकता हो जैसे विश्वामित्र जी ने दशरथ जी को उनका वचन याद दिलाने हेतु किया ।
4) एक गुरु विश्वामित्र को ऋषि वशिष्ठ की शिक्षा पर पूरा भरोसा है क्योकि उन्होने शिष्यो को दिए हुये ज्ञान का अंधविश्वास या रटन विद्या से नही अपितु स्वविवेक से प्रयोग करने को कहा।
5) तीन कर्तव्य महत्वपूर्ण बताये गुरु वशिष्ठ ने देवताओ के प्रति अर्थात हमारी आत्मा देवस्वरूप ,माता पिता के प्रति- इसलिये विश्वामित्र जी ने श्री राम को दशरथ जी से माँगा,,और गुरु के प्रति,,,,गुरु ने दीक्षा में परहित मांगा जो संसार की सबसे बड़ी गुरु दीक्षा है ।

हम इस रामायण से काफी कुछ सीख सकते हैं यदि चित्त से अपने जीवन में उतार ली जाये तो ✍


उक्त ब्लॉग में कुछ बातें श्री रजनीश दुबे जी की भी है। 🙏🏻


दूरदर्शन 'रामायण' दिखाने पर सहमत था किंतु तत्कालीन कांग्रेस सरकार इस पर आनाकानी कर रही थी। दूरदर्शन अधिकारियों ने जैसे-तैसे रामानंद सागर को स्लॉट देने की अनुमति सरकार से ले ली। ये सारे संस्मरण रामानंद जी के पुत्र प्रेम सागर ने एक किताब में लिखे थे। तो दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में रामायण को लेकर अंतर्विरोध देखने को मिल रहा था। सूचना एवं प्रसारण मंत्री बीएन गाडगिल को डर था कि ये धारावाहिक न केवल हिन्दुओं में गर्व की भावना को जन्म देगा अपितु तेज़ी से उभर रही भारतीय जनता पार्टी को भी इससे लाभ होगा।  हालांकि राजीव गांधी के हस्तक्षेप से विरोध शांत हो गया।

इससे पहले रामानंद को अत्यंत कड़ा संघर्ष करना पड़ा था। वे दिल्ली के चक्कर लगाया करते कि दूरदर्शन उनको अनुमति दे दे लेकिन सरकारी घाघपन दूरदर्शन में भी व्याप्त था। घंटों वे मंडी हाउस में खड़े रहकर अपनी बारी का इंतज़ार करते। कभी वे अशोका होटल में रुक जाते, इस आस में कि कभी तो बुलावा आएगा। एक बार तो रामायण के संवादों को लेकर डीडी अधिकारियों ने उनको अपमानित किया। ये वहीं समय था जब रामानंद सागर जैसे निर्माताओं के पैर दुबई के अंडरवर्ल्ड के कारण उखड़ने लगे थे। दुबई का प्रभाव बढ़ रहा था, जो आगे जाकर दाऊद इंडस्ट्री में परिवर्तित हो गया।

1986 में श्री राम की कृपा हुई। अजित कुमार पांजा ने सूचना व प्रसारण का पदभार संभाला और रामायण की दूरदर्शन में एंट्री हो गई। 25 जनवरी 1987 को ये महाकाव्य डीडी पर शुरू हुआ। ये दूरदर्शन की यात्रा का महत्वपूर्ण बिंदु था। दूरदर्शन के दिन बदल गए। राम की कृपा से धारावाहिक ऐसा हिट हुआ कि रविवार की सुबह सड़कों पर स्वैच्छिक जनता कर्फ्यू लगने लगा।

इसके हर एपिसोड पर एक लाख का खर्च आता था, जो उस समय दूरदर्शन के लिए बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी। राम बने अरुण गोविल और सीता बनी दीपिका चिखलिया की प्रसिद्धि फिल्मी कलाकारों के बराबर हो गई थी। दीपिका चिखलिया को सार्वजनिक जीवन मे कभी किसी ने हाय-हेलो नही किया। उनको सीता मानकर ही सम्मान दिया जाता था।

अब नटराज स्टूडियो साधुओं की आवाजाही का केंद्र बन गया था। रामानंद से मिलने कई साधु वहां आया करते। एक दिन कोई युवा साधु उनके पास आया। उन्होंने ध्यान दिया कि साधु का ओरा बहुत तेजस्वी है। साधु ने कहा वह हिमालय से अपने गुरु का संदेश लेकर आया है। तत्क्षण साधु की भाव-भंगिमाएं बदल गई। वह गरज कर बोला ' तुम किससे इतना डरते हो, अपना घमंड त्याग दो। तुम रामायण बना रहे हो, निर्भिक होकर बनाओ। तुम जैसे लोगों को जागरूकता के लिए चुना गया है। हिमालय के दिव्य लोक में भारत के लिए योजना तैयार हो रही है। अतिशीघ्र भारत विश्व का मुखिया बनेगा।'

आश्चर्य है कि रामानंद जी को अपने कार्य के लिए हिमालय के अज्ञात साधु का संदेश मिला। आज इतिहास पुनरावृत्ति कर रहा है। उस समय जनता स्वयं कर्फ्यू लगा देती थी, आज कोरोना ने लगवा दिया है। उस समय दस करोड़ लोग इसे देखते थे, कल इससे भी अधिक देखेंगे। उन करोड़ों की सामूहिक चेतना हिमालय के उन गुरु तक पुनः पहुंच सकेगी। शायद फिर कोई युवा साधु चला आए और हम कोरोना से लड़ रहे इस युद्ध मे विजयी बन कर उभरे। कल चले राम बाण, और कोरोना का वध हो।

Thursday, 12 March 2020

5000 साल पहले #ब्राह्मणों_ने_हमारा_बहुत_शोषण किया ब्राह्मणों ने हमें पढ़ने से रोका
यह बात बताने वाले महान इतिहासकार यह नहीं बताते कि 500 #साल_पहले_मुगलों ने हमारे साथ क्या किया  100 #साल_पहले_अंग्रेजो_ने हमारे साथ क्या किया

हमारे देश में शिक्षा नहीं थी लेकिन 1897 में #शिवकर_बापूजी_तलपडे_ने_हवाई_जहाज बनाकर उड़ाया था मुंबई में जिसको देखने के लिए उस टाइम के हाई कोर्ट के जज महा गोविंद रानाडे और मुंबई के एक राजा महाराज गायकवाड के साथ-साथ हजारों लोग मौजूद थे जहाज देखने के लिए
 उसके बाद एक #डेली_ब्रदर_नाम_की_इंग्लैंड की कंपनी ने #शिवकर_बापूजी_तलपडे के साथ समझौता किया और बाद में बापू जी की मृत्यु हो गई यह मृत्यु भी एक षड्यंत्र है हत्या कर दी गई और फिर बाद में 1903 में राइट बंधु ने जहाज बनाया

आप लोगों को बताते चलें कि आज से हजारों साल पहले की किताब है #महर्षि_भारद्वाज_की_विमान_शास्त्र जिसमें 500 जहाज 500 प्रकार से बनाने की विधि है उसी को पढ़कर शिवकर बापूजी तलपडे ने जहाज बनाई थी।

लेकिन यह तथाकथित #नास्तिक_लंपट_ईसाइयों के दलाल जो है तो हम सबके ही बीच से लेकिन हमें बताते हैं कि भारत में तो कोई शिक्षा ही नहीं था कोई रोजगार नहीं था।

#अमेरिका_के_प्रथम_राष्ट्रपति_जॉर्ज_वाशिंगटन 14 दिसंबर 1799 को अरे थे सर्दी और बुखार की वजह से उनके पास बुखार की दवा  नहीं थी उस टाइम #भारत_में #प्लास्टिक_सर्जरी_होती थी और अंग्रेज प्लास्टिक सर्जरी सीख रहे थे हमारे गुरुकुल में अब कुछ वामपंथी लंपट बोलेंगे यह सरासर झूठ है।

तो वामपंथी लंपट गिरोह कर सकते है
#ऑस्ट्रेलियन_कॉलेज_ऑफ_सर्जन_मेलबर्न में #ऋषि_सुश्रुत_ऋषि की  प्रतिमा "फादर ऑफ सर्जरी" टाइटल के साथ स्थापित है।

महर्षि सुश्रुत – ये #शल्यचिकित्सा विज्ञान यानी सर्जरी के जनक व दुनिया के पहले शल्यचिकित्सक (सर्जन) माने जाते हैं। वे# शल्यकर्म या #आपरेशन में दक्ष थे। #महर्षि सुश्रुत द्वारा लिखी गई ‘#सुश्रुतसंहिता’ ग्रंथ में शल्य चिकित्सा के बारे में कई अहम ज्ञान विस्तार से बताया है। इनमें सुई, चाकू व चिमटे जैसे तकरीबन 125 से भी ज्यादा शल्यचिकित्सा में जरूरी औजारों के नाम और 300 तरह की शल्यक्रियाओं व उसके पहले की जाने वाली तैयारियों, जैसे उपकरण उबालना आदि के बारे में पूरी जानकारी बताई गई है।
जबकि आधुनिक विज्ञान ने शल्य क्रिया की खोज तकरीबन चार सदी पहले ही की है। माना जाता है कि #महर्षि_सुश्रुत_मोतियाबिंद_पथरी_हड्डी_टूटना जैसे पीड़ाओं के उपचार के लिए शल्यकर्म यानी आपरेशन करने में माहिर थे। यही नहीं वे त्वचा बदलने की शल्यचिकित्सा भी करते थे।

भास्कराचार्य – आधुनिक युग में धरती की #गुरुत्वाकर्षण शक्ति (पदार्थों को अपनी ओर खींचने की शक्ति) की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है। किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण का रहस्य न्यूटन से भी कई सदियों पहले भास्कराचार्यजी ने उजागर किया। #भास्कराचार्यजी ने अपने #‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ में पृथ्वी के #गुरुत्वाकर्षण के बारे में लिखा है कि ‘पृथ्वी आकाशीय पदार्थों को विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है। इस वजह से आसमानी पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’।

आचार्य कणाद – #कणाद #परमाणु की अवधारणा के जनक माने जाते हैं। आधुनिक दौर में अणु विज्ञानी #जॉन डाल्टन के भी हजारों साल पहले महर्षि कणाद ने यह रहस्य उजागर किया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं।
उनके अनासक्त जीवन के बारे में यह रोचक मान्यता भी है कि किसी काम से बाहर जाते तो घर लौटते वक्त रास्तों में पड़ी चीजों या अन्न के कणों को बटोरकर अपना जीवनयापन करते थे। इसीलिए उनका नाम कणाद भी प्रसिद्ध हुआ।

गर्गमुनि – गर्ग मुनि #नक्षत्रों के #खोजकर्ता माने जाते हैं। यानी सितारों की दुनिया के जानकार।
 ये #गर्गमुनि ही थे, जिन्होंने श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के बारे में नक्षत्र विज्ञान के आधार पर जो कुछ भी बताया, वह पूरी तरह सही साबित हुआ।  कौरव-पांडवों के बीच महाभारत युद्ध विनाशक रहा। इसके पीछे वजह यह थी कि युद्ध के पहले पक्ष में तिथि क्षय होने के तेरहवें दिन अमावस थी। इसके दूसरे पक्ष में भी तिथि क्षय थी। पूर्णिमा चौदहवें दिन आ गई और उसी दिन चंद्रग्रहण था। तिथि-नक्षत्रों की यही स्थिति व नतीजे गर्ग मुनिजी ने पहले बता दिए थे।

आचार्य चरक – ‘#चरकसंहिता’ जैसा महत्वपूर्ण आयुर्वेद ग्रंथ रचने वाले आचार्य चरक #आयुर्वेद विशेषज्ञ व ‘#त्वचा चिकित्सक’ भी बताए गए हैं। आचार्य चरक ने #शरीरविज्ञान, गर्भविज्ञान, औषधि विज्ञान के बारे में गहन खोज की। आज के दौर में सबसे ज्यादा होने वाली बीमारियों जैसे डायबिटीज, हृदय रोग व क्षय रोग के निदान व उपचार की जानकारी बरसों पहले ही उजागर कर दी।

पतंजलि – आधुनिक दौर में जानलेवा बीमारियों में एक कैंसर या कर्करोग का आज उपचार संभव है। किंतु कई सदियों पहले ही #ऋषि पतंजलि ने कैंसर को भी रोकने वाला #योगशास्त्र रचकर बताया कि योग से कैंसर का भी उपचार संभव है।

बौद्धयन – भारतीय #त्रिकोणमितिज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। कई सदियों पहले ही तरह-तरह के आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की त्रिकोणमितिय रचना-पद्धति #बौद्धयन ने खोजी। दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करने पर जो संख्या आएगी, उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्त में बदलना, इस तरह के कई मुश्किल सवालों का जवाब बौद्धयन ने आसान बनाया।

15 साल साल पहले का 2000 साल पहले का मंदिर मिलते हैं जिसको आज के #वैज्ञानिक_और_इंजीनियर देखकर हैरान में हो जाते हैं कि मंदिर बना कैसे होगा अब #हमें_इन_वामपंथी_लंपट लोगो  से हमें पूछना चाहिए कि  मंदिर बनाया किसने

#ब्राह्मणों_ने_हमें पढ़ने नहीं दिया यह बात बताने वाले महान इतिहासकार हमें यह नहीं बताते कि सन 1835 तक भारत में 700000 गुरुकुल थे इसका पूरा डॉक्यूमेंट Indian house  में मिलेगा

भारत गरीब देश था चाहे है तो फिर दुनिया के तमाम आक्रमणकारी भारत ही क्यों आए हमें अमीर बनाने के लिए

भारत में कोई रोजगार नहीं था
भारत में पिछड़े दलितों को गुलाम बनाकर रखा जाता था लेकिन वामपंथी लंपट आपसे यह नहीं बताएंगे कि हम 1750 में पूरे दुनिया के व्यापार में भारत का हिस्सा 24 परसेंट था
और सन उन्नीस सौ में एक परसेंट पर आ गया आखिर कारण क्या था।

अगर हमारे देश में उतना ही छुआछूत थे हमारे देश में रोजगार नहीं था तो फिर पूरे दुनिया के व्यापार में हमारा 24 परसेंट का व्यापार कैसे था।

#यह_वामपंथी_लंपट यह नहीं बताएंगे कि कैसे अंग्रेजों के नीतियों के कारण भारत में लोग एक ही साथ 3000000 #लोग_भूख_से_मर गए कुछ दिन के अंतराल में

एक बेहद खास बात वामपंथी लंपट  या अंग्रेज दलाल कहते हैं इतना ही भारत समप्रीत था इतना ही सनातन संस्कृति समृद्ध थी तो सभी अविष्कार अंग्रेजों ने ही क्यों किए हैं भारत के लोगों ने कोई भी अविष्कार क्यों नहीं किया

#उन_वामपंथी_लंपट लोगों को बताते चलें कि किया तो सब आविष्कार भारत में ही लेकिन उन लोगों ने चुरा करके अपने नाम से पेटेंट कराया नहीं तो एक बात बताओ भारत आने से पहले अंग्रेजों ने कोई एक अविष्कार किया हो तो उसका नाम बताओ एवर थोड़ा अपना दिमाग लगाओ कि भारत आने के बाद ही यह लोग आविष्कार कैसे करने लगे उससे पहले क्यों नहीं करते थे।

Monday, 2 March 2020

तीन राज्यों में भाजपा को वोट न देकर हमने मोदी का अहंकार तोड़ दिया। ये हमने कोई पहली बार नहीं किया है, इसी तरह पहले भी हमने साथ न देकर बड़ों-बड़ों का अहंकार तोड़ा है..

बहुत पहले सिंध के हिन्दू राजा दाहिर का अहंकार तत्कालीन अफगानिस्तान और राजस्थान के हिन्दू राजाओं ने खत्म किया था। दाहिर ने सहायता के लिये पत्र लिखा, पर कोई भी नहीं आया। बहुत अहंकार था दाहिर को अपने पराक्रम का, मारा गया। अब ये अलग बात है कि उसके बाद सिंध में हिन्दुओं का निरंतर पतन ही होता रहा और आज अफगानिस्तान पूर्णतः इस्लामिक राष्ट्र है।

इसी तरह हमने मुहम्मद गोरी के आक्रमण के समय पृथ्वीराज चौहान का साथ न देकर उनके अहंकार को तोड़ा था। अब अलग बात है कि बाद में गोरी ने जयचंद को भी कुत्ते की मौत मारा।

मेवाड़ वालों को भी अपनी बहादुरी का बड़ा अहंकार था। जब खिलजी ने मेवाड़ घेर लिया तब पूरे राजपूताने से किसी ने भी साथ नहीं दिया, रावल रतन धोखे से मारे गये और पद्मावती को 16000 औरतों के साथ जौहर करना पड़ा। पद्मावती को भी अपनी सुंदरता पर बड़ा अहंकार था, तोड़ दिया।

राणा सांगा ने जब लोधी को कैद किया था, तब उनके अहंकार को तोड़ने के लिये डाकू बाबर को बुलाया गया। युद्ध में किसी ने राणा सांगा का साथ नहीं दिया, उनका सेनापति तीस हजार सैनिकों के साथ मारा गया, सांगा का अहंकार टूट गया। लेकिन लोधियों को भी मुगलों की गुलामी करनी पड़ी, मन्दिर तोड़े गए, स्त्रियां लूटी मुगलों ने..पर सांगा का अहंकार तो टूट ही गया न।

मराठे बड़े प्रतापी थे, मुगलों की वाट लगा दी थी उन्होंने। उनको भी बहुत अहंकार था। मुगल हार गये तो काफिरों को रोकने के लिए अफगानिस्तान से अब्दाली बुलाया गया, पानीपत के मैदान में सेनाएं सज गयीं। अब्दाली की सेना को तो रसद मिलती रही पर मराठों को किसी ने भी रसद नहीं भेजी..अहंकार जो तोड़ना था मराठों का। भूखे पेट मराठे लड़ते रहे, मरते रहे..हार गये। महाराष्ट्र का कोई ऐसा घर नहीं जिसका कोई बेटा शहीद न हुआ हो, लेकिन अहंकार तो टूट गया न।

न जाने कितनी बार हमने समय पर साथ न देकर अपनों के अहंकार को तोड़ा है, तो हम मोदी को भी सत्ता से हटा कर रहेंगे। भले ही हमें इसके लिये गोरियों, मुगलों, अब्दालियों या फिर इटली, पाकिस्तान की मदद लेनी पड़े और देश को उनके हाथों गिरवी रखना पड़े..हम मोदी का अहंकार तोड़ कर ही रहेंगे।

...... क्योंकि हमें ग़ुलामी में ही जीने की आदत पड़ गई है।

Tuesday, 21 January 2020

आज कल एक ख्याल है जो अब रातों को सोने नहीं देता, खाने नहीं देता, पीने नहीं देता, जीने नहीं देता| एग्जाम रिजल्ट को अब बस एक महीना रह गया है| उसके बाद ज़िन्दगी बदल जायेगी| मैं पास हुआ तब भी, मैं फेल हुआ तब भी| यूँ तो कहने को हर इंसान के पास 60 साल ज़िन्दगी के होते हैं मगर मेरी ज़िन्दगी में बस वही एक साल गिना जाएगा, जो मैंने तुम्हारे साथ बिताया है| सवाल ये है कि क्या ये गिनती यहीं रुक जायेगी| 
ज़िन्दगी में हार जीत तो लगी रहती है, उसकी परवाह मुझे न कल थी, न आज है, और न शायद कल होगी| परवाह है तुम्हें खोने या पाने की| मेरे मन में आज भी जब वो ख़्याल आता है, तो मेरी रूह कांप उठती है| कैसा होगा वो दिन जब कोई और तुम्हें ब्याह कर ले जायेगा| कभी सोचा है तुमने? चलो आज सोचते हैं| 
गहनों से लदी हुई तुम, शून्य सा भाव लिये, मूरत बनकर बैठी होगी| तुम्हारी आँखों से लगातार गिरते आंसू, सबको नज़र तो आ रहे होंगे लेकिन किसी की हिम्मत नहीं होगी तुमसे तुम्हारे रोने का कारण पूछ ले| तुम्हारा मन भी होगा उन आंसुओं को रोकने का, लेकिन मुझे पता है मेरा बाबू आंसू रोक नहीं पाता| तुम्हारी शादी होगी| एक अनजान इंसान के साथ| जिसे तुमने जाना होगा, बस कुछ ही महीनों पहले| वो बेहतर होगा मुझसे, करियर से लेकर शक्ल कद काठी तक में| लेकिन ये बात तो बस तुम्हारा दिल जानता है कि ये सब मायने रखता कहाँ है| उससे तुम्हारी क्वालिफिकेशन जरूर मिलेगी, लेकिन दिल शायद न मिले| वो तुम्हें गले का हार, कान की बाली, पैरों की पायल भी लाकर दे देगा, लेकिन चेहरे की मुस्कान, वो कहाँ से देगा| हाँ तो कहाँ थे हम, हाँ तुम्हारी शादी पर| तो शादी हो जायेगी तुम्हारी| धूम धाम से| पूरे रीति रिवाजों के साथ, एक योग्य यूपीएससी क्लियर्ड लड़के के साथ| सब कुछ सही सही लगेगा सबको, लेकिन मुझे बस तुम्हारी परवाह है? क्या रह सकोगी? मुझसे बात किए बिना, 2 घंटे नहीं रह पाती हो, मेरी आवाज़ सुने बिना मरना पड़ेगा! मेरी शक्ल देखे बिना चैन नहीं पड़ता तुम्हें, बेचैनी में कैसे कटेगी ज़िन्दगी पूरी| और वो दर्द, वो तड़प, वो टीस, वो आंसू, वो मेरे होते हुए, मेरे न होने का एहसास, मेरे जीते जी, मेरे मर जाने का एहसास| 
                  सिनेमा हॉल में तुम्हें रोते हुआ देखकर, क्या वो भी जोकर बन सकेगा? तुम्हें अलग अलग कार्टून्स की मिमिक्री कर के क्या हंसा पायेगा वो, आधी रातों में फोन पर, क्या तुम्हारे बुरे सपनों को सुन पायेगा वो| शायद नहीं| शायद मैं वो सब कर दूँ जो वो कर सकता है, लेकिन वो ये सब न कर पाये| तुम्हारे आँसू, तुम्हारी हंसी, तुम्हारी मुस्कुराहट, तुम्हारी उदासी, ये सब मेरे लिए जीने मरने के सवाल हैं| तुम मेरी आँखें पढ़ सकती हो ना, आज ये सब नहीं कह पाऊंगा, पढ़ सको तो पढ़ लो| आज तुम्हें रुकने को नहीं कहूंगा, रुक सको तो रुक जाओ| 
                 तुम्हारी ज़िन्दगी अब दोराहे पर खड़ी है| तुम चुन लो| क्या चाहिए? ज़िन्दगी भर की टीस, ज़िन्दगी भर की तड़प, अधजगी रातें, खोए हुए दिन, हर वक़्त के आंसू, जीते जी मरना, या फिर कुछ देर की लड़ाई| बस कुछ देर की| सोच लो| ज़िन्दगी बार बार मौके नहीं देती| बार बार सब कुछ इतना सही नहीं होता| ये आखिरी मौका है, लड़ना पड़ेगा, तुम्हें मेरे लिए और मुझे तुम्हारे काबिल बनने के लिए| इस लड़ाई में मेरा साथ दोगी ना, दोगी तो मेरा यकीन मानो हम जीत जाएंगे, हमारी मोहब्बत जीत जायेगी| हम जियेंगे| नहीं दिया तो तैयार रहना, ज़िन्दगी काटने के लिए|  😣


Sunday, 19 January 2020

ABVP को अपना रास्ता और तरीका बदलना होगा !
सरकार है, सत्ता है, ताकत है ! डंडे का नहीं बौद्धिक क्षमता का उपयोग करिए । लोहे को लोहे से काटिए, लकड़ी से नहीं !


  • वह आयोजन करें काश्मीर मांगे आज़ादी, आप डिबेट करवाइए बलूचिस्तान मांगे आज़ादी ।
  • वह माइनॉरिटी कार्ड खेलें आप गाँव गाँव में बहस करवाइए काश्मीर पंडितों के दुःख दर्द पर ।
  • गांधी बनाम गोडसे जैसे मुद्दों पर खूब लेख लिखिए, स्कूलों में डिबेट करवाइए ।


  • वह सीरिया में मुस्लिमों के मरने पर जंतर मंतर पर प्रदर्शन करते हैं, आप केरल में संघियों के मारे जाने पर  कॉलेज में काली पट्टी बांधिए 
  • सलमान रश्दी, तसलीमा, तारिक फ़तेह अली को कसबे कसबे घुमाइए अपने फंक्शन में ।
  • वह नेहरू को महान बताएं आप वीर सावरकर की प्रतिमा हर हॉस्टल, हर नुक्कड़ पर स्थापित करिए, बच्चे बचे को सावरकर याद हो जाएँ ।
  • वह नक्सलवाद की बात करें, आप भी नक्सल प्रभावित क्षेत्र में वृहद हिन्दू समाज की ऐतिहासिक दुर्दशा और इसका मुग़ल सामर्जय से लिंक पर आंसू बहाइये ।
  • पूरी टीम लगाइए हर अख़बार हर सोसल मीडिया पेज आपके बौद्धिक लेखों से भरा हुआ हो ।


  • यह काश्मीर की बात करें आप बंगाल की बात करो और वह भी स्कूल स्कूल स्तर की डिबेट पर ।
  • इमरजेंसी, 84 के दंगे जैसे कांग्रेसियों के मुद्दे खोद खोद कर निकालिए और इन दिनों पर ब्लैक डे मनवाइये ।


ये बातें केवल ABVP पर ही लागु नहीं होती, अब सभी हिन्दुओं को समझदरी से काम लेना होगा, क्योंकि वामपंथी और धर्मद्रोही हमारे दिमाग से खेल रहे हैं ! वो हमसे वो करवा रहे  हैं जो वो चाहते हैं, लेकिन अब हमें अपनी बौद्धिक क्षमता को समझना और बढ़ाना होगा ! अब हमें अपने दिमाग से चलना होगा, अब हिंदुत्व और हिन्दुओं को एकत्रित होकर पूरी तेजी से आगे बढ़ना होगा...

                वन्दे मातरम्...🚩