Wednesday, 20 June 2018

कई लोगों की दिनचर्या हनुमान चालीसा पढ़ने से शुरू होती है। पर क्या आप जानते हैं कि श्री *हनुमान चालीसा* में 40 चौपाइयां हैं, ये उस क्रम में लिखी गई हैं जो एक आम आदमी की जिंदगी का क्रम होता है।

माना जाता है तुलसीदास ने चालीसा की रचना बचपन में की थी।

हनुमान को गुरु बनाकर उन्होंने राम को पाने की शुरुआत की।

अगर आप सिर्फ हनुमान चालीसा पढ़ रहे हैं तो यह आपको भीतरी शक्ति तो दे रही है लेकिन अगर आप इसके अर्थ में छिपे जिंदगी  के सूत्र समझ लें तो आपको जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिला सकते हैं।

हनुमान चालीसा सनातन परंपरा में लिखी गई पहली चालीसा है शेष सभी चालीसाएं इसके बाद ही लिखी गई।

हनुमान चालीसा की शुरुआत से अंत तक सफलता के कई सूत्र हैं। आइए जानते हैं हनुमान चालीसा से आप अपने जीवन में क्या-क्या बदलाव ला सकते हैं….

*शुरुआत गुरु से…*

हनुमान चालीसा की शुरुआत *गुरु* से हुई है…

श्रीगुरु चरन सरोज रज,
निज मनु मुकुरु सुधारि।

*अर्थ* - अपने गुरु के चरणों की धूल से अपने मन के दर्पण को साफ करता हूं।

गुरु का महत्व चालीसा की पहले दोहे की पहली लाइन में लिखा गया है। जीवन में गुरु नहीं है तो आपको कोई आगे नहीं बढ़ा सकता। गुरु ही आपको सही रास्ता दिखा सकते हैं।

इसलिए तुलसीदास ने लिखा है कि गुरु के चरणों की धूल से मन के दर्पण को साफ करता हूं। आज के दौर में गुरु हमारा मेंटोर भी हो सकता है, बॉस भी। माता-पिता को पहला गुरु ही कहा गया है।

समझने वाली बात ये है कि गुरु यानी अपने से बड़ों का सम्मान करना जरूरी है। अगर तरक्की की राह पर आगे बढ़ना है तो विनम्रता के साथ बड़ों का सम्मान करें।

*ड्रेसअप का रखें ख्याल…*

चालीसा की चौपाई है

कंचन बरन बिराज सुबेसा,
कानन कुंडल कुंचित केसा।

*अर्थ* - आपके शरीर का रंग सोने की तरह चमकीला है, सुवेष यानी अच्छे वस्त्र पहने हैं, कानों में कुंडल हैं और बाल संवरे हुए हैं।

आज के दौर में आपकी तरक्की इस बात पर भी निर्भर करती है कि आप रहते और दिखते कैसे हैं। फर्स्ट इंप्रेशन अच्छा होना चाहिए।

अगर आप बहुत गुणवान भी हैं लेकिन अच्छे से नहीं रहते हैं तो ये बात आपके करियर को प्रभावित कर सकती है। इसलिए, रहन-सहन और ड्रेसअप हमेशा अच्छा रखें।

आगे पढ़ें - हनुमान चालीसा में छिपे मैनेजमेंट के सूत्र...

*सिर्फ डिग्री काम नहीं आती*

बिद्यावान गुनी अति चातुर,
राम काज करिबे को आतुर।

*अर्थ* - आप विद्यावान हैं, गुणों की खान हैं, चतुर भी हैं। राम के काम करने के लिए सदैव आतुर रहते हैं।

आज के दौर में एक अच्छी डिग्री होना बहुत जरूरी है। लेकिन चालीसा कहती है सिर्फ डिग्री होने से आप सफल नहीं होंगे। विद्या हासिल करने के साथ आपको अपने गुणों को भी बढ़ाना पड़ेगा, बुद्धि में चतुराई भी लानी होगी। हनुमान में तीनों गुण हैं, वे सूर्य के शिष्य हैं, गुणी भी हैं और चतुर भी।

*अच्छा लिसनर बनें*

प्रभु चरित सुनिबे को रसिया,
राम लखन सीता मन बसिया।

*अर्थ* -आप राम चरित यानी राम की कथा सुनने में रसिक है, राम, लक्ष्मण और सीता तीनों ही आपके मन में वास करते हैं।
जो आपकी प्रायोरिटी है, जो आपका काम है, उसे लेकर सिर्फ बोलने में नहीं, सुनने में भी आपको रस आना चाहिए।

अच्छा श्रोता होना बहुत जरूरी है। अगर आपके पास सुनने की कला नहीं है तो आप कभी अच्छे लीडर नहीं बन सकते।

*कहां, कैसे व्यवहार करना है ये ज्ञान जरूरी है*

सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा।

*अर्थ* - आपने अशोक वाटिका में सीता को अपने छोटे रुप में दर्शन दिए। और लंका जलाते समय आपने बड़ा स्वरुप धारण किया।

कब, कहां, किस परिस्थिति में खुद का व्यवहार कैसा रखना है, ये कला हनुमानजी से सीखी जा सकती है।

सीता से जब अशोक वाटिका में मिले तो उनके सामने छोटे वानर के आकार में मिले, वहीं जब लंका जलाई तो पर्वताकार रुप धर लिया।

अक्सर लोग ये ही तय नहीं कर पाते हैं कि उन्हें कब किसके सामने कैसा दिखना है।

*अच्छे सलाहकार बनें*

तुम्हरो मंत्र बिभीसन माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना।

*अर्थ* - विभीषण ने आपकी सलाह मानी, वे लंका के राजा बने ये सारी दुनिया जानती है।

हनुमान सीता की खोज में लंका गए तो वहां विभीषण से मिले। विभीषण को राम भक्त के रुप में देख कर उन्हें राम से मिलने की सलाह दे दी।

विभीषण ने भी उस सलाह को माना और रावण के मरने के बाद वे राम द्वारा लंका के राजा बनाए गए। किसको, कहां, क्या सलाह देनी चाहिए, इसकी समझ बहुत आवश्यक है। सही समय पर सही इंसान को दी गई सलाह सिर्फ उसका ही फायदा नहीं करती, आपको भी कहीं ना कहीं फायदा पहुंचाती है।

*आत्मविश्वास की कमी ना हो*

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही, जलधि लांघि गए अचरज नाहीं।

*अर्थ* - राम नाम की अंगुठी अपने मुख में रखकर आपने समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई अचरज नहीं है।

अगर आपमें खुद पर और अपने परमात्मा पर पूरा भरोसा है तो आप कोई भी मुश्किल से मुश्किल टॉस्क को आसानी से पूरा कर सकते हैं।

आज के युवाओं में एक कमी ये भी है कि उनका भरोसा बहुत टूट जाता है। आत्मविश्वास की कमी भी बहुत है। प्रतिस्पर्धा के दौर में आत्मविश्वास की कमी होना खतरनाक है। अपनेआप पर पूरा भरोसा रखें।


आइये आज आपको माँ भारती के वीर सपूत बटुकेश्वर दत्त के बारे में कुछ जानकारी बता रहा हूँ कृपया इसे जन जन तक पहुचाये

बटुकेश्वर दत्त !🙏🏼

नाम याद है या भूल गए ??

हाँ, ये वही बटुकेश्वर दत्त हैं…… जिन्होंने भगतसिंह के साथ दिल्ली असेंबली में बम फेंका था और गिरफ़्तारी दी थी।

अपने भगत  पर तो जुर्म संगीन थे लिहाज़ा उनको सजा-ए-मौत दी गयी ।

पर बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास के लिए काला पानी (अंडमान निकोबार) भेज दिया गया
और मौत उनको करीब से छू कर गुज़र गयी। 

वहाँ जेल में भयंकर टी.बी. हो जाने से मौत फिर एक बार बटुकेश्वर पर हावी हुई
लेकिन वहाँ भी वो मौत को गच्चा दे गए।

कहते हैं
जब भगतसिंह,
राजगुरु
सुखदेव को
फाँसी होने की खबर जेल में बटुकेश्वर को मिली तो वो बहुत उदास हो गए।
इसलिए नहीं कि उनके दोस्तों को फाँसी की सज़ा हुई,,, बल्कि इसलिए कि
उनको अफसोस था कि उन्हें ही क्यों ज़िंदा छोड़ दिया गया !


1938 में उनकी रिहाई हुई और वो फिर से गांधी जी के साथ आंदोलन में कूद पड़े
लेकिन जल्द ही फिर से गिरफ्तार कर जेल भेज दिए गए और वो कई सालों तक जेल की यातनाएं झेलते रहे।

बहरहाल
1947 में देश आजाद हुआ और बटुकेश्वर को रिहाई मिली।

लेकिन
इस वीर सपूत को वो दर्जा कभी ना मिला … जो हमारी  सरकार और भारतवासियों से इसे मिलना चाहिए था।

आज़ाद भारत में बटुकेश्वर नौकरी के लिए दर-दर भटकने लगे।

 कभी सिगरेट बेची तो कभी टूरिस्ट गाइड का काम करके पेट पाला।
कभी बिस्किट बनाने का काम शुरू किया लेकिन सब में असफल रहे।


 कहा जाता है कि एक बार पटना में बसों के लिए परमिट मिल रहे थे !
उसके लिए बटुकेश्वर दत्त ने भी आवेदन किया !
परमिट के लिए जब पटना के कमिश्नर के सामने इस 50 साल के अधेड़ की  पेशी हुई तो उनसे कहा गया कि वे स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र लेकर आएं..!!!

भगत  सिंह के साथी की इतनी बड़ी बेइज़्ज़ती भारत में ही संभव है।


हालांकि बाद में
राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को जब यह बात पता चली तो कमिश्नर ने बटुकेश्वर से माफ़ी मांगी थी !✔

1963 में उन्हें विधान परिषद का सदस्य बना दिया गया ।

लेकिन
इसके बाद वो राजनीति की चकाचौंध से दूर  गुमनामी में जीवन बिताते रहे ।

सरकार ने इनकी कोई सुध ना ली।

1964 में जीवन के अंतिम पड़ाव पर बटुकेश्वर दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में कैंसर से जूझ रहे थे तो उन्होंने अपने परिवार वालों से एक बात कही थी-
"कभी सोचा ना था कि जिस दिल्ली में मैंने बम फोड़ा था उसी दिल्ली में एक दिन इस हालत में स्ट्रेचर पर पड़ा होऊंगा।"


इनकी दशा पर
इनके मित्र चमनलाल ने एक लेख लिख कर देशवासियों का ध्यान इनकी ओर दिलाया कि-
"किस तरह एक क्रांतिकारी  जो फांसी से बाल-बाल बच गया जिसने कितने वर्ष देश के लिए कारावास भोगा , वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एड़ियां रगड़ रहा है और उसे कोई पूछने वाला नहीं है।"

बताते हैं कि इस लेख के बाद सत्ता के गलियारों में थोड़ी हलचल हुई !

सरकार ने इन पर ध्यान देना शुरू किया
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

भगतसिंह की माँ भी अंतिम वक़्त में उनसे मिलने पहुँची।


भगतसिंह की माँ से उन्होंने सिर्फ एक बात कही-
"मेरी इच्छा है कि मेरा अंतिम संस्कार भगत की समाधि के पास ही किया जाए।उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई.

17 जुलाई को वे कोमा में चले गये और 20 जुलाई 1965 की रात एक बजकर 50 मिनट पर उनका देहांत हो गया !

भारत पाकिस्तान सीमा के पास पंजाब के हुसैनीवाला स्थान पर
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की समाधि के साथ ये गुमनाम शख्स आज भी सोया हुआ है।



मुझे लगता है भगत ने बटुकेश्वर से पूछा तो होगा-
दोस्त मैं तो जीते जी आज़ाद भारत में सांस ले ना सका, तू बता आज़ादी के बाद हम क्रांतिकारियों की क्या शान है भारत में......!!

Sunday, 3 June 2018

कॉंग्रेस चिल्लाती है राजीव गांधी भारत मे कंप्यूटर लेकर आये ?? मैं बताता हूं , भारत में सबसे पहले कंप्यूटर सन , 1952 में Dr.Dwijish Dutta द्वारा  कोलकाता में भारतीय विज्ञान संस्थान के अन्दर लगाया गया था जो एक एनालोग कंप्यूटर था, उस समय राजीव गांधी मात्र 8 वर्ष का था । भारत में वास्तव में कंप्यूटर युग की शुरुआत सन 1956 में हुई ,  जब कोलकाता भारतीय विज्ञान संस्थान के अन्दर डिजिटल कंप्यूटर HEC – 2M लगाया था यह  भारत का पहला इलेक्ट्रोनिक कंप्यूटर था इस कंप्यूटर के आने के बाद भारत जापान के बाद एशिया का दूसरा ऐसा देश बन गया था जिसने कंप्यूटर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया  था , इस समय राजीव गांधी की उम्र मात्र 12 साल थी । फिर सन 1958 में “URL” नामक का एक  कंप्यूटर भारतीय सांख्यिकी संस्थान कोलकाता में लगाया गया जो आकार में HEC – 2 M से भी बड़ा था इस कंप्यूटर को रूस से खरीदा गया था और सन, 1964 में इन दोनों कंप्यूटर का इस्तेमाल बंद कर दिया , मतलब जब राजीव 20 के हुए , तब इन कंप्यूटर्स का इस्तेमाल बन्द भी हो गया , क्योकि उस समय  IBM ने अपना  पहला कंप्यूटर IBM 1401 भारतीय सांख्यिकी संस्थान कोलकाता में लगाया जो IBM 1400 सीरीज का पहला कंप्यूटर था जो एक डाटा प्रोसेसिंग सिस्टम कंप्यूटर था  जिसे  IBM  ने  सन 1959 में बनाया था , अभी तक जितने भी कंप्यूटर बने थे सभी दूसरे देशों से खरीदा गया था भारत में एक भी नही बना था लेकिन लालबहादुर शास्त्री जी के कार्यकाल सन 1966  में  भारत की दो संस्थाओं भारतीय सांख्यिकी संस्थान तथा जादवपुर यूनिवर्सिटी द्वारा मिलकर भारत के अन्दर पहला कंप्यूटर बनाया इसका नाम ISIJU रखा गया और HEC – 2M तथा ISIJU में एक अंतर था URAL HEC – 2M तथा URAL दोनों ही वैक्यूम ट्यूब युक्त कंप्यूटर थे जबकि ISIJU एक ट्रांजिस्टर युक्त कंप्यूटर था और इस समय राजीव गांधी की उम्र मात्र 22 साल की थी और राजीव गांधी उस वक़्त अपनी अय्याशियों में चूर थे 25 फरवरी 1968 को राजीव गांधी , सोनिया को भारत ले आये , इससे सिद्ध होता है राजीव गांधी ने देश को सोनिया और पप्पू ही दिया क्योंकि भारत 1966 में ही कंप्यूटर के मामले में आत्मनिर्भर हो चुका था

पेट्रोल पेट्रोल के लिए रोने वालो यह पोस्ट पढो

रोहिंग्या को क्या, हर किसी को आने दो लेकिन मुझे पेट्रोल सस्ता दे दो

कांग्रेस जैसे जमकर घोटाले करो लेकिन मुझे पेट्रोल सस्ता दे दो

सड़कों का जाल मत बिछाओ, अच्छी सड़कें मत दो लेकिन मुझे पेट्रोल सस्ता दे दो

कश्मीर में आतंकियों को भले ही मत मारो लेकिन मुझे पेट्रोल सस्ता दे दो

चीन को डोकलाम क्या दिल्ली तक आने दो लेकिन मुझे पेट्रोल सस्ता दे दो

देश के उन करोडों गांवों को अंधेरे में रहने देते जो आज़ादी के बाद से आजतक अंधेरे में थे लेकिन मुझे पेट्रोल सस्ता दे दो

देश का खज़ाना लुटता है तो लुट जाय लेकिन मुझे पेट्रोल सस्ता दे दो

देश की सुरक्षा के लिए कांग्रेस हथियार नहीं खरीदती थी, तुम भी मत खरीदो लेकिन मुझे पेट्रोल सस्ता दे दो

गाँव की औरतें पहले भी चूल्हा फूँकती थीं, उन्हें फूँक फूँककर मर जाने दो, उनको गैस सिलिंडर मत दो लेकिन मुझे पेट्रोल सस्ता दे दो

कांग्रेस ने 26/11 जैसे हमले का भी बदला नहीं लिया था फिर भी हमने उसे दुबारा सत्ता में बिठा दिया था, तुमने उरी हमले का बदला ले लिया, आज के बाद मत करना, हम तुम्हें भी दुबारा सत्ता दे देंगे लेकिन मुझे पेट्रोल सस्ता दे दो

मुझे टैक्स चोरी करने दो, बड़े बड़े बंगले बनाने दो, महँगी महँगी गाड़ियाँ खरीदने दो कोई पूछताछ मत करो लेकिन मुझे पेट्रोल सस्ता दे दो

कांग्रेस ने 2G, कोलगेट, कॉमनवेल्थ जैसे अरबों खरबों के घोटाले किये तुम भी करो, क्या ज़रूरत है विकास करने की, बुलेट ट्रेन लाने की लेकिन मुझे पेट्रोल सस्ता दे दो

मुझसे ग़लती हो गई मैं जोश जोश में अच्छी सड़कें, बेहतर टैक्स प्रणाली, भ्रष्टाचार मुक्त भारत, देशभक्ति, सैनिकों की हमदर्दी, कश्मीर में आतंकियों के मारे जाने की बातें करता था, अब माफ कर दो, लेकिन मुझे पेट्रोल सस्ता दे दो

अब बस करो मोदी जी, अटलजी ने बहुत अच्छा काम किया था लेकिन बावजूद इसके हमने 10 साल कांग्रेस को मौक़ा दिया। इंडिया शाइनिंग के ख़िलाफ़ मीडिया खड़ा था, आपके विकास के ख़िलाफ़ हम खड़े हैं। अटलजी की सरकार तो हमने केवल प्याज़ के दामों में ही गिरवा दी थी और ग़रीब, सेवाभावी, देशभक्त कांग्रेस की झोली 10 सालों में भरवा दी थी, आप भी वो सब करो जो कांग्रेस करती थी, खूब लूटो और लुटाओ, खाओ और खाने दो..

लेकिन मुझे पेट्रोल सस्ता दे दो
लेकिन मुझे पेट्रोल सस्ता दे दो
लेकिन मुझे पेट्रोल सस्ता दे दो..
🇮🇳👏👏🙏🏼👏👏🇮🇳
संघ और सियासत
कल दोपहर को एक भाई साहब मिले।
मुझे रोकते हुए बोलते हैं कि आजकल संघ वालों की जमकर चांदी है। हर जगह CM संघ का, PM संघ का, मंत्री संघ के है।
खैर, मेने मुस्कुराते हुए सुनकर भी उनकी बात को टाल दिया। लेकिन सोचने वाली बात है। हर्ष हमे भी होता है जब एक स्वयंसेवक देश की कोई जिम्मेदारी का निर्वहन करता है। उसका दायित्व सम्हालता है।

लेकिन हम सामान्य लोगों का एक सामान्य स्वभाव है। कि हम किसी भी व्यक्ति की सफलता देखते हैं। और उसके संघर्षों को अनदेखा कर देते हैं।

आज सबको मोदी व योगी का युवाओं में क्रेज दिखता है। लेकिन उनकी तपस्या, उनका त्याग, उनका समर्पण भी देखना चाहिए।

मनोहर पर्रिकर, देवेंद्र फड़नवीस, रघुवरदास, त्रिवेंद्र सिंह रावत, मनोहर खट्टर की सादगी भी देखनी चाहिए। किस तरह पर्रिकर देश के सबसे ज्यादा शो ऑफ करने वाले VVIP लोगों के पसंदीदा राज्य के मुखिया होकर भी सादगी और गरिमा पूर्ण ढंग से रहते हैं।

दूसरी और आज हम देखते हैं कुछ छुट भैया नेताओं को अगर वो किसी शहर के पार्षद भी बन जाएं तो 4 पहिया वाहन के बिना नहीं चलते हैं।

यह अंतर है, इन नामों और हम सामान्य लोगों में,

आप को मोदी की सफलता दिखती है। लेकिन दूसरा पहलू भी तो देखिये। आज उनके समकक्ष जो विरोधी राजनेता हैं, युवराज, और दिल्ली के CM जितनी इन दोनों की आयु है, उससे ज्यादा समय से मोदी इस देश, समाज के लिए काम कर रहे हैं।

जब हमारे बच्चे 12th के बाद किस कॉलेज में प्रवेश लें इस कशमकश में फंसे होते हैं, उस आयु में इन लोगों ने देश और समाज के लिए अपना घर-परिवार छोड़ने का निर्णय ले लिया था।

हम इन जैसे बनना चाहते हैं। लेकिन क्या उनके रास्ते पर चलना चाहते हैं ?

मुझे याद है,

आज से 4-5 साल पहले अगर आप कुर्ता पहन लें तो आपके दोस्त मजाक उड़ाते थे। क्योकि इसे बूढ़ों का पहनावा कहा जाता था। लेकिन आज युवा इसे गर्व से पहनते हैं।

कल तक आप गले में माला पहनकर स्कूल, कालेज नही जा पाते थे। क्योकि आपको बैकवर्ड सोच का कह दिया जाता था, लेकिन आज जब देश के मुखिया रुद्राक्ष की माला गले में धारण करते है, तो उनको देखकर लाखों युवा माला पहनते हैं।

मुझे याद है,

अभी कुछ समय पूर्व तक आप अगर युवा हे तो गले में गमछा डालने में शरमाते थे। लेकिन जब देश के प्रधान गले में भगवा गमछा डालते है, तो आज उनका अनुसरण करते हुए करोड़ों युवा भगवा गमछा गले में डालते हैं।

आज आप नजदीकी बाजार चले जाइए, इस वर्ष भगवा गमछों की भरमार है और आपको एक विशेष बात बताता चलु कि जहाँ सामान्य लोगों की सोचने  समझने की सीमा समाप्त होती है, वहां से एक स्वयंसेवक सोचना प्रारम्भ करता है।

आज आप जो सादा जीवन जीने वाले CM देख रहे हैं न, वह भविष्य की तैयारी है।

आप दुनिया में संचार क्रांति देख चुके हैं, आप दुनिया में सत्ता परिवर्तन की क्रांति देख चुके हैं, आप योग क्रांति देख चुके हैं

लेकिन अब चरित्र क्रांति आने वाली है और संसार के सभी विशेषज्ञ इसे स्वीकार रहे हैं।

और मुझे और हर भारतीय को उस दिन गर्व होगा, जब योग क्रांति की ही तरह चरित्र क्रांति की अगुवाई भी भारत ही करेगा।

कल तक जिस राजनीति को हम कीचड़ समझते थे, आज वह साफ़ और निर्मल होने जा रही है। और यह हमारा सौभाग्य है कि हमारी पीढ़ी उन क्षणों की  साक्षी बनेगी।

बात रही संघ की,

तो संघ के विषय में में भी इतना ही देखा और समझा हूँ,

संघ कुछ नही करता, सिर्फ शाखा लगाता है,,,

और स्वयंसेवक के साथ राष्ट्र निर्माण करता है।

संघे शक्ति युगे युगे

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि….