Thursday, 26 September 2019

मैं एक सनातनी हूँ, सनातन मेरा धर्म, सनातनी मेरी राष्ट्रीयता।
मेरा राष्ट्रीय ध्वज है क्षात्र, ब्रह्म, शुद्र एवं वैश्य तेज युक्त वह भगवा ध्वज जिसे कभी सम्राट विक्रमादित्य ने हिन्दुकुश से लेकर अरब भूमि पर लहराया था।
"धर्म रक्षक"

मेरी राष्ट्रीयता मेरे धर्म  से जुडी है क्योंकि राष्ट्र तो बनते है बिगड़ते है। अखंड होते है, खंडित होते है पर मूल राष्ट्रीयता तो वह संस्कृति है जो इस महान अपराजेय व कालजयी सनातन धर्म से मिली है।
मेरे आदर्श मेरे नायक तो सनातन धर्म पताका को विश्व में फहराने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम, योगेश्वर श्री कृष्ण, महाऋषि गौतम, चरक, पाणिनि, जैमिनी, कणाद, चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य, आदि गुरु शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट, आचार्य चाणक्य, चंद्रगुप्त मौर्य, पुष्यमित्र शुंग, शिवजी महाराज, महाराणा प्रताप, गुरु गोविन्द सिंह, स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुष व युगपुरोधा है।
इस धर्म के सिद्धांतों आदर्शों ने ही इस मातृभूमि को संस्कृति के सर्वोच्च सिंहासन पर बिठाया था।
यदि ये धर्म न हो तो राष्ट्रीयता का कैसा बोध ?
धर्म नहीं रहेगा तो मैं भी इस राष्ट्र को मातृभूमि न मान कर साधारण भूमि मानूँगा। अतः मेरे लिए मेरा धर्म सर्वोच्च है।
धर्म रहा तो इस पृथ्वी पर कही न कही राष्ट्र बन जाएगा। नाम भी भारत वर्ष या आर्यावर्त रख लेंगे। पर धर्म न बचा तो राष्ट्र का अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा।
इसलिए हमारे पूर्वजों ने धर्म को आधार बना कर इस राष्ट्र का निर्माण किया।
जो कभी जम्बूद्वीप एशिया में फैला था। धर्म की सीमाएं सिमटी तो राष्ट्र भी आर्यावर्त (ईरान से इंडोनेशिया व मॉरीशस से मास्को) तक सिमट गया।
धर्म और संकुचित हुआ तो आज का भारत रह गया। सनातन धर्म सिमटता गया और राष्ट्र भी खंड खंड में खण्डित होता गया।
जो पाकिस्तान व बंगलादेश कभी हमारा भाग था वह आज खंडित हो गया क्योंकि वहाँ से धर्म लुप्त हुआ और राष्ट्रीयता का बोध समाप्त हो गया।
वर्तमान के राजनेताओं ने धर्म के स्थान पर राष्ट्र को प्रमुखता दी।
धर्मविहीन राष्ट्र कैसा होता है ???
ये आज के राष्ट्र को देखकर जान सकते हैं।
पहले न कोई निर्धन था यदि था तो मन में संतोष था।
धनी व्यक्ति दयालू तथा दानी प्रवृत्ति के थे। मन में न लोभ मोह था न ईर्ष्या एवं धर्म के प्रसार के कारण राष्ट्रीयता का भी बोध था।
इतनी निष्ठा उस समय चोरों में भी होती थी। आज वह निष्ठा समाज के रक्षकों से भी लुप्त हो गई क्योंकि धर्म नहीं रहा।
आज अधर्म फैला हुआ है इसलिए समाज में भी असंतोष भय निराशा का बोध है।
राष्ट्रीयता लुप्त है या किसी विशेष अवसर पर ही राष्ट्रभक्ति का बोध होता है।
ऐसे में यदि खंड खंड हो चुके राष्ट्र को बचाना है तो माध्यम धर्म को बनाना होगा।
जब धर्म व संस्कृति बचेगी तो ही ये राष्ट्र भी बचेगा।
अतः धर्म सर्वोपरि है, सनातन संस्कृति ही राष्ट्र का उद्धार करने की क्षमता रखती है।

धर्म की जय हो,
अधर्म का नाश हो,
प्राणियों में सद्भावना हो,
विश्व का कल्याण हो,
हर हर महादेव।

🔱🚩 जय हिन्दुत्व 🚩🔱

Monday, 23 September 2019

          सच की मजबूरी नहीं होती कि वो सबको कुछ खुश करता फिरे!

ट्रम्प ने Radical Islamic Terrorism से लड़ने की बात बोलने के बाद लंबा Pause दिया। उनके इस Pause के बाद भीड़ ने भी खड़े होकर तालियां बजाईं। मोदी सहित वहां मौजूद बाकी भारतीय अधिकारी भी खड़े हो गए। ट्रम्प ने Pause इसलिए दिया क्योंकि वो अपनी बात का असर देखना चाहते थे। Pause देकर वो एक ख़ास संदेश देना चाहते थे। Pause देकर उन्होंने ये भी जता दिया कि आखिर मैंने वो बोल दिया जो बहुत से लोग बोलने से बचते हैं। 

राष्ट्रपति बनने से तकरीबन 30 साल पहले ट्रम्प से एक इंटरव्यू में पूछा गया था कि आपको क्यों लगता है कि आप देश के राष्ट्रपति बन सकते हैं, तो उनका जवाब था, क्योंकि मैं Politically Incorrect हूं। मतलब मैं हमेशा वो बात नहीं बोलता जो 'आदर्श रूप' में बोलनी जानी चाहिए, बल्कि मैं वो बोलता हूं जिसे लोग सच मानते हैं, मगर मुख्यधारा (राजनीति और मीडिया) जिसके बारे में कभी बात नहीं करती। ट्रम्प के ये तेवर ही आज उनकी सबसे बड़ी ताकत हैं। इन्हीं तेवरों ने उन्हें अमेरिका का राष्ट्रपति बनाया। 

मगर भारत में सच को सच बोलना तो दूर इतने सालों तक हम उसे सच मानने को ही तैयार नहीं थे। उस मुख्यधारा ने कभी माना ही नहीं आतंकवाद को कोई धर्म हो सकता है। किसी खास तरह की मानसिकता आतंकवाद को बढ़ावा दे सकती है। और मोदी की जिस राजनीति को आज भी देश का एक वर्ग (राजनीति और वामपंथी मीडिया) गलत मानती है वो इसलिए लोकप्रिय हुई, क्योंकि उसने उस झूठ को सच मानने से इंकार कर दिया। 

उन्होंने ट्रम्प की तरह खुले शब्दों में भले न बोला हो लेकिन उसकी तरफ इशारा ज़रूर कर दिया। वो इशारा जिसे बहुत से लोग साम्प्रदायिक राजनीति कहते हैं। क्योंकि उनके हिसाब से जो धर्मनिरपेक्ष राजनीति है उसमें किसी को बुरा नहीं कहा जाता। हमेशा यही बोला जाता है कि सभी अच्छे हैं। हज़ारों सालों से गंगा-जमनी तहज़ीब है, कोई भी धर्म नफरत नहीं सिखाता, जैसी मीठी-मीठी बातें बोली जाती हैं। उन्हें लगता है कि किसी को भी ऐसा सच बोलने से परहेज़ करना चाहिए या उसे इग्नोर करना चाहिए जिससे कोई खास पक्ष शर्मिंदा हो। भले उसने उस शर्मिंदगी से बचने के लिए आज तक कुछ भी क्यों न किया हो। 

यही वो सोच है जो मानती है कि धर्मनिपरेक्षा की रक्षा में आप बहुसंख्यक को कुछ भी कह सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे गली के झगड़े में कोई महिला झूठा बड़प्पन दिखाने के लिए हर बार अपने ही बच्चे को डांट देती हो। महिला को लगता है कि उसके ऐसा करने से लगेगा कि देखा, वो बाकी माओं की तरह नहीं है। लोगों के ऐसा सोचने से महिला को सम्मान मिलेगा। और अगर वो कभी अपने बच्चे को सच मानकर उसका पक्ष लेगी तो लोग उसे भी बाकी महिलाओं की तरह आम और झगड़ालू मान लेंगे। 

महिला की तरह सम्मान की उस भूख ने कई सालों तक इस देश के मीडिया और राजनीतिक वो वैसा ही मक्कार बना दिया था। मगर देश की जनता उस बच्चे जितनी बदनसीब नहीं थी। बच्चा मां नहीं बदल सकता मगर जनता सत्ता बदल सकती है। जब वो जनता हद से ज़्यादा मजबूर हो गई। उसे विकल्प मिला, तो उसने सत्ता बदल दी। ये वो जनता थी जिसके अंदर सालों से पीड़ित होने के बावजूद छले जाने की पीड़ा थी। खुद को अकेला महसूस करने का दर्द था।

एक नेता को सफल या महान बनने के लिए कई पैमानों पर कामयाब होना पड़ता है। मोदी कई पैमानों पर खरे उतरे हैं और कईयों पर फेल भी हुए हैं। मगर ये एक पैमाना ऐसा है जिस पर बिना किसी शक ओ शुबाह के वो बेहद कामयाब हैं। उनके आने से उस पीड़ित जानता को तसल्ली मिली है। भले ही उनको पसंद न करने वाले लोग डिनायल मोड में जीते रहें मगर वो हर बदलते दिन के साथ ज्यादा लोकप्रिय और मज़बूत होते जा रहे हैं। 

वो मज़बूत हो रहे हैं क्योंकि आडवाणी की तरह उन्होंने कभी परवाह नहीं की कि मुझे भी Politically Correct होना है। जिन्ना को सबसे बड़ा देशभक्त बताकर कोई मिडिल पाथ चुनना है। क्योंकि उन्होंने माना, सच हमेशा लोकप्रिय नहीं होता। वो हमेशा बड़प्पन लिए नहीं आता। वो हमेशा मुंह का मीठा नहीं होता। सच हमेशा सच होता है और उसकी ऐसी कोई मजबूरी नहीं कि वो हर किसी को खुश करता फिरे।


Monday, 16 September 2019

सभी आदरणीय मित्रों को जय श्री राम 8 दिन की तपस्या साधना में आर एस एस के प्राथमिक वर्ग 2019 में सम्मिलित हुआ ,इस कारण से मोबाइल नेटवर्क सोशल मीडिया घर परिवार से दूर तपस्या में था ,इस कारण सोशल मीडिया में संपर्क में नहीं था इन 8 दिनों में मैंने आर॰एस॰एस॰. को बहुत करीब से जाना सुप्रभात में समय से जगना नियमित दिनचर्या, नियमित अनुशासन ,बहुत ही बड़े विद्वानों का बौद्धिक प्राप्त हुआ ,बहुत सारी जानकारियां प्राप्त किया, मैं पूरी कोशिश करूंगा ,की इन 8 दिनों की तपस्या में जो मैंने सीखा है ,वह अपने समाज के लिए, अपने राष्ट्र के लिए ,अपने देश के लिए समर्पित रहूंगा ,और समाज और जातिवाद के टुकडे मे अलग-थलग  हुए लोगों को एक करूंगा और कोशिश करूंगा कि मेरे राष्ट्र के लिए मुझसे जो भी बन सकता है जो कुछ मैंने सीखा है उस ज्ञान को आगे बढ़ा कर और उन नियमों का पालन करूंगा जो मुझे सिखाया गया है।
प्रशिक्षण वर्ग का स्वयंसेवक तथा संगठन दोनों को लाभ होता है। वर्ग में आकर शिक्षार्थी पूरी तरह से संघ के वातावरण में डूब जाता है। संघ के प्रान्त से लेकर केन्द्रीय स्तर के वरिष्ठ कार्यकर्ता वहां उपलब्ध रहते हैं। वे सब भी वहीं रहते, खाते और अन्य गतिविधियों में शामिल होते हैं। उनके साथ औपचारिक तथा अनौपचारिक बातचीत में शिक्षार्थी की संघ संबंधी जानकारी बढ़ती है। उसके मन की जिज्ञासाओं का समाधान होता है। जो सदा उसके जीवन में लाभ देती है।
इसके साथ ही प्रत्येक स्वयंसेवक में कुछ प्रतिभा छिपी रहती है। कोई अच्छा वक्ता हो सकता है, तो कोई लेखक। कोई अच्छा गायक हो सकता है, तो कोई खिलाड़ी। किसी में तर्कशक्ति प्रबल होती है, तो किसी में श्रद्धा और समर्पण। वर्ग के कार्यक्रमों में उसकी यह प्रतिभा प्रकट होती है। अनुभवी कार्यकर्ता इसे पहचानकर उसे विकसित करने का प्रयास करते हैं। इसका लाभ स्वयंसेवक को जीवन भर होता है।
वर्ग में स्वयंसेवक की शारीरिक और मानसिक क्षमता बढ़ती है। इसका लाभ वर्ग के बाद उसकी शाखा को मिलता है। इससे शाखा की गुणवत्ता बढ़ती है तथा नये स्थानों पर शाखाओं का विस्तार होता है। वर्ग में सब एक साथ रहते, खेलते और खाते-पीते हैं। पड़ोसी स्वयंसेवक किस जाति और क्षेत्र का है, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। वह किसान है या मजदूर, वकील है या डाक्टर, छात्र है या व्यापारी, नौकरी करता है या बेरोजगार, धनी है या निर्धन, शिक्षित है या अशिक्षित, ये सब बातें गौण हो जाती हैं। सबके मन में यही भाव रहता है कि स्वयंसेवक होने के नाते हम सब भाई हैं। भारत माता हम सबकी माता है।
वर्ग के अनुशासन और दिनचर्या का स्वयंसेवक के जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। घर में वह अपने मन से सोता, जागता, खाता और रहता है; पर वर्ग में वह धरती पर अपना बिस्तर लगाकर सबके साथ रहता है। प्रातः चार बजे से रात दस बजे तक की कठिन दिनचर्या का पालन करता है। अपने बर्तन और कपड़े स्वयं धोता है। भोजन अति साधारण और निश्चित समय पर होता है। वर्ग में प्रत्येक शिक्षार्थी को अपनी बारी आने पर भोजन वितरण भी करना होता है। इस प्रकार उनमें स्वावलम्बन की भावना का विकास होता है। इससे स्वयंसेवक जीवन के किसी क्षेत्र में कभी मार नहीं खाता।
इसे पढ़कर शायद कुछ लोगों को लगे कि ये व्यवस्थाएं संघ के खर्चे से होती हैं ? जी नहीं। इसके लिए हर शिक्षार्थी से शुल्क लिया जाता है। अपने साबुन, तेल, मंजन आदि का प्रबंध भी शिक्षार्थी स्वयं ही करते हैं। वर्ग की व्यवस्था संभालने के लिए बड़ी संख्या में अनुभवी कार्यकर्ता भी वहां रहते हैं। उनमें से अधिकांश शारीरिक और बौद्धिक शिक्षण की व्यवस्था देखते हैं, जबकि बुजुर्ग कार्यकर्ता भोजनालय, जल, चिकित्सा, यातायात, कार्यालय आदि की चिन्ता करते हैं। ये सब भी अपना शुल्क देते हैं।
ग्रीष्मावकाश में ऐसे वर्ग कुछ अन्य संस्थाएं भी आयोजित करती हैं; पर वे सरकारी पैसे से पिकनिक का साधन मात्र बनकर रह जाते हैं। इनमें भाग लेने वालों का उद्देश्य जैसे-तैसे कुछ प्रमाण पत्र पाना ही होता है, जिससे भविष्य में नौकरी या पदोन्नति आदि में सहायता मिल सके। जबकि संघ के प्रशिक्षण वर्गों में शिक्षार्थी यह सोचकर आता है कि उसे अपने क्षेत्र की शाखा को प्रभावी बनाने के लिए प्रशिक्षण लेना है। इसलिए वह पूर्ण मनोयोग से प्रत्येक कार्यक्रम में भाग लेता है। वह किसी के दबाव या लालच से नहीं, अपितु अपनी इच्छा से वर्ग में आता है। इसलिए अन्य संस्थाओं के वर्गों में जहां उच्छृंखलता व्याप्त रहती है, वहां संघ के प्रशिक्षण वर्ग में चारों ओर प्रेम और अनुशासन की गंगा बहती दिखायी देती है।
जिस स्थान पर वर्ग लगते हैं, वहां की शाखा और कार्यकर्ताओं को भी इससे लाभ होता है। वर्ग के लिए कई तरह की व्यवस्थाएं करनी होती हैं। समाज के प्रभावी लोगों तथा संस्थाओं से सम्पर्क कर वर्ग के लिए साधन जुटाने होते हैं। अतः निष्क्रिय कार्यकर्ता भी सक्रिय हो जाते हैं। स्थानीय कार्यकर्ता नये-नये लोगों को वर्ग दिखाने के लिए लाते हैं। इससे वे भी संघ से जुड़ते हैं। वर्ग के दौरान पथ-संचलन तथा सार्वजनिक समापन कार्यक्रम से स्थानीय हिन्दू समाज में उत्साह का निर्माण होता है।
इस प्रकार संघ शिक्षा वर्ग न केवल शिक्षार्थियों, अपितु व्यवस्थापकों और स्थानीय कार्यकर्ताओं के लिए भी वरदान बनकर आता है।

Thursday, 5 September 2019

ये GDP क्या बला है ??

100%सच
श्री राजीव दीक्षित जी के व्याख्यान के कुछ अंश

जब आप टूथपेस्ट खरीदते हैं तो GDP बढ़ती है परंतु किसी गरीब से दातुन खरीदते हैं तो GDP नहीं बढ़ती।
100% सच-
जब आप किसी बड़े होस्पीटल मे जाकर 500 रुपे की दवाई खरीदते हैं तो GDP बढ़ती है परंतु आप अपने घर मे उत्पन्न गिलोय नीम या गोमूत्र से अपना इलाज करते हैं तो जीडीपी नहीं बढ़ती।
100% सच
जब आप घर मे गाय पालकर दूध पीते हैं तो GDP नहीं बढ़ती परंतु पैकिंग का मिलावट वाला दूध पीते हैं तो GDP बढ़ती है।
100% सच
जब आप अपने घर मे सब्जिया उगा कर खाते हैं तो GDP नहीं बढ़ती परंतु जब किसी बड़े AC माल मे जाकर 10 दिन की बासी सब्जी खरीदते हैं तो GDP बढ़ती है।
100% सच
जब आप गाय माता की सेवा करते हैं तो GDP नहीं बढ़ती परंतु जब कसाई उसी गाय को काट कर चमड़ा मांस बेचते हैं तो GDP बढ़ती है।
रोजाना अखबार लिखा होता है कि भारत की जीडीपी 8 .7 % है कभी कहा जाता है के 9 % है ; प्रधानमंत्री कहते है की हम 12 % जीडीपी हासिल कर सकते है पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलम कहते थे की हम 14 % भी कर सकते है , रोजाना आप जीडीपी के बारे में पड़ते है और आपको लगता है की जीडीपी जितनी बड़े उतनी देश की तरक्की होगी ।
कभी किसी ने जानने की कौशिश की है कि ये जीडीपी है क्या ?
आम आदमी की भाषा में जीडीपी का क्या मतलब है ये हमें आज तक किसी ने नही समझाया । GDP actually the amount of money that exchanges hand . माने जो पैसा आप आदान प्रदान करते है लिखित में वो अगर हम जोड़ ले तो जीडीपी बनती है ।
अगर एक पेड़ खड़ा है तो जीडीपी नही बढती , लेकिन अगर आप उस पेड़ को काट देते है तो जीडीपी बढती है किउंकि पेड़ को काटने के बाद पैसा आदान प्रदान होता है , पर पेड़ अगर खड़ा है तो तो कोई इकनोमिक activity नही होती जीडीपी भी नही बढती ।
अगर भारत की सारे पेड़ काट दिया जाये तो भारत की जीडीपी 27 % हो जाएगी जो आज करीब 7 % है । आप बताइए आपको 27 % जीडीपी चाहिए या नही !
अगर नदी साफ़ बह रही है तो जीडीपी नही बढती पर अगर आप नदी को गंध करते है तो जीडीपी तीन बार बढती है । पहले नदी पास उद्योग लगाने से जीडीपी बढ गयी, फिर नदी को साफ़ करने के लिए हज़ार करोड़ का प्रोजेक्ट लेके ए जीडीपी फिर बढ गयी , फिर लोगो ने नदी के दूषित पानी का इस्तेमाल किया बीमार पड़े, डॉक्टर के पास गए डॉक्टर ने फीस ली , फिर जीडीपी बढ गयी ।
अगर आप कोई कार खरीदते है , आपने पैसा दिया किसी ने पैसा लिया तो जीडीपी बढ गयी, आपने कार को चलाने के लिए पेट्रोल ख़रीदा जीडीपी फिर बढ गयी, कार के दूषित धुआँ से आप बीमार हुए , आप डॉक्टर के पास गए , आपने फीस दी उसने फीस ली और फिर जीडीपी बढ गयी ।
जितनी कारे आयेगी देश में उतनी जीडीपी तीन बार बढ जाएगी और इस देश रोजाना 4000 ज्यदा कारे खरीदी जाती है , 25000 से ज्यादा मोटर साइकल खरीदी जाती है और सरकार भी इसकी तरफ जोर देती है क्योंकि येही एक तरीका है के देश की जीडीपी बढ़े।
हर बड़े अख़बार में कोका कोला और पेप्सी कोला का advertisement आता है और ये भी सब जानते है के ये कितने खतरनाक और जहरीला है सेहत के लिए पर फिर भी सब सरकारे चुप है और आँखे बंध करके रखा है क्योंकि जब भी आप कोका कोला पीते है देश की जीडीपी दो बार बढती है । पहले आप कोका कोला ख़रीदा पैसे दिया जीडीपी बढ गया , फिर पिने के बाद बीमार पड़े डॉक्टर के पास गए, डॉक्टर को फीस दिया जीडीपी बढ गयी ।
 इस मायाजाल को समझे ।