द्वितीय दिवस तृतीय कथांश से हमने क्या सीखा:-
1)गुरु विश्वामित्र श्री राम जी को बताते हैं कि वीर वही जो वीरता का प्रदर्शन अपने आडम्बर और अहंकार के लिए न करे, दिव्य अनुसंधान की प्राप्ति भी सरलतापूर्वक ही होती है, गुरु दक्षिणा में मुनि श्रेष्ठ ने भी परहित ही मांगा:-किसी भी निर्दोष मनुष्य का अपनी वीरता से संरक्षण करना ही मेरी सबसे बड़ी दक्षिणा होगी।
2) जब क्षत्रिय रक्षक संरक्षक हो तो अपने तपकर्म से अनुसंधानकर्ता नये प्रयोग कर उपाय खोज लेता है वहाँ श्री राम ने संरक्षण किया और ऋषियों ने अनुसंधान किया यहाँ सेना और पुलिस संरक्षक है और डाॅक्टर और वैज्ञानिक अनुसंधानकर्ता ।।
3) पीढियाँ बीत जाती है कुल को तारने के लिए लेकिन जब तक दृढ़ निश्चय नही किया जाये तब तक तप कर्म अधिक अवधि तक नही होते अर्थात अधिक अवधि तक भगीरथ जी द्वारा किया तपकर्म ही माँ गंगा के वेग को आदिदेव की जटाओं के माध्यम से धरती तक नियंत्रित कर पाया ।
4) दूसरे के प्रति किया गया छ्ल मृत्युदंड ही देता है वह छ्ल जिसके प्रति किया गया है और जिसने किया है दोनो को नष्ट कर देता है अत: सजग रहे कभी भी आपकी गलती दो परिवारों या दो व्यक्तियों के विनाश का कारण न बने।
5) कितना भी बड़ा राजा हो मर्यादा उसका सबसे कुशल शस्त्र होती है इसलिये श्री राम जी ने गुरु आज्ञा से पुष्प लाने के पूर्व उस माली से आज्ञा ली जिसके अधिकार क्षेत्र में वाटिका थी इसके अलावा गुरु पास हो तो उनकी सेवा और बड़े भ्राता साथ हो तो उनकी सेवा परम कर्तव्य है यह आज बहुत ही प्रेमपूर्वक सिखाया गया।
इसके अलावा माँ गौरी की पूजन कुंवारी कन्या ही करे जो रीति आज भी विवाह के पूर्व मातापूजन के नाम से निभाई जाती हैं अर्थपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया ।।🙏।।
रामायण के चतुर्थ कथांश से आपका क्या अभिप्राय है??
1) स्वयंवर के पूर्व ही श्री राम ने अपने अनुज को पूर्वाभास करा दिया कि परीक्षा की घड़ी में उत्तेजित नही होते,,तत्पश्चात् ये बात उन्होनें श्री परशुराम जी से संवाद तक स्मरण रखी और बाल्य चपलता कर श्री परशुराम जी के आवेश को शनै:-शनै: अहंकार की सीमा तक लेकर आये।
2) स्वयंवर के समय सभी ने श्री राम की शक्ति का आंकलन किया राजाओं ने अहंकारवश तथा महारानी सुनयना जी और जनक जी ने अधीर होकर। जबकि राजहठ पूरा न होते देख धीरज रखना चाहिए न कि अधीर होना चाहिये:- जिसका पालन आज योगी आदित्यनाथ जी सबसे बड़ा राज्य होने के बाद और मोदी जी , अमित शाह जी पूरे देश के लिए कर रहे हैं ।
3) अन्तर्मन के उद्गार हमेशा निराश होने पर ही फूटते है जैसे सभी राजाओं की निर्बलता और अहं देखकर राजा जनक जी के उद्गार फूट पड़े।
4) समय देखकर निर्णय लेना प्रभु की सबसे बड़ी आज्ञा होती हैं जैसे गुरु विश्वामित्र जी ने श्री राम को आज्ञा देने का निर्णय लिया, और मर्यादा का पालन कर सीता जी के प्रेम की अधीरता चित्त में होते हुए भी श्री राम बिना गुरु की आज्ञा के नही उठे।
5) सर्वप्रथम अपने से बड़े का सामना हो तो स्वयं को उनका दास बना लो ये श्री रामजी ने बताया, क्योकि बिना रणभूमि के किसी सभा में क्रोध को क्रोध नही अपितु प्रेम और वात्सल्य ही नियन्त्रित कर सकता है।
6) क्षत्रिय का धर्म स्त्री,गौ,और ब्राह्मण की रक्षा करना होता है आज ये परिस्थिति हमसे विमुख है , क्षत्रिय श्रेष्ठ होकर भी मर्यादा का पालन कर इन्हे प्राथमिकता देता है । ब्राह्मण अपनी आत्मरक्षा के स्त्रोत सदैव पूर्व दिशा में रखता है श्री परशुराम जी की आत्मरक्षा का स्त्रोत ही क्रोध बन चुका था, लेकिन उस क्रोध के संचय ने अहंकार को जन्म दे दिया। इसलिये जरूरत समाप्त होने पर श्री परशुराम जी ने उस पर श्री राम जी से बाण सन्धान करवाया।
श्री राम ने ससुर जी को भी पिता की संज्ञा दी और उनके पैर छुए आज ये रीति विपरीत हो गई समय के साथ जो कि निराशाजनक है। संस्कारवश मैं कभी पराई स्त्री, और सास-ससुर जी से पैर नही छुआता तो मैने स्वयं को यहाँ सही पाया🙏
1)गुरु विश्वामित्र श्री राम जी को बताते हैं कि वीर वही जो वीरता का प्रदर्शन अपने आडम्बर और अहंकार के लिए न करे, दिव्य अनुसंधान की प्राप्ति भी सरलतापूर्वक ही होती है, गुरु दक्षिणा में मुनि श्रेष्ठ ने भी परहित ही मांगा:-किसी भी निर्दोष मनुष्य का अपनी वीरता से संरक्षण करना ही मेरी सबसे बड़ी दक्षिणा होगी।
2) जब क्षत्रिय रक्षक संरक्षक हो तो अपने तपकर्म से अनुसंधानकर्ता नये प्रयोग कर उपाय खोज लेता है वहाँ श्री राम ने संरक्षण किया और ऋषियों ने अनुसंधान किया यहाँ सेना और पुलिस संरक्षक है और डाॅक्टर और वैज्ञानिक अनुसंधानकर्ता ।।
3) पीढियाँ बीत जाती है कुल को तारने के लिए लेकिन जब तक दृढ़ निश्चय नही किया जाये तब तक तप कर्म अधिक अवधि तक नही होते अर्थात अधिक अवधि तक भगीरथ जी द्वारा किया तपकर्म ही माँ गंगा के वेग को आदिदेव की जटाओं के माध्यम से धरती तक नियंत्रित कर पाया ।
4) दूसरे के प्रति किया गया छ्ल मृत्युदंड ही देता है वह छ्ल जिसके प्रति किया गया है और जिसने किया है दोनो को नष्ट कर देता है अत: सजग रहे कभी भी आपकी गलती दो परिवारों या दो व्यक्तियों के विनाश का कारण न बने।
5) कितना भी बड़ा राजा हो मर्यादा उसका सबसे कुशल शस्त्र होती है इसलिये श्री राम जी ने गुरु आज्ञा से पुष्प लाने के पूर्व उस माली से आज्ञा ली जिसके अधिकार क्षेत्र में वाटिका थी इसके अलावा गुरु पास हो तो उनकी सेवा और बड़े भ्राता साथ हो तो उनकी सेवा परम कर्तव्य है यह आज बहुत ही प्रेमपूर्वक सिखाया गया।
इसके अलावा माँ गौरी की पूजन कुंवारी कन्या ही करे जो रीति आज भी विवाह के पूर्व मातापूजन के नाम से निभाई जाती हैं अर्थपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया ।।🙏।।
रामायण के चतुर्थ कथांश से आपका क्या अभिप्राय है??
1) स्वयंवर के पूर्व ही श्री राम ने अपने अनुज को पूर्वाभास करा दिया कि परीक्षा की घड़ी में उत्तेजित नही होते,,तत्पश्चात् ये बात उन्होनें श्री परशुराम जी से संवाद तक स्मरण रखी और बाल्य चपलता कर श्री परशुराम जी के आवेश को शनै:-शनै: अहंकार की सीमा तक लेकर आये।
2) स्वयंवर के समय सभी ने श्री राम की शक्ति का आंकलन किया राजाओं ने अहंकारवश तथा महारानी सुनयना जी और जनक जी ने अधीर होकर। जबकि राजहठ पूरा न होते देख धीरज रखना चाहिए न कि अधीर होना चाहिये:- जिसका पालन आज योगी आदित्यनाथ जी सबसे बड़ा राज्य होने के बाद और मोदी जी , अमित शाह जी पूरे देश के लिए कर रहे हैं ।
3) अन्तर्मन के उद्गार हमेशा निराश होने पर ही फूटते है जैसे सभी राजाओं की निर्बलता और अहं देखकर राजा जनक जी के उद्गार फूट पड़े।
4) समय देखकर निर्णय लेना प्रभु की सबसे बड़ी आज्ञा होती हैं जैसे गुरु विश्वामित्र जी ने श्री राम को आज्ञा देने का निर्णय लिया, और मर्यादा का पालन कर सीता जी के प्रेम की अधीरता चित्त में होते हुए भी श्री राम बिना गुरु की आज्ञा के नही उठे।
5) सर्वप्रथम अपने से बड़े का सामना हो तो स्वयं को उनका दास बना लो ये श्री रामजी ने बताया, क्योकि बिना रणभूमि के किसी सभा में क्रोध को क्रोध नही अपितु प्रेम और वात्सल्य ही नियन्त्रित कर सकता है।
6) क्षत्रिय का धर्म स्त्री,गौ,और ब्राह्मण की रक्षा करना होता है आज ये परिस्थिति हमसे विमुख है , क्षत्रिय श्रेष्ठ होकर भी मर्यादा का पालन कर इन्हे प्राथमिकता देता है । ब्राह्मण अपनी आत्मरक्षा के स्त्रोत सदैव पूर्व दिशा में रखता है श्री परशुराम जी की आत्मरक्षा का स्त्रोत ही क्रोध बन चुका था, लेकिन उस क्रोध के संचय ने अहंकार को जन्म दे दिया। इसलिये जरूरत समाप्त होने पर श्री परशुराम जी ने उस पर श्री राम जी से बाण सन्धान करवाया।
श्री राम ने ससुर जी को भी पिता की संज्ञा दी और उनके पैर छुए आज ये रीति विपरीत हो गई समय के साथ जो कि निराशाजनक है। संस्कारवश मैं कभी पराई स्त्री, और सास-ससुर जी से पैर नही छुआता तो मैने स्वयं को यहाँ सही पाया🙏
No comments:
Post a Comment