कोरोना वैश्विक महामारी के कारण पलायन कर रहे मजदूरों के बारे में चर्चा करते है।
लोगों के पलायन के जो दृश्य लगातार सामने आ रहे हैं उसे देख कर द्रवित होना स्वाभाविक है। इस दृश्य को देखते ही कई सवाल दागे जाते हैं कि , देखो सरकार कितनी निष्ठुर है,,, गरीब की किसी को चिंता नहीं है,,, लोग भूख प्यास से मर रहे हैं किसी का ध्यान नहीं है,,,, हवाई जहाज से विदेशों में बैठे लोगों को लाया जा सकता है तो इन गरीबों को घर तक क्यों नहीं पहुंचाया जा सकता?? आदि आदि कई सवाल होते हैं,,
अब मैं जो बात लिखूंगा वह आपको असहज कर सकती है, बुरी लग सकती है, मुझे अंधभक्त की उपाधि दिला सकती है और साथ ही मेरी संवेदनशीलता पर भी सैकड़ों प्रश्न खड़े कर सकती है, फिर भी अपनी बात लिख रहा हूं।।
आखिर इन सवालों में सिर्फ सरकार को निशाना बनाना कहां तक उचित है क्या इस देश के लोगों की देश के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है,,,
लॉर्ड थॉमस बेबिंगटन मैकाले ने 2 फरवरी 1835 को ब्रिटेन की संसद में कहा था कि
"मैं भारत के कोने कोने में घूमा जहां मुझे एक भी व्यक्ति ना तो भिखारी मिला ना चोर मिला। भारत के लोग गुणवान और ऊंचे चरित्र के हैं क्योंकि वहां की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत इतनी उन्नत है कि उसे नष्ट किए बिना भारत को गुलाम बनाना संभव नहीं है"
और उसके बाद लॉर्ड मैकाले ने शिक्षा पद्धति लागू करते हुए लिखा कि "जो शिक्षा पद्धति मैं लागू कर रहा हूं उसके पाठ्यक्रम के अनुसार यहाँ के शिक्षित युवक देखने में हिंदुस्तानी लगेंगे किंतु उनका मस्तिष्क अंग्रेजियत से भरा होगा।"
अब_विषय_पर_आते_हैं,,,
जो मजदूर ट्रकों में 3000 से 8000 रुपए और इससे अधिक भी किराया देकर जा रहे हैं।
इतने पैसों के होते हुए वो भूख प्यास से परेशान कैसे हो सकते हैं?
सरकार ने तो कहा था कि जो जहां है वहीं रहे। तीन महीने का राशन भी दिया है, प्रत्येक शहर में स्थानीय प्रशासन और जो समाजसेवियों की भरमार है वो किसी को भूखा नहीं सोने दे रहे हैं तो यह तो साफ है कि इन्हें भूख के कारण पलायन करने विवश नहीं होना पड़ा। कई वर्षों से काम कर रहे अनेक मजदूर तो अपने घर भी बसा चुके थे।
लेकिन बीमारी के भय से और भविष्य की अनिश्चितता को देखकर चलने वाली अफवाहों ने पलायन की भेड़ चाल को विभीषिका में बदल दिया।
अब सोचिए कि ये गांव आकर आखिर कर क्या लेंगे? क्योंकि गांव में काम न होने से ही तो अन्य जिलों या प्रदेशों में गए थे। और क्या इनके गांव में बीमारी और संक्रमण का खतरा नहीं है? जब पूरी दुनिया इस बीमारी से अछूती नहीं है, भारत अछूता नहीं है, जो हाल अभी ये लोग जहां थे वहां का है वही हाल गांव का है, तो फिर वापस लौटने का मकसद क्या ? सिवाए भय और अज्ञानता के!!
अब यह जरूर हो गया है कि अभी तक संक्रमण से मुक्त रहे गांवों में भी संक्रमण का खतरा इन्होंने पैदा कर दिया है।
लोग इधर उधर न जाएं, संक्रमण न फैले इसलिए सरकार ने पब्लिक ट्रांसपोर्ट बन्द किए थे। लॉकडाउन का भी उद्देश्य यही है।
सरकार लोगों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने की व्यवस्था कर रही है। 10 मई तक ऐसे 5 लाख मजदूरों को सरकार ने अपने खर्चे पर गंतव्य तक पहुंचाया भी और इस तारीख तक सिर्फ चार हजार व्यक्तियों को ही विदेशों से विमान से स्वदेश (भारत) लेकर आए। संक्रमण न फैले इसलिए इन सभी को क्वॉरेंटाइन कराया गया। सरकार के यह प्रयास अभी भी जारी है लेकिन फिर भी मजदूर मानने तैयार नहीं है।
भारत के भीतर एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश या एक जिले से दूसरे जिले में फंसे होना और विदेशों में फंसे होना दो अलग अलग बातें हैं, दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। विदेश में फंसे रहना अधिक तकलीफ दायक है, वहां कोई अपना नहीं है ना सरकार, ना धर्म, ना धरती, ना जात, ना लोग।
यहां यह भी समझ लें कि विदेशों से आने वालों को क्वॉरेंटाइन करने के एवज में शुल्क लिया गया है। जबकि गरीबों से परिवहन का किसी तरह का कोई शुल्क नहीं लिया गया फिर चाहे किराया केंद्र_सरकार ने दिया हो, प्रदेश सरकार ने दिया हो, या कथित तौर पर हल्ला मचाने वाली कांग्रेस ने दिया हो,,,
लेकिन इन गरीब मजदूरों को सरकार की कोई बात नहीं मानना, इसलिए दस और पंद्रह गुना किराया देकर लोडिंग वाहनों में ठसाठस भरकर आ रहे हैं। सरकार को सूचना नहीं दे रहे, स्क्रीनिंग और क्वॉरेंटाइन से बचना चाह रहे हैं। अब सरकार क्या करे ?? विपक्ष तो सरकार के सिस्टम को फेल करने पर आमादा है ही उसे किसी के जीवन मृत्यु से कोई लेना देना नहीं है, उसका मकसद त्रासदी में भी राजनीति के सुनहरे अवसर तलाशना है।।
यदि सरकार इस पलायन को रोके तो कहा जाएगा कि मजदूरों की, गरीबों की सुनवाई नहीं हो रही। यानि जिन्हें सरकारों कोसना है वो हर हाल में सरकार को कोसेंगे।
इस भीड़ को देखकर सामान्य बुद्धि का आदमी भावुक है।
भावुक और भड़भडिया लोग भी शाब्दिक कोहराम मचाने में लगे हैं।।
ऐसे लोग ताना भी दे रहे हैं कि हमने सड़कों पर देखा है,,, हमने मजदूरों से बात की है,,, तुम क्या जानो उनका दर्द,,, घर में बैठे-बैठे बातें कर रहे हो। कुछ तो यहां तक बोलते हैं कि सच को सच कहना सीखो भाई साहब,,
जिन्हें सन 1947 के विभाजन के समय हिंदु मुस्लिम दंगों की वास्तविक त्रासदी नहीं पता कि उस समय 10 लाख हिंदू मारे गए थे और 75 हजार माता बहनों को अगवा कर लिया गया था वो भी कह रहे हैं कि सन 47 से बुरी हालत है।।
ठीक है भाई तर्क के लिए सारी बात मान ली,, लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कौन है???
ऐसे में यदि हम गहराई से सोचें और पूरे विश्व के हालातों पर नजर डालें, विकसित, अति विकसित देशों की स्थिति देखें तो हम पाएंगे कि इस महामारी से सरकार को नहीं जनता को ही निपटना होगा।
सरकार केवल बचाव के उपाय सुझाने, लोगों में जागरूकता लाने और उपलब्ध संसाधनों का अधिक से अधिक उपयोग करते हुए लोगों के कल्याण के उपाय कर सकती है इससे अधिक कुछ नहीं।
यह स्थिति ठीक वैसे ही है जैसे परिवार के किसी आयोजन में 500 लोगों को न्यौता दिया जाए और अचानक 2000 लोग आ जाएं। ऐसे में सभी के खाने-पीने, लाने ले जाने, रुकने की व्यवस्था मिनटों में नहीं हो पाएगी।
दरअसल गरीब और मजदूर सरकार की सुनने के लिए तैयार नहीं है, उनके सामने भी परिस्थिति विकट है। मकान किराया देने की स्थिति ना होने से, रोजगार का भविष्य अंधकार में दिखाई देने से या अन्य कारणों से ऐसे लोग सरकार की व्यवस्थाओं पर अविश्वास करते हुए अफवाहों का शिकार होकर तमाम प्रतिबंधों के बाद भी अपने घर लौट रहे हैं। ऐसे में सड़क पर सुविधाएं उपलब्ध कराना बहुत मुश्किल है।
फिर भी इस परिस्थिति को देखकर पेट्रोल पंपों पर पानी और कुछ न कुछ खाने की व्यवस्था सरकार ने की है।
कड़वी बात_यह है कि गरीब तो अभी जहां था वहां भी गरीब था अब जहां जा रहा है वहां भी गरीब रहेगा।
...तो फिर वो जहां था वही रहता और वहीं रहकर सरकार से लड़ता तो, ना पलायन की त्रासदी झेलना पड़ती और ना देश के लिए संकट की स्थिति बनती। लेकिन इतना कठोर सोचने के लिए ना तो गरीबों की सोच विकसित हो पाई और ना ही हम जैसे भावुक लोगों की क्योंकि हम मैकाले के कथन अनुसार जीवन जी रहे हैं।
आज देश के हर नागरिक की जिम्मेदारी यह है कि वह किसी भी स्थिति में कोरोना को फैलने से रोके फिर वह चाहे गरीब हो या अमीर जो कोरोना फैलाने की स्थिति निर्मित करेगा वह कहीं ना कहीं गलती ही कर रहा है।
आज सभी को सैनिक जैसी सोच रखने की जरूरत है।
शायद आज मेरी यह बात भावुक मन से समझ में ना आए लेकिन एक दिन इसे समझना ही होगा।
अब इस तरह सोचें
यदि सैनिक भी अपना घर, अपना गांव, अपना परिवार, अपना भविष्य, और सिर्फ अपने जीवन के बारे में सोचने लगेगा तो देश का क्या होगा???
सरकार के प्रतिबंधों के बाद भी जत्थे के जत्थे जाते देखकर यदि नाको पर खड़े पुलिस के जवान भी सोचने लगें कि जब लोग मानते ही नहीं तो हम यहां क्यों खड़े रहें, तब क्या होगा??
संक्रमण छुपाकर या संक्रमण फैला कर इधर उधर जा रहे लोगों को देखकर डॉक्टर कह दें कि जब इन्हें मरना ही है ये नहीं सुधर रहे तो हम जान जोखिम में डालकर इलाज क्यों करें, तब क्या होगा??
यदि सभी लोग केवल खुद के बारे में सोचने लगे और देश के सिस्टम को बिगाड़ने पर उतारू हो जाएं तो इस देश को सरकार तो ठीक है भगवान भी नहीं बचा सकते।।
इस देश के हर नागरिक को देश के प्रति जागरूक होना पड़ेगा फिर वह अमीर हो, गरीब हो, दलित हो, सवर्ण हो, अधिकारी हो या कर्मचारी हो।
(नोट - मेरे इस लेख से सहमत होना जरूरी नहीं है, लेकिन उम्मीद है कि इसे पूरा पढ़ने पर आप भावुकता को त्याग कर, सैनिक मन से विचार अवश्य करेंगे।)
लोगों के पलायन के जो दृश्य लगातार सामने आ रहे हैं उसे देख कर द्रवित होना स्वाभाविक है। इस दृश्य को देखते ही कई सवाल दागे जाते हैं कि , देखो सरकार कितनी निष्ठुर है,,, गरीब की किसी को चिंता नहीं है,,, लोग भूख प्यास से मर रहे हैं किसी का ध्यान नहीं है,,,, हवाई जहाज से विदेशों में बैठे लोगों को लाया जा सकता है तो इन गरीबों को घर तक क्यों नहीं पहुंचाया जा सकता?? आदि आदि कई सवाल होते हैं,,
अब मैं जो बात लिखूंगा वह आपको असहज कर सकती है, बुरी लग सकती है, मुझे अंधभक्त की उपाधि दिला सकती है और साथ ही मेरी संवेदनशीलता पर भी सैकड़ों प्रश्न खड़े कर सकती है, फिर भी अपनी बात लिख रहा हूं।।
आखिर इन सवालों में सिर्फ सरकार को निशाना बनाना कहां तक उचित है क्या इस देश के लोगों की देश के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है,,,
लॉर्ड थॉमस बेबिंगटन मैकाले ने 2 फरवरी 1835 को ब्रिटेन की संसद में कहा था कि
"मैं भारत के कोने कोने में घूमा जहां मुझे एक भी व्यक्ति ना तो भिखारी मिला ना चोर मिला। भारत के लोग गुणवान और ऊंचे चरित्र के हैं क्योंकि वहां की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत इतनी उन्नत है कि उसे नष्ट किए बिना भारत को गुलाम बनाना संभव नहीं है"
और उसके बाद लॉर्ड मैकाले ने शिक्षा पद्धति लागू करते हुए लिखा कि "जो शिक्षा पद्धति मैं लागू कर रहा हूं उसके पाठ्यक्रम के अनुसार यहाँ के शिक्षित युवक देखने में हिंदुस्तानी लगेंगे किंतु उनका मस्तिष्क अंग्रेजियत से भरा होगा।"
अब_विषय_पर_आते_हैं,,,
जो मजदूर ट्रकों में 3000 से 8000 रुपए और इससे अधिक भी किराया देकर जा रहे हैं।
इतने पैसों के होते हुए वो भूख प्यास से परेशान कैसे हो सकते हैं?
सरकार ने तो कहा था कि जो जहां है वहीं रहे। तीन महीने का राशन भी दिया है, प्रत्येक शहर में स्थानीय प्रशासन और जो समाजसेवियों की भरमार है वो किसी को भूखा नहीं सोने दे रहे हैं तो यह तो साफ है कि इन्हें भूख के कारण पलायन करने विवश नहीं होना पड़ा। कई वर्षों से काम कर रहे अनेक मजदूर तो अपने घर भी बसा चुके थे।
लेकिन बीमारी के भय से और भविष्य की अनिश्चितता को देखकर चलने वाली अफवाहों ने पलायन की भेड़ चाल को विभीषिका में बदल दिया।
अब सोचिए कि ये गांव आकर आखिर कर क्या लेंगे? क्योंकि गांव में काम न होने से ही तो अन्य जिलों या प्रदेशों में गए थे। और क्या इनके गांव में बीमारी और संक्रमण का खतरा नहीं है? जब पूरी दुनिया इस बीमारी से अछूती नहीं है, भारत अछूता नहीं है, जो हाल अभी ये लोग जहां थे वहां का है वही हाल गांव का है, तो फिर वापस लौटने का मकसद क्या ? सिवाए भय और अज्ञानता के!!
अब यह जरूर हो गया है कि अभी तक संक्रमण से मुक्त रहे गांवों में भी संक्रमण का खतरा इन्होंने पैदा कर दिया है।
लोग इधर उधर न जाएं, संक्रमण न फैले इसलिए सरकार ने पब्लिक ट्रांसपोर्ट बन्द किए थे। लॉकडाउन का भी उद्देश्य यही है।
सरकार लोगों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने की व्यवस्था कर रही है। 10 मई तक ऐसे 5 लाख मजदूरों को सरकार ने अपने खर्चे पर गंतव्य तक पहुंचाया भी और इस तारीख तक सिर्फ चार हजार व्यक्तियों को ही विदेशों से विमान से स्वदेश (भारत) लेकर आए। संक्रमण न फैले इसलिए इन सभी को क्वॉरेंटाइन कराया गया। सरकार के यह प्रयास अभी भी जारी है लेकिन फिर भी मजदूर मानने तैयार नहीं है।
भारत के भीतर एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश या एक जिले से दूसरे जिले में फंसे होना और विदेशों में फंसे होना दो अलग अलग बातें हैं, दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। विदेश में फंसे रहना अधिक तकलीफ दायक है, वहां कोई अपना नहीं है ना सरकार, ना धर्म, ना धरती, ना जात, ना लोग।
यहां यह भी समझ लें कि विदेशों से आने वालों को क्वॉरेंटाइन करने के एवज में शुल्क लिया गया है। जबकि गरीबों से परिवहन का किसी तरह का कोई शुल्क नहीं लिया गया फिर चाहे किराया केंद्र_सरकार ने दिया हो, प्रदेश सरकार ने दिया हो, या कथित तौर पर हल्ला मचाने वाली कांग्रेस ने दिया हो,,,
लेकिन इन गरीब मजदूरों को सरकार की कोई बात नहीं मानना, इसलिए दस और पंद्रह गुना किराया देकर लोडिंग वाहनों में ठसाठस भरकर आ रहे हैं। सरकार को सूचना नहीं दे रहे, स्क्रीनिंग और क्वॉरेंटाइन से बचना चाह रहे हैं। अब सरकार क्या करे ?? विपक्ष तो सरकार के सिस्टम को फेल करने पर आमादा है ही उसे किसी के जीवन मृत्यु से कोई लेना देना नहीं है, उसका मकसद त्रासदी में भी राजनीति के सुनहरे अवसर तलाशना है।।
यदि सरकार इस पलायन को रोके तो कहा जाएगा कि मजदूरों की, गरीबों की सुनवाई नहीं हो रही। यानि जिन्हें सरकारों कोसना है वो हर हाल में सरकार को कोसेंगे।
इस भीड़ को देखकर सामान्य बुद्धि का आदमी भावुक है।
भावुक और भड़भडिया लोग भी शाब्दिक कोहराम मचाने में लगे हैं।।
ऐसे लोग ताना भी दे रहे हैं कि हमने सड़कों पर देखा है,,, हमने मजदूरों से बात की है,,, तुम क्या जानो उनका दर्द,,, घर में बैठे-बैठे बातें कर रहे हो। कुछ तो यहां तक बोलते हैं कि सच को सच कहना सीखो भाई साहब,,
जिन्हें सन 1947 के विभाजन के समय हिंदु मुस्लिम दंगों की वास्तविक त्रासदी नहीं पता कि उस समय 10 लाख हिंदू मारे गए थे और 75 हजार माता बहनों को अगवा कर लिया गया था वो भी कह रहे हैं कि सन 47 से बुरी हालत है।।
ठीक है भाई तर्क के लिए सारी बात मान ली,, लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कौन है???
ऐसे में यदि हम गहराई से सोचें और पूरे विश्व के हालातों पर नजर डालें, विकसित, अति विकसित देशों की स्थिति देखें तो हम पाएंगे कि इस महामारी से सरकार को नहीं जनता को ही निपटना होगा।
सरकार केवल बचाव के उपाय सुझाने, लोगों में जागरूकता लाने और उपलब्ध संसाधनों का अधिक से अधिक उपयोग करते हुए लोगों के कल्याण के उपाय कर सकती है इससे अधिक कुछ नहीं।
यह स्थिति ठीक वैसे ही है जैसे परिवार के किसी आयोजन में 500 लोगों को न्यौता दिया जाए और अचानक 2000 लोग आ जाएं। ऐसे में सभी के खाने-पीने, लाने ले जाने, रुकने की व्यवस्था मिनटों में नहीं हो पाएगी।
दरअसल गरीब और मजदूर सरकार की सुनने के लिए तैयार नहीं है, उनके सामने भी परिस्थिति विकट है। मकान किराया देने की स्थिति ना होने से, रोजगार का भविष्य अंधकार में दिखाई देने से या अन्य कारणों से ऐसे लोग सरकार की व्यवस्थाओं पर अविश्वास करते हुए अफवाहों का शिकार होकर तमाम प्रतिबंधों के बाद भी अपने घर लौट रहे हैं। ऐसे में सड़क पर सुविधाएं उपलब्ध कराना बहुत मुश्किल है।
फिर भी इस परिस्थिति को देखकर पेट्रोल पंपों पर पानी और कुछ न कुछ खाने की व्यवस्था सरकार ने की है।
कड़वी बात_यह है कि गरीब तो अभी जहां था वहां भी गरीब था अब जहां जा रहा है वहां भी गरीब रहेगा।
...तो फिर वो जहां था वही रहता और वहीं रहकर सरकार से लड़ता तो, ना पलायन की त्रासदी झेलना पड़ती और ना देश के लिए संकट की स्थिति बनती। लेकिन इतना कठोर सोचने के लिए ना तो गरीबों की सोच विकसित हो पाई और ना ही हम जैसे भावुक लोगों की क्योंकि हम मैकाले के कथन अनुसार जीवन जी रहे हैं।
आज देश के हर नागरिक की जिम्मेदारी यह है कि वह किसी भी स्थिति में कोरोना को फैलने से रोके फिर वह चाहे गरीब हो या अमीर जो कोरोना फैलाने की स्थिति निर्मित करेगा वह कहीं ना कहीं गलती ही कर रहा है।
आज सभी को सैनिक जैसी सोच रखने की जरूरत है।
शायद आज मेरी यह बात भावुक मन से समझ में ना आए लेकिन एक दिन इसे समझना ही होगा।
अब इस तरह सोचें
यदि सैनिक भी अपना घर, अपना गांव, अपना परिवार, अपना भविष्य, और सिर्फ अपने जीवन के बारे में सोचने लगेगा तो देश का क्या होगा???
सरकार के प्रतिबंधों के बाद भी जत्थे के जत्थे जाते देखकर यदि नाको पर खड़े पुलिस के जवान भी सोचने लगें कि जब लोग मानते ही नहीं तो हम यहां क्यों खड़े रहें, तब क्या होगा??
संक्रमण छुपाकर या संक्रमण फैला कर इधर उधर जा रहे लोगों को देखकर डॉक्टर कह दें कि जब इन्हें मरना ही है ये नहीं सुधर रहे तो हम जान जोखिम में डालकर इलाज क्यों करें, तब क्या होगा??
यदि सभी लोग केवल खुद के बारे में सोचने लगे और देश के सिस्टम को बिगाड़ने पर उतारू हो जाएं तो इस देश को सरकार तो ठीक है भगवान भी नहीं बचा सकते।।
इस देश के हर नागरिक को देश के प्रति जागरूक होना पड़ेगा फिर वह अमीर हो, गरीब हो, दलित हो, सवर्ण हो, अधिकारी हो या कर्मचारी हो।
(नोट - मेरे इस लेख से सहमत होना जरूरी नहीं है, लेकिन उम्मीद है कि इसे पूरा पढ़ने पर आप भावुकता को त्याग कर, सैनिक मन से विचार अवश्य करेंगे।)
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