Wednesday, 3 June 2020



केरल में 100% साक्षरता है,
जागरूकता 0% है,
"अरब वेस्ट लेफ्ट' कट्टरता क्रूरता तो 786% है।
पूरे राष्ट्र में दारू पीने में नम्बर 1 राज्य है,

पूरे राष्ट्र में सबसे अधिक अपराध , राजनैतिक हत्याएं वही होती है।

केरल में हिन्दु अब राजनीतिक रूप में अल्पंसख्यक है।
केरल में धर्मातरण सबसे अधिक हो रहा है।

केरल में जानवरों के ऊपर होती हिंसा कोई नई बात नही है। गर्भवती हथनी को पटाखों से भरा हुआ अनानास फल खिला दिया जो मुँह में ही फट गया , खून अधिक बहने से गर्भवती हथनी की मृत्यु हो गई, जिस इलाके में हुआ वहाँ 70% मजहबी है, वहाँ पहले भी कुत्ते बिल्ली पक्षी आदि की हत्या होती रही है, कुछ दिन पहले भी वहाँ एक हाथी मारा गया था।

सिर्फ अंग्रेजी भाषा का ज्ञान होना इसका मतलब 100% साक्षरता नही है। भारत मे अंग्रेजी भाषा अब स्टेटस सिंबल बन गया है जबकि असल मे यह सिर्फ गुलाम मानसिकता का स्टेटस सिम्बल है। अंदर से खोकले किरदार है।

आज भारत के अधिकतर पढे लिखे युवाओ को कम से कम 3 भाषाओ का ज्ञान है - क्षेत्रीय/राज्य भाषा, हिन्दी, अंग्रेजी। हमको इस बात पर गर्व होना चाहिए जबकि 'अमेरिका ब्रिटैन' की जनता को सिर्फ अंग्रेजी ही आती है। अंग्रेजी भाषा हमको अमेरिका आदि से व्यापार करने में मदद करती है।

"जापान यूरोप चीन" आदि राष्ट्र अपनी अपनी भाषाओ को बोलते है। वह सब विकसित राष्ट्र बने, वह अंग्रेजी सीखने बोलने से विकसित राष्ट्र नही बने, उनको अपनी "मातृभाषा राष्ट्रभाषा संस्कारो रीति रिवाजों पूर्वजो" पर गर्व था, उस आत्मविश्वास की वजह से आगे बढे।

'जापान जर्मनी इटली' तो WW2 में तानशाह राष्ट्र थे, वह WW2 में पूर्ण रूप से बर्बाद हो चुके थे परन्तु उन्होंने अपने इतिहास को अपना वर्तमान कभी नही बनने दिया। वह लोकतांत्रिक बने, वह विकसित राष्ट्र बने, पिछली गलतियों से सीख कर खुद में निरन्तर सुधार करते रहे ओर आगे बढे। वह अंग्रेज नहीं बने, वह इस बात को समझे कि गलती उस समय के तानाशाह नेतृत्व एवं तनाशाह सत्ता पक्ष की थी, गलती कभी भी हमारे "राष्ट्र समाज जनता पूर्वजो संस्कारो भाषा" की नही थी।

परन्तु हम उस बात को क्यूँ नही समझते, हमारे भारतिय समाज में जातिवाद एक भयंकर समस्या है, यह समस्या "अरबी आक्रमणकारियों, मुग़लो अंग्रेजो" के 1200 साल के शासन में खत्म क्यूँ नही हुई?? क्योंकि इनका मकसद ही हर समस्याओ को विकराल रूप देना था, गुलामो का कभी कोई विकास नही करता, गुलामो का सिर्फ शोषण होता है।

पहले शरीरिक गुलामी होती थी, अब मानसिक गुलामी होती है। शरीरिक गुलामी में कोहलू के बैल की तरह काम लिया जाता है जबकि मानसिक गुलामी में "मुर्गी बकरे" की तरह पिंजरे जंजीर में रख कर 'दाना चारा' खिला कर एक दिन हलाल किया जाता है।

मानसिक गुलामी में सच्चाई जीवन के अंतिम क्षणों में पता चलती है और शरीरिक गुलामी में सच्चाई हर क्षण पता चलती है।

शरीरिक गुलामी से व्यक्ति तो आजाद हो सकता है परन्तु मानसिक गुलामी से व्यक्ति को मृत्यु ही आजाद करवाती है।

परन्तु जागरूकता से अगर "मन और मस्तिष्क" के बंद दरवाजे खुल जाए, फिर व्यक्ति सत्य को 'देखना समझना जानना अपनाना' सीख जाए तो ही मानसिक गुलामी से बचा जा सकता है।

केरल में दारू पीने वाले 90% हिन्दू है जो अधिकतर वामपंथी है, नास्तिक होना फैशन है, नास्तिक बन कर सिर्फ हिन्दुओ को गाली दो, अरब वेस्ट को ताली दो, जब इनकी दारू पीकर जिंदगी होती बर्बाद, तब शरू होता अरब या वेस्ट में धर्मातरण का काम, इनकी महिला बच्चे जाते फादर या लोलवी के पास क्योंकि बापू है बेवड़ा नही अब किसी भी काम का।

आर्थिक रुप से बर्बाद परिवार की महिला बच्चो को तब ठेकेदार धर्मातरण भत्ता देते ताकि गुजर जाए इनका कठिन समय ताकि अगली पीढ़ी जब बड़ी हो तो वह अपनी कमाई से देगी इनको हर महीने दान। देखो, चल पड़ी दुकान। कुछ साल की इन्वेस्टमेंट, बाद में पूरी उम्र की कमाई। 

यही पंजाब में हो रहा है, दारू नशा पानी की तरह बिक रहा है, युवा और उनके परिवार बर्बाद हो रहे है, बर्बाद हुए परिवार ही धर्मातरण का शिकार हो रहे है। पँजाब अगले 15 वर्षो में अब भविष्य का केरल है।

पँजाब में 70% रिज़र्व समाज को वेस्ट में धर्मातरण करवाया जा रहा है। मुफ्त अंग्रेजी कान्वेंट शिक्षा का लालच आदि चीजो से प्रलोभन दिया जा रहा है। धर्मातरण की दुकान कुनबों के शासन में खुलेंआम काम करती है, भगवा (अकाली भाजपा) के शासन में छुप कर काम करती है।

यह कोई निस्वार्थ समाज सेवा नही है, यह तो मदद करने के बाद फिर धर्मातरण करके उनके अहसान का बदला चुकाने वाली बात है।

धर्मातरण के बाद इनको अपने पुराने "संस्कारो रीति रिवाजों राष्ट्र" के खिलाफ 'नफरत झूठ जहर' को भरा जाता है। हर शुक्रवार या रविवार इनका ब्रेनवाश किया जाता है, इनको कट्टरपंथी अलगावादी बनाया जाता है।

धर्मातरण के बाद सिर्फ एक हिंन्दु परिवार कम नही होता है बल्कि एक कट्टरपंथी परिवार का जन्म होता है जो अगली कई पीढ़ियों तक समाज मे हिन्दुओ और राष्ट्र के प्रति नफरत जहर को ही फैलायेगा।

इस कुकर्म मे जातिय ठेकेदार भी मिले होते है, उनको लोलवी - मादरी द्वारा अधिक से अधिक जनता को धर्मातरण करवाने के बदले माल में हिस्सा मिलता है। नेताओ को बना बनाया वोट बैंक मिलता है। ठेकेदार बस किसी बर्बाद परिवार को ढूंढते है, उसकी मजबूरियों को अपना फायदे के लिए उठाते है। यह समाजसेवा के नाम पर सिर्फ धर्मातरण का धंधा है।

इसका एक ही उपाय है कि हिन्दुओ (सनातन, सिख, जैन, बौद्ध, आर्य समाज आदि) अधिक से अधिक गरीब और बर्बाद हुए परिवारों की मदद करे। मुफ्त अच्छी शिक्षा स्वस्थ्य आदि उपलब्ध करवाए, इससे पहले की धंधे वाले इनको अपने कब्जे में कर ले, सेवा वालो को इनकी मदद करनी चाहिए।

सरकार अधिक से अधिक 'धर्मातरण विरोधी' कानून ले आएगी, तब भी धर्मातरण का काम छुप छुप कर होगा, वह नाम हिन्दू ही रखेगे परन्तु काम अरब वेस्ट के करेगे, एक दिन जब संख्या बल उनके पास होगा, तब सरकार बदल कर कानून को भी बदल देंगे।

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