Thursday, 21 December 2017

सनातन धर्म की जय 

मैं अंग्रेज नहीं हूं, कृपया मुझे कोई भी अंग्रेजी नववर्ष की बधाई न दें!
मैं ऋषियों की संतान हूं व उनके द्वारा बताया गया नववर्ष ही मनाता हूं. हमारा नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को आता है, मुझे उसी दिन नववर्ष की शुभकामनाऐं दीजियेगा! कृपया कोई भी जो अपने आप को ऋषियों की संतान मानता हो,आपस में या किसी ओर को भी बधाई न दें अंग्रेजी नववर्ष की!
सोचो क्या किसी क्रिश्चन ने कभी आपको आपके नववर्ष की बधाई दी है? यदि नही तो फिर पागल क्यों बनते हो?
ये भी ध्यान रखना कि ये वे ही अंग्रेज है जिन्होनें 200 वर्षों तक हमारे सोने चांदी के खजानों को लूटा,माँ बहन बेटियों का अपमान किया,एक से एक बहादुर नौजवानों को फांसी पर चढा दिया.

इसीलिए ना मैं किसी को इन राक्षसों के नववर्ष की बधाई दूंगा और न ही कोई मुझे देने का कुप्रयास करें क्योकि मैं स्वतंत्रता के लिए बलिदान हुए उन वीरों का ऋण अपने उपर मानता हूं.आप मानते हैं या नही ये आप पर निर्भर करता हैं.


अगर आप भी मानते है तो अधिक शेयर कीजिये सनातनी संस्कृति को बचाना है।

एक आदमी का गुजरात में विकास...विकास करते-करते गला बैठ गया और वो 16 सीटो का नुकसान लेके आया....!!
दुसरा खाली हाथ होते हुऐ भी आरक्षण और कर्ज माफी के सपने दिखा कर 20 सीटो का फायदा कर आया..
अब मोदी जी को कौन समझाऐ की भारत में अच्छी और तेज गती से बनने वाली सड़के विकास नही होता है..
अंधेरे में डुबे हजारो गांव मे आजादी के सत्तर साल बाद बिजली पहुंचाना भारत में विकास नही माना जाता है..
भारत में LPG की काला बाजारी को रोक कर गरीब के घर में गैस का चुल्हा पहुंचाना विकास नही माना जाता है.....!!
हमारे भारत में आज देश की सीमाओ को सुरक्षित करने को विकास नही माना जाता है....!!
हमारे देश में लाखो करोड़ो के घोटालो के बिना सरकार चलाना विकास नही माना जाता है....!!
टेक्स व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त करके भ्रष्टाचार पर रोक लगा कर सरकारी रेवेन्यु बढ़ाना विकास नही माना जाता है....!!
हमारे यहॉ पर आदमी के खाते में बिना मेहनत के पंद्रह लाख आने को विकास माना जाता है..मतलब अगर खाते में पंद्रह लाख आ जाऐ तो आदमी छत पर चढ़ कर सुबह शाम.. विकास हो गया.. विकास हो गया का कीर्तन करने लगता......!!
हमारे यहॉ विकास उसको कहते है जहॉ आरक्षण की वजह से एक पिता अपने सेकंड डिवीजन पास बेटे के लिये भी कह सके की...हमार मुन्ना भी डॉक्टर बन कर ओपन हार्ट सर्जरी करेगा..हमार मुन्ना भी इसरो का रॉकेट उड़ाऐगा..हमार मुन्ना कलक्टर बनेगा..साईनटीस्ट बन कर खोज करेगा...हमारे यहॉ ये विकास है.....!!
नेता के बेटे-बेटी भाई-भतीजे तक मंत्री संत्री बनने को विकास कहा जाता है.....!!
अब देखो आदमी रोज साबरमती के किनारे रोज हग कर साबरमती में धो रहा था कहॉ जरुरत थी रिवर फ्रंट बनाने की.....!!
आराम से हार्दिक, जिग्नेश, अल्पेश को हवेली पर बुलाते और मामला सेट करते.....!!
सभी को आरक्षण की लॉलीपॉप चुसाते.....!!
हजार दो हजार किसानो का कर्ज माफ कर देते.....!!
दो चार मिडीयॉ की दुकानो को किराये पर प्रचार का ठेका देते.....!!
और 150 सीटो का आनंद प्राप्त करते.....!!
क्या जरुरत थी घर-घर में टॉईलेट बनवाने की और सी-प्लेन में उड़ने की..और बुलेट ट्रेन लाने की....!!
क्या जरुरत थी नोटबंदी करने की..GST लाने की..क्या जरुरत थी ये कहने की..की.."ना खाऊंगा ना खाने दुंगा"
मोदी जी भारत पर राज करना है तो नेता बनो..महापुरुष हमारे यहॉ पर जल्दी ही निपटा दिये जाते है.....!!



Wednesday, 20 December 2017

"मोदी जैसे बोरिंग बुड्ढे को राजनीति छोड़कर हिमालय में हड्डियाँ गलानी चाहिये" ... जिग्नाश मेवानी
भई ग़लत ही क्या कहा? बोरिंग बुड्ढा तो है ही। ज़रा पिग्विजय को देखो, अपने लड़के से पहले अपना फिर से ब्याह रचा लिया, आधी उम्र की महिला के साथ। सबक लेना है तो नारयौन दत्त तिवारी से लो, जो पड़दादा बनने की उम्र में बाप बन गए। अरे अभिसार मनु सिंघवी को ही देख लिया होता। और नेहरू जी तो ख़ैर इन सबके बाप लगते हैं। क्या जलवे हैं इन रंगीले बुड्ढों के। और एक हैं मोदी जी। सारी उम्र निकाल दी, ब्याहता बीवी भी लड़कपन में ही त्याग दी, जीवन देश की सेवा में अर्पण कर दिया। कोरे ही घूम रहे हैं।
भगनाश उह जिग्नाश भाई, जिस उम्र में आप और आपके दायें तरफ़ लटके हार्पिक पे तेल, पचासियों वेश्याओं के साथ सीडी बना रहे हैं, वे तो उस उम्र में घरबार छोड़कर हिमालय में हड्डियां गला रहे थे। जिस उम्र में आपके ऊपर लटके हुए पप्पू जी बैंकाक जाकर दो दो महीने अज्ञातवास में गुलबदनों के साथ गुलछर्रे उड़ाते हैं, उस उम्र में वे संघ के प्रचारक बन कर दो जोड़ी कपड़ों और एक झोले के साथ देशाटन कर रहे थे। अब इसे बोरिंग न कहा जाय तो और क्या?

मगर असल में वामपंथी इतिहास पढ़ पढ़कर आपको अपनी मूल संस्कृति का कुछ भी ज्ञान बाक़ी नहीं। एक ऋषि हुए हैं दधीचि, जिनकी हड्डियों से वह अस्त्र बना जिससे वृतासुर नामक दैत्य का वध हुआ था। आज ढोंग्रेस व उसके अन्य घटक वह दैत्यदल है जो देश को निगल रहा है। इसी दैत्य के अंत के लिए ये हिमालय में गली हुई हड्डियां काम आ रही हैं। तुम और तुम जैसे सब राक्षसों का अंत इसी अस्त्र से होगा।
Twitter Handel - @nitinmudgal_


स्तिथियाँ तब भी खराब थी और अब भी....

नमस्ते जी सभी को.....

          तब भी हिन्दू एक नही थे आज भी हिन्दू एक नही है...सोचने की बात है हम पद्मावती के जौहर के लिए लड़ रहे हैं....हम सब जौहर को हिन्दुओ की महानता से ,बलिदान से जोड़ते हैं,यह होना भी चाहिए...क्योंकि हमारे पूर्वजों ने कभी अधर्मियों से हार नही मानी, सामने हार निश्चित हो तब भी लड़ते हुए मरे(कुछ गद्दार हर जगह होते हैं,उनका हम विरोध करते हैं)....राजा रत्न सिंह ने भी यही किया...सामने इतनी बड़ी सेना थी फिर भी लड़ते हुए मरना अच्छा समझा...रानी पद्मावती ने परिस्थितयों के अनुसार जौहर करना उचित समझा....उन्होंने किया...

          पर सोचने वाली बात यह है कि उनकी जौहर करने की परिस्तिथियाँ बनी क्यों...?हमारी माताओं को जौहर जैसा बलिदान करना पड़ा उसका कारण क्या था...?पहले तो यदि आप जौहर शब्द को छोटी मोटी चीज लगा रहे हो तो इस शब्द के महत्व को समझने के लिए अपनी ऊँगली किसी जलते हुए दीपक के ऊपर करो ,फिर आप इस पोस्ट को सही से समझ पाएंगे....एक नारी जौहर ख़ुशी से नही करती,जलने के बारे में सिर्फ सोचना ही रोंगटे खड़े कर देता है....आप क्या सोचते हैं एक नारी जलने का फैसला ऐसे ही ले लेती है...जलने से पहले उन 16000 माताओं ने क्या इधर उधर नजर दौड़ाकर अपने पुत्रों,भाइयों को अपनी रक्षा के लिए नही खोजा होगा...क्या उन्होंने नही खोजा होगा अपने रक्षको को अपनी रक्षा के लिए...हमारी संस्कृति में प्रत्येक नारी को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है...स्त्री की इज्जत मर्द की जान से ज्यादा महत्व रखती है,यह बताया जाता है...औरतों को ऐसा जताया जाता है कि आप की रक्षा हम मर्दों की जिम्मेदारी है,तो क्या उन माताओं ने नही ढूंढा होगा उन जिम्मेदार लोगों को अपनी जिम्मेवारी निभाने के लिए...पर जब उन्हें कोई चारा नही दिखा होगा अपनी रक्षा का ,तब उन्होंने जौहर किया था....

         क्या उस समय भारत में और क्षत्रिय नही थे जो उन माताओ की रक्षा कर सकें...?राजा रत्न सिंह और उनकी सेना युद्ध में मारी गई,पर क्या इस देश में एक रत्न सिंह ही राजा थे,और कोई राजा नही था क्या...?क्या पद्मिनी उन राजाओं की कुछ नही लगती थी क्या....?लगती थी.. पर जो भी कारण रहे हो उस समय किसी और राजा ने पद्मिनी की रक्षा नही की....और नतीजा यह रहा कि उन्हें जौहर करना पड़ा....अब विचारकर बताइये कि जौहर हमारे स्वाभिमान का प्रतीक ज्यादा है या हमारी आपसी फुट का...?बल्कि कठोर शब्दों में अगर यह बात कहनी हो तो मैं कहूंगा कि जौहर हमारी नपुंसकता का प्रतीक था ,हम आपस में इतना लड़ते थे कि हम अपनी माताओं ,बहनों की रक्षा तक करने में असमर्थ हो गए थे....

         आज तो ज्यादातर हिन्दू समाज सोशल मीडिया पर सक्रीय है.....एक जगह कोई घटना घटती है तो कुछ ही समय में वो खबर पुरे भारत में पता चल जाती है,पर आज भी हम एक नही हो पा रहे...!आज भी फेसबुक पर बहुत से लोगों को देखता हूँ जो अपनी अपनी जातियों का झंडा उठाये रहते हैं...स्वयं को बहुत बड़ा राष्ट्रभक्त कहते हैं पर पद्मावती विषय पर इक्कट्ठी हो रही हिन्दू कौम पर तंज कसने से पीछे नही हटते....हे पढ़े लिखे आधुनिक देशभक्तो इतिहास सीख लेने के लिए होता है,इतिहास से सबक लो,और इक्कट्ठा हो जाने दो इस सोई हुई कौम को...कहीं यह न हो कि हम फिर से इतना बंट जाएँ कि कल फिर उसी कौम के दुष्ट लोगों के कारण हमारी माताओं ,बहनों को जौहर व्रत लेना पड़े और हम इन तथाकथित जातियों में बंटे हुए दूर खड़े देखते रहें...और सच मानिये जिस दिन वह कौम एक तय प्रतिशत से ज्यादा यहाँ हो गई उस दिन कोई संविधान,कोई कानून आपकी व आपकी नारियों की रक्षा नही करेगा और उन अभागी माताओं ,बहनों के सामने जौहर या आत्मसमर्पण के अलावा और कोई विकल्प नही होगा.....समय है ,संभल जाओ...
         और हाँ ,मैं जौहर को अपना सम्मान नही मानता अपितु उसे अपनी छाती में गड़ा हुआ अपमान का शूल मानता हूँ....और इसीलिए चाहता हूँ कि यह जाति पाति का बंधन टूटे और हम एक होकर धर्म की रक्षा के लिए लड़ें ताकि कल किसी माँ बहन को हमारी कमजोरी के कारण जौहर न करना पड़े....
क्या कारण रहा कि हम खण्ड खण्ड में बंटे पड़े हैं ? क्यों  हमारे हाथ अपनों की रक्षार्थ नहीं उठ पाते ? क्यों अपनों के ही विनाश में हम प्रसन्न होते हैं ? क्या  कारण है इन सब विघटनकारी तत्त्वों का ?
        धन्यवाद...!

@nitinmudgal_ Twitter Handel