Sunday, 4 March 2018

नवर्ष की शुभकामनाएं सभी सनातन धर्मियो को आइये इस लेख के माध्यम से कुछ जानते है कि हम गुड़ीपड़वा पर नया वर्ष क्यो मनाते है।

१८ मार्च २०१८ को नववर्ष मनाये जाने के तर्कसंगत विषय को जन - जन तक पहुचाने में सहायक बने
नव संवत्सर २०७५ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा , १८ मार्च २०१८ से प्रारंभ हो रहा है* यही हमारा नया वर्ष है, इसे धूमधाम से मनाए -
         हम बताते है *भारतीय नववर्ष* की विशेषता   - 
 ग्रंथो में लिखा है कि जिस दिन सृष्टि का चक्र प्रथम बार विधाता ने प्रवर्तित किया, उस दिन चैत्र शुदी १ रविवार था। हमारे लिए आने वाला *संवत्सर २०७५* बहुत ही भाग्यशाली होगा , क़्योंकि इस वर्ष भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को रविवार है,   शुदी एवम  ‘शुक्ल पक्ष एक ही  है। 

चैत्र के महीने के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि (प्रतिपद या प्रतिपदा) को सृष्टि का आरंभ हुआ था।हमारा नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को शरू होता है| इस दिन ग्रह और नक्षत्र मे परिवर्तन होता है | हिन्दी महीने की शुरूआत इसी दिन से होती है |

पेड़-पोधों मे फूल ,मंजर ,कली इसी समय आना शुरू होते है ,  वातावरण मे एक नया उल्लास होता है जो मन को आह्लादित कर देता है | जीवो में धर्म के प्रति आस्था बढ़ जाती है | इसी दिन ब्रह्मा जी  ने सृष्टि का निर्माण किया था | भगवान विष्णु जी का प्रथम अवतार भी इसी दिन हुआ था | नवरात्र की शुरुअात इसी दिन से होती है | जिसमे हमलोग उपवास एवं पवित्र रह कर नव वर्ष की शुरूआत करते है |

परम पुरूष अपनी प्रकृति से मिलने जब आता है तो सदा चैत्र में ही आता है। इसीलिए सारी सृष्टि सबसे ज्यादा चैत्र में ही महक रही होती है। वैष्णव दर्शन में चैत्र मास भगवान नारायण का ही रूप है। चैत्र का आध्यात्मिक स्वरूप इतना उन्नत है कि इसने वैकुंठ में बसने वाले ईश्वर को भी धरती पर उतार दिया।

न शीत न ग्रीष्म। पूरा पावन काल। ऎसे समय में सूर्य की चमकती किरणों की साक्षी में चरित्र और धर्म धरती पर स्वयं श्रीराम रूप धारण कर उतर आए, श्रीराम का अवतार चैत्र शुक्ल नवमी को होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि  के ठीक नवे दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था | आर्यसमाज की स्थापना इसी दिन हुई थी | यह दिन कल्प, सृष्टि, युगादि का प्रारंभिक दिन है | *संसारव्यापी निर्मलता और कोमलता के बीच प्रकट होता है हमारा अपना नया साल *  *विक्रम संवत्सर* विक्रम संवत का संबंध हमारे कालचक्र से ही नहीं, बल्कि हमारे सुदीर्घ साहित्य और जीवन जीने की विविधता से भी है।

कहीं धूल-धक्कड़ नहीं, कुत्सित कीच नहीं, बाहर-भीतर जमीन-आसमान सर्वत्र स्नानोपरांत मन जैसी शुद्धता। पता नहीं किस महामना ऋषि ने चैत्र के इस दिव्य भाव को समझा होगा और किसान को सबसे ज्यादा सुहाती इस चैत मेे ही काल गणना की शुरूआत मानी होगी।

चैत्र मास का वैदिक नाम है-मधु मास। मधु मास अर्थात आनंद बांटती वसंत का मास। यह वसंत आ तो जाता है फाल्गुन में ही, पर पूरी तरह से व्यक्त होता है चैत्र में। सारी वनस्पति और सृष्टि प्रस्फुटित होती है ,  पके मीठे अन्न के दानों में, आम की मन को लुभाती खुशबू में, गणगौर पूजती कन्याओं और सुहागिन नारियों के हाथ की हरी-हरी दूब में तथा वसंतदूत कोयल की गूंजती स्वर लहरी में।

चारों ओर पकी फसल का दर्शन ,  आत्मबल और उत्साह को जन्म देता है। खेतों में हलचल, फसलों की कटाई , हंसिए का मंगलमय खर-खर करता स्वर और खेतों में डांट-डपट-मजाक करती आवाजें। जरा दृष्टि फैलाइए, भारत के आभा मंडल के चारों ओर। चैत्र क्या आया मानो खेतों में हंसी-खुशी की रौनक छा गई।

नई फसल घर मे आने का समय भी यही है | इस समय प्रकृति मे उष्णता बढ्ने लगती है , जिससे पेड़ -पौधे , जीव-जन्तु मे नव जीवन आ जाता है | लोग इतने मदमस्त हो जाते है कि आनंद में मंगलमय  गीत गुनगुनाने लगते है | गौर और गणेश कि पूजा भी इसी दिन से तीन दिन तक राजस्थान मे कि जाती है | चैत शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के समय जो वार होता है वह ही वर्ष में संवत्सर का राजा कहा जाता है ,  मेषार्क प्रवेश के दिन जो वार होता है वही संवत्सर का मंत्री होता है इस दिन सूर्य मेष राशि मे होता है |

जो भी व्यक्ति इस लेख से संतुष्ट है ,  इसे अधिक से अधिक लोगो के बीच शेयर करे और देश को बचाए | चैत शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष मनाने का संकल्प ले | इस वर्ष १८ मार्च २०१८ रविवार  को हिन्दू नववर्ष आ रहा है। सभी तैयारी प्रारम्भ कर देवे ।
           
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🚩 कान्वेंट स्कूल का सच जानकर आप भी चौंक जायेंगे
रत में आजकल बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाने का प्रचलन बहुत चल रहा है सभी का कहना है कि बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में भेजों, लेकिन वास्तव में उनके माता-पिता कॉन्वेंट स्कूल का सच नही जानते है इसलिए अपने बच्चों को भेजते हैं, आइये आज आपको कॉन्वेंट स्कूलों से अवगत कराते हैं ।

🚩क्या आप भी अपने बच्चों को गटर (convent) में भेजते हैं ?

🚩करीब 2500 साल पहले यूरोप में बच्चे पालने की परंपरा नहीं थी। बच्चा पैदा होते ही उसे टोकरी में रखकर लावारिस छोड़ दिया जाता था। अगर किसी चर्च के व्यक्ति की नजर पड़े तो वो बच जाता था नहीं तो उसे जानवर खा जाते थे।

🚩 *कान्वेंट का सच...*

🚩जिस यूरोप को हम आधुनिक व खुले विचारों वाला मानते हैं, आज से 500 वर्ष पहले वहाँ सामान्य व्यक्ति मैरेज (शादी) भी नहीं कर सकता था क्योंकि उनके बहुत बड़े (दार्शनिक) अरस्तू का मानना था कि आम जनता मैरेज करेगी तो उनका परिवार होगा, समाज होगा तो समाज शक्तिशाली बनेगा, शक्तिशाली हो गया तो राजपरिवार के लिए खतरा बन जाएगा।  इसलिए आम जनता को मैरेज न करने दिया जाए। बिना मैरेज के जो बच्चे पैदा होते थे, उन्हें पता न चले कि कौन उनके माँ-बाप हैं, इसलिए उन्हें एक साम्प्रदायिक संस्था में रखा जाता था, जिसे वे कान्वेंट कहते थे। उस सहजता के प्रमुख को ही माँ- बाप समझे इसलिए उन्हें फादर, मदर, सिस्टर कहा जाने लगा।

🚩यूरोप के दार्शनिक रूसो के अनुसार बच्चे पति पत्नी के शारीरिक आनंद में बाधक हैं इसलिए इनको रखना अच्छा नहीं है क्योंकि शारीरिक आनंद ही सब कुछ होता है और एक दार्शनिक प्लेटो के अनुसार हर मनुष्य के जीवन का आखिरी उद्देश्य हैं शारीरिक आनंद  की प्राप्ति और बच्चे अगर उसमें रुकावट है तो उन्हें रखना नहीं छोड़ देना है।

🚩ऐसे ही दूसरे दार्शनिक जैसे दिकारते, लेबेनीतज, अरस्तू सबने अपने बच्चों को लावारिस छोड़ा था।

🚩ऐसे छोड़े हुए बच्चों को रखने के लिए यूरोप के राजाओं ने या सरकारों ने कुछ संस्थाएँ खड़ी की जिनको CONVENT कहा जाता था। CONVENT माने लावारिस बच्चो का स्कूल । CONVENT में पढ़ने वाले बच्चों को माँ बाप का एहसास कराने के लिए यहाँ पर पढ़ाने वाले जो अध्यापक होते है उनको मदर, फादर, ब्रदर, सिस्टर कहते हैं।

🚩आप सोच रहें होंगे उस समय अमेरिका यूरोप की क्या स्थिति थी, तो सामान्य बच्चो के लिए सार्वजनिक विद्यालयों की शुरुआत सबसे पहले इंग्लैंड में सन 1868 में हुई थी, उसके बाद बाकी यूरोप अमेरिका अर्थात जब भारत में प्रत्येक गांव में एक गुरुकुल था,  97% साक्षारता थी तब इंग्लैंड के बच्चों को पढ़ने का अवसर मिला। तो क्या पहले वहाँ विद्यालय नहीं होते थे ? होते थे परंतु महलों के भीतर, वहाँ ऐसी मान्यता थी कि शिक्षा केवल राजकीय व्यक्तियों को ही देनी चाहिए सबको तो सेवा करनी चाहिए ।

🚩अब आप ही तय करें आपको क्या चाहिए कान्वेंट ? या गुरुकुल ? स्त्रोत : संस्कारवान पत्रिका

🚩भारत में कॉन्वेंट स्कूलों में कोई हिन्दू त्यौहार नही मनाने देते हैं और न ही उन दिनों में छुट्टियां दी जाती हैं, तिलक या मेहंदी लगाकर जाये तो भी उनको सजा दी जाती है, मतलब हिन्दू संस्कृति मिटाने का खुला षडयंत्र रचा जा रहा है, कॉन्वेंट स्कूल में बच्चों के यौन शोषण के मामले भी कई सामने आए हैं।

🚩भारत मे कॉन्वेंट स्कूलों की स्थापना...

🚩भारत से लॉर्ड मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी : “ मैंने जो कॉन्वेंट स्कूलों की स्थापना की है, इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में, संस्कृति के बारे में, परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, जब ऐसे बच्चे होंगे भारत में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।”

🚩उसने कहा था कि ‘मैं यहाँ (भारत) की शिक्षा-पद्धति में ऐसे कुछ संस्कार डाल जाता हूँ कि आनेवाले वर्षों में भारतवासी अपनी ही संस्कृति से घृणा करेंगे... मंदिर में जाना पसंद नहीं करेंगे... माता-पिता को प्रणाम करने में तौहीन महसूस करेंगे, साधु-संतों से नफरत करेंगे... वे शरीर से तो भारतीय होंगे लेकिन दिलोदिमाग से हमारे ही गुलाम होंगे..!'

🚩उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ-साफ दिखाई दे रही है, आज कॉन्वेंट स्कूल की शिक्षा पद्धति के कारण JNU जैसी यूनवर्सिटी में छात्र हिन्दू देवी-देवताओं को ही गालियां बोल रहे हैं, दारू पी रहे हैं, मांस खा रहे हैं, दुष्कर्म कर रहे हैं, बॉलीवुड, मीडिया ,टीवी सीरियलों में लोग हिन्दू तो दिखते हैं लेकिन दिलोदिमाग से अंग्रेज होते जा रहे हैं । इसलिए हिन्दू देवी-देवताओं, साधु-संतों, हिन्दू त्यौहारों के खिलाफ हो गए हैं।

🚩भारत ने वेद-पुराण, उपनिषदों से पूरे विश्व को सही जीवन जीने की ढंग सिखाया है । इससे भारतीय बच्चे ही क्यों वंचित रहे ?

🚩जब मदरसों में कुरान पढ़ाई जाती है, मिशनरी के स्कूलों में बाइबल तो हमारे स्कूल-कॉलेजों में रामायण, महाभारत व गीता क्यों नहीं पढ़ाई जाएँ ?

🚩जबकि मदरसों व मिशनरियों में शिक्षा के माध्यम से धार्मिक उन्माद बढ़ाया जाता है और हिन्दू धर्म की शिक्षा देश, दुनिया के हित में है ।

🚩सभी हिन्दू अभिभावकों को भी #कॉन्वेंट #स्कूल में हिन्दू छात्रों पर पड़ने वाले #गलत #संस्कारों तथा उनके साथ हो रही प्रताड़ना को देखते हुए अपने बच्चों को वहां नहीं भेजना चाहिए । #कॉन्वेंट #स्कूल का संपूर्ण #बहिष्कार #करना #चाहिए ।

🚩कई घटना में छात्रा ने कॉन्वेंट स्कूल प्रशासन के ‘टाॅर्चर’ के कारण आत्महत्या कर ली और एक विद्यार्थी कूद गया । कर्इ घटनाआें में यह सामने आया है कि किसी भी अपयश, ब्लू वेल जैसे गेम्स या किसी प्रकार की ‘टॉर्चर’ की कारण बच्चे आत्महत्या कर लेते हैं ।

🚩इसका मूल कारण है उनमें सुसंस्कारों का अभाव । यदि आप अपने बच्चों को अच्छे संस्कारी बनाना चाहते हैं तो कॉन्वेंट स्कूल में बच्चों को पढ़ाना बन्द करें और गुरुकुलों में पढ़ाना शुरू करदें।