Thursday, 22 February 2018

मैं एक सनातनी हूँ, सनातन मेरा धर्म, सनातनी मेरी राष्ट्रीयता। मेरा राष्ट्रीय ध्वज है क्षात्र व ब्रह्म तेज युक्त वह भगवा ध्वज जिसे कभी सम्राट विक्रमादित्य ने हिन्दुकुश से लेकर अरब भूमि पर लहराया था।

मैं न भारतीय हूँ, न आर्यावर्त, न जम्बूद्वीप। मेरी राष्ट्रीयता मेरे धर्म से जुडी है क्योंकि राष्ट्र तो बनते है बिगड़ते है। अखंड होते है, खंडित होते है पर मूल राष्ट्रीयता तो वह संस्कृति है जो इस महान अपराजेय व कालजयी सनातन धर्म से मिली है। 

मेरे आदर्श मेरे नायक तो सनातन धर्म पताका को विश्व में फहराने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम, योगेश्वर श्री कृष्ण, महाऋषि गौतम, चरक, पाणिनि, जैमिनी, कणाद, चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य, आदि गुरु शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट, आचार्य चाणक्य, चंद्रगुप्त मौर्य, पुष्यमित्र शुंग, शिवजी महाराज, महाराणा प्रताप, गुरु गोविन्द सिंह, स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुष व युगपुरोधा है।

इस धर्म के सिद्धांतों आदर्शों ने ही इस मातृभूमि को संस्कृति के सर्वोच्च सिंहासन पर बिठाया था। यदि ये धर्म न हो तो राष्ट्रीयता का कैसा बोध ? धर्म नहीं रहेगा तो मैं भी इस राष्ट्र को मातृभूमि न मान कर साधारण भूमि मानूँगा। अतः मेरे लिए मेरा धर्म सर्वोच्च है।

धर्म रहा तो इस पृथ्वी पर कही न कही राष्ट्र बन जाएगा। नाम भी भारत वर्ष या आर्यावर्त रख लेंगे। पर धर्म न बचा तो राष्ट्र का अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा। इसलिए हमारे पूर्वजों ने धर्म को आधार बना कर इस राष्ट्र का निर्माण किया। जो कभी जम्बूद्वीप एशिया में फैला था। धर्म की सीमाएं सिमटी तो राष्ट्र भी आर्यावर्त (ईरान से इंडोनेशिया व मॉरीशस से मास्को) तक सिमट गया। धर्म और संकुचित हुआ तो आज का भारत रह गया। सनातन धर्म सिमटता गया और राष्ट्र भी खंड खंड में खण्डित होता गया। जो पाकिस्तान व बंगलादेश कभी हमारा भाग था वह आज खंडित हो गया क्योंकि वहाँ से धर्म लुप्त हुआ और राष्ट्रीयता का बोध समाप्त हो गया।

वर्तमान के राजनेताओं ने धर्म के स्थान पर राष्ट्र को प्रमुखता दी। धर्मविहीन राष्ट्र कैसा होता है ? ये आज के राष्ट्र को देखकर जान सकते हैं। पहले न कोई निर्धन था यदि था तो मन में संतोष था। धनी व्यक्ति दयालू तथा दानी प्रवृत्ति के थे। मन में न लोभ मोह था न ईर्ष्या एवं धर्म के प्रसार के कारण राष्ट्रीयता का भी बोध था। इतनी निष्ठा उस समय चोरों में भी होती थी। आज वह निष्ठा समाज के रक्षकों से भी लुप्त हो गई क्योंकि धर्म नहीं रहा।

आज अधर्म फैला हुआ है इसलिए समाज में भी असंतोष भय निराशा का बोध है। राष्ट्रीयता लुप्त है या किसी विशेष अवसर पर ही राष्ट्रभक्ति का बोध होता है।

ऐसे में यदि खंड खंड हो चुके राष्ट्र को बचाना है तो माध्यम धर्म को बनाना होगा। जब धर्म व संस्कृति बचेगी तो ही ये राष्ट्र भी बचेगा।

अतः धर्म सर्वोपरि है, सनातन संस्कृति ही राष्ट्र का उद्धार करने की क्षमता रखती है।

धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो, गौ माता की रक्षा हो,भारत माता की जय वंदे मातरम् हर हर महादेव🚩🕉🚩🕉🚩🚩🚩

Monday, 19 February 2018

सनातन धर्म की परिभाषा
सनातन ही सत्य है सनातन ही सास्वत है सनातन ही सद्मार्ग है सनातन ही मोक्ष है सनातन ही आदि है और सनातन ही अंत भी है मित्रों जो इंसान अपने धर्म को छोड़ता है धर्म उसे छोड़ देता है भगवान् कृष्ण ने गीता में कहा भी है अपने धर्म की मृत्यु से दूसरे धर्म का जीवन भी भयावह होता है ईश्वर हमारे पिता हैं तो शास्त्र हमारी माता है हम आकाश के तारों को देख कर आकर्षित तो होते हैं लेकिन अपने कदमो में पड़े हुए फूलों की तरफ हमारी नजर भी नहीं जाती जबकि ये फूल सहज प्राप्य हैं क्या नहीं है हिन्दू सनातन धर्म में शास्त्र संहिताएं स्मृतियां उपनिसद वेद ग्रन्थ महाकाव्य पुराण अगर कोई एक को भी पढ़ ले उसका जीवन कृतार्थ हो जाय आज हम उत्सव नहीं मनाते हैं भाइयों आज उत्सव के नाम पर आडंबर करते हैं उत्सव तो वो होता है क्या निर्धन और क्या धनिक जो समान रूप से इस पर्व में शामिल हो जो घोर से घोर वेदना का क्षय करके मानव के शरीर को ही नहीं आत्मा को भी तरंगित और आनंदित कर दे वो होता है उत्सव और ये हिन्दू सनातन धर्म में सहज प्राप्त है हिन्दू सनातन धर्म एक धर्म नहीं ईश्वर द्वारा रचित एक सभ्यता एक समुद्र है जैसे सारी नदियों का जल आकर समुद्र में विलीन हो जाता है ऐसा ही है हिन्दू सनातन धर्म यही जीवन का उद्गम भी है यही जीवन का अंत भी इसलिए मित्रों ये उस वृक्ष के मूल के समान है जो दिखाई तो नहीं देती लेकिन अस्तित्व का आधार है बस इतना जान लीजिए मूल खतम तो अस्तित्व भी ख़त्म मूल ही हमारी पहचान है इसे मत छोड़िये भगवान् कृष्ण ने भगवत गीता में प्रतिज्ञा ली है तू मेरा नाम लेकर प्रारम्भ तो कर परिणाम तक तो मैं वासुदेव कृष्ण पहुंचा दूंगा तुझे अब क्या लोगे साक्षात ब्रम्ह ने अस्वासन दे रखा है मृगतृष्णा में नहीं यतार्थ में जियें हिन्दू सनातन धर्म ही यतार्थ है।  ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

Wednesday, 14 February 2018

वैलेंटाइन डे

सभी अवश्य पढ़ें। प्रेम क्या है प्रेम ? जो आज कल के बच्चे कर रहे है उसे कहेंगे क्या प्रेम? ये लोग प्रेम को भी कपड़ो की तरह बदलते रहते है, आज ये है कल वो है परसो कोई और है। नही इसे तो प्रेम नही कह सकते। इसे वासना,शारीरिक आकर्षण तो कह सकते है पर प्रेम नही कह सकते है, क्योकि प्रेम का सम्बन्ध शरीर से न हो कर ह्रदय से होता है।वास्तव में प्रेम के प्रतीक भी लोगो को गलत बताये गए है, युवाओ को बताया जाता है ताजमहल प्रेम की निशानी है, बिल्कुल झूठ। मुमताज न तो शाहजंहा की पहली पत्नी थी और न ही आखरी, इसके अतिरिक्त उसके हरम में हजारों महिलाये थी वो जब चाहता किसी के साथ सम्बन्ध बनाता तो इसमे प्रेम कहा हुआ ये तो वासना है। प्रेम था तो मर्यादा परुषोतम श्री राम और माता सीता के बीच मे, जहाँ मेरे आदर्श श्री राम ने अपनी पत्नी की रक्षा के लिए समुंदर पर पूल बना दिया और असुरों का उनके कुल सहित नाश कर दिया, और एक विशेष बात श्री राम जी 14 वर्ष तक वनों में रहे पर उन्होंने कभी सीता जी के साथ शारीरिक  सम्बन्ध नही बनाये, यदि श्री राम जी चाहते तो उनका दूसरा विवाह भी हो जाता पर नही उन्हें सीता जी से प्रेम था इसलिए वन के लोगो को एकत्रित कर युद्ध करने चल दिये, पर आज कल मैने क्या देखा कि लड़के के सामने ही उसकी प्रेमिका को दूसरे लोग छेड़ देते है और वो लड़का चुप चाप सुनता रहता है यदि उनमे सच मे प्रेम होता तो वो चुप चाप नही सुनेगा। या एक दूसरे पर कोई कष्ट आता है तो साथ छोड़ देते है एक दूसरे के लिए त्याग करना तो बहुत दूर की बात है आज कल के तथाकथित प्रेमी बच्चो के लिये। प्रेम में स्वयं की बजाए व्यक्ति अपने साथी के हित को प्राथमिकता देते है पर आज कल तो स्वार्थ,सेक्स,पैसो का खेल है सब। पश्चमी संस्कृति तो आपको वासना सीखा सकती है, पर सच्चा प्रेम आपको वैदिकधर्म को मानने वाले लोग ही दे सकते है, जहाँ वे अपने प्राणों की भी प्रवाह नही करते अपने साथी के लिए। भोगवाद को छोड़ो, ह्रदय से नाता जोड़ो, किसी को धोखा मत दो, यही आर्य संस्कृति है।