Saturday, 7 November 2020

धर्म हित

चलो मान लिया मैं  नफरत फैलाता हूं तो आप किस भाईचारे के भ्रम में जी रहे हैं?
     मैं विदेशी मज़हब और देश-धर्म-समाज के दुश्मनों से न केवल नफरत करता हूं बल्कि बिना किसी आर्थिक लाभ के नफरत फैलाता भी हूं और मरते दम तक फैलाता रहूंगा क्योंकि यही मेरी मातृभूमि, धर्म, समाज के प्रति मेरी प्रतिबद्धता का आईना है।
     अगर यह कानून विरुद्ध है तो देश-धर्म-समाज के लिये इस लचर कानून को तोड़ना मेरे लिये वैसा ही है जैसा की क्रांतिकारियों के लिये अंग्रेजी कानून तोड़ना था।
     अगर आपको लगता है कि मेरी यह नफरत देश के विकास में बाधा है तो आप स्वयं विचार कीजिये कि आप किन दुश्मनों के बीच फंसते जा रहे हैं और उनके साथ भाईचारे से देश को भविष्य में इस्लामिक बनाने से कहीं बेहतर है आज की आपकी नफरत!
     उस विदेशी अरबी मज़हब के प्रति मेरी नफरत है जिसका ध्येय वाक्य है 'दारुल इस्लाम' क्योंकि हमारा ध्येय वाक्य है 'सर्वधर्म सम्भाव' और इन दोनों विचारधाराओं का मेल असंभव है।
     मैं किसी ऐसे विदेशी मज़हब का यहां स्वागत कैसे कर सकता हूं जो मेरे धर्म का उनके यहां स्वागत नहीं करता और जिसका यहां आगमन प्रेम के संदेश से नहीं बल्कि तलवार के संदेश से हुआ हो! (712 ई. मोहम्मद बिन कासिम)
     जो क़ुरआन गैर-मज़हबियों को बुरा बल्कि वाजेबुल कत्ल तक कहती हो, मैं उस क़ुरआन को मानने वाले मज़हबियों को अच्छा कैसे कहूं?
     हां मैं नफरत करता हूं उन मुसलमानों से जो हिंदुस्तान के कन्वर्टेड हिंदुओं को 'अल-हिंद-मस्कीन' कहकर जलील करते हैं यानि मेरी नफरत रैबीज़ और उस रैबीज़ग्रस्थ भेड़िये से है जिसने मेरे डॉगी को काटा पर मेरी नफरत मेरे डॉगी से नहीं है।
     जब हम अंग्रेजों के शासन को उखाड़ फैंकने की क्षमता सिद्ध कर चुके हैं तो हम 'गजवा-ए-हिंद' को भी उखाड़ फेंकने की क्षमता रखते हैं यानि अगर इस्लाम गजवा-ए-हिंद तक भी पहुंच गया तो भी इस सनातन भूमि पर उसका अंत निश्चित है।
     जो देश आज अखंड नहीं और अलग हो चुके खंडों में हिंदू सुरक्षित नहीं तो अब कैसा और किससे भाईचारा?
     जो आपकी लड़की ले तो सकता है पर दे नहीं सकता उससे कैसा भाईचारा?
     जो आपको अपने मज़हब में शामिल करने के लिए हर प्रपंच कर सकता है पर उसका मज़हब छोड़ने वाले का कत्ल करने के लिये उसे ढूंढता है उससे कैसा भाईचारा?
     जो आपके हिंदू बहुल इलाके में आराम से रह सकता है पर उसके बहुल यानि कश्मीर घाटी में आपको नहीं रहने दे सकता उससे कैसा भाईचारा?
     जो आपके मंदिर, गुरुद्वारे के प्रांगण में नमाज पढ़ सकता है पर उसकी मस्जिद में आपको भजन-कीर्तन की अनुमती नहीं दे सकता उससे कैसा भाईचारा?
     जो आपके शासन में हज़ के लिये सब्सिडी लेता रहा पर उसके शासन में आपसे जजिया कर लेता रहा उससे कैसा भाईचारा?
     जो दिन में 5 बार आप ही पर अजाब डालने की अल्लाह से दुआ करता हो उससे कैसा भाईचारा?
     जो सनातनियों की इस भूमि पर शरिया लॉ, गजवा-ए-हिंद, निजाम-ए-मुस्तफा और दारुल इस्लाम की बात करता हो उससे कैसा भाईचारा?
     जिनका एक भी आदर्श यहां की सभ्यता-संस्कृति का कायल नहीं हो उनसे कैसा भाईचारा?
     जो आपके बहुसंख्यक होने पर आपको भाई कहते हों पर उनके बहुसंख्यक होने पर आपको काफिर कहते हों उनसे कैसा भाईचारा?
     जिनका आज तक का एक-एक वोट देश नहीं कौम की खातिर गया हो उनसे कैसा भाईचारा?😡😡
     भाईचारे से हुए हर नुकसान की भरपाई अब केवल नफरत की शुरुआत से ही संभव है,🙏🙏🚩🚩

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