Saturday, 27 December 2025

डिजिटल शोर से आध्यात्मिक शांति तक: एक व्यक्तिगत बदलाव।

 ​माँ नर्मदा का आँचल: जहाँ शोर थमता है और सुकून शुरू होता है

​आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सब कुछ पा लेना चाहते हैं—सफलता, पैसा, सुख-सुविधाएं। लेकिन इस दौड़ में हम अक्सर एक चीज़ पीछे छोड़ देते हैं: स्वयं को। कंक्रीट के जंगलों और डिजिटल स्क्रीन के बीच हमारी आत्मा कहीं न कहीं थक गई है।

​क्यों ज़रूरी है यह 'ब्रेक'?

​मेरा व्यक्तिगत अनुभव: जब शोर शांत हुआ...

​"सच कहूँ तो, कुछ समय पहले तक मैं भी उसी अंतहीन दौड़ का हिस्सा था, जहाँ सुबह की शुरुआत 📱 Smartphone से और रात की थकान सोशल मीडिया पर खत्म होती थी। मन में एक अजीब सी बेचैनी थी, जैसे सब कुछ होकर भी कुछ बहुत कीमती छूट रहा हो।

​लेकिन जब पहली बार माँ नर्मदा के तट पर बैठकर उस शीतल जल को छुआ, तो पहली बार महसूस हुआ कि 'शांत होना' किसे कहते हैं। वहाँ न कोई फोन की घंटी थी, न कोई डेडलाइन। था तो बस लहरों का संगीत और दादा गुरु की सौम्य वाणी।

​दादा गुरु ने एक बात कही थी जो मेरे भीतर घर कर गई— 'बाहर की दुनिया को जीतने से पहले, भीतर की दुनिया को जानना जरूरी है।'

​उस दिन मुझे समझ आया कि हम अपनी अगली पीढ़ी को वसीयत में शायद संपत्ति तो दे देंगे, लेकिन क्या हम उन्हें वो 'सुकून' दे पाएंगे? माँ नर्मदा के किनारे बिताया वह समय मेरे लिए सिर्फ एक ब्रेक नहीं था, बल्कि एक 'रीबर्थ' (पुनर्जन्म) जैसा था। अब मेरा यह मिशन है कि जो शांति मैंने महसूस की, उसे आप सब तक और हमारी आने वाली पीढ़ी तक पहुँचा सकूँ।"


​दादा गुरु: आत्म-साक्षात्कार का मार्ग

​माँ नर्मदा का जल जहाँ शरीर और मन को शुद्ध करता है, वहीं दादा गुरु का मार्गदर्शन बुद्धि और आत्मा को दिशा देता है। अक्सर हम 'कौन हैं' से ज्यादा 'क्या हैं' (Doctor, Engineer, Manager) पर ध्यान देते हैं। दादा गुरु के सान्निध्य में हमें यह समझ आता है कि आत्म-बोध ही वह सबसे बड़ी पूँजी है जो हम अपनी अगली पीढ़ी (Next Gen) को दे सकते हैं।


​हमारी विरासत, उनकी भविष्य

​यह मिशन केवल हमारे लिए नहीं है। अगर हम आज प्रकृति की गोद में बैठना नहीं सीखेंगे, तो हमारी आने वाली पीढ़ी कभी यह जान ही नहीं पाएगी कि असली शांति क्या होती है। हमें उन्हें गैजेट्स से हटाकर मिट्टी और संस्कृति की महक से जोड़ना होगा।

​"नर्मदा किनारे की रेत पर बैठकर जब सूर्यास्त देखा, तो समझ आया कि जीवन की सबसे कीमती चीज़ें मुफ्त हैं और वे हमारे भीतर ही छिपी हैं।"

​आइए, इस शोर-शराबे वाली दुनिया से कुछ पल चुराएं। माँ नर्मदा के पावन तट पर दादा गुरु की छाया में खुद को फिर से तलाशें। यह यात्रा सिर्फ मील के पत्थर पार करने की नहीं, बल्कि अपने भीतर की गहराइयों को छूने की है।

​अगर आपको भी लगता है कि अब रुकने और खुद को पहचानने का समय आ गया है, तो इस यात्रा में हमारे साथी बनें।

​ॐ नर्मदा! 🙏✨

Friday, 15 September 2023

Wake Up Call

 मौलवी खुद दस बच्चे पैदा करता है, और सभी मुस्लिमों को यही शिक्षा देता है।


दूसरी तरफ, हिंदू धर्मगुरु, खुद भी ब्रह्मचारी रहता है, और सभी हिंदू पुरुषों को ब्रह्मचारी बनने का संदेश देता है।

कृपा यहीं अटकी हुई है।
हिंदू का सारा जीवन दान दक्षिणा, भंडारा, रक्तदान, पेड़ लगाओ, सभ्य बनो, अनाथालय चलाओ, अस्पताल चलाओ, योग शिविर, ध्यान शिविर, मुफ्त शिविर लगाओ में जाता है।
इसके विपरित, मुस्लिम कभी दान दक्षिणा में विश्वास नहीं करता। वो सिर्फ जकात देता है, जिसका इस्तेमाल इस्लाम को बढ़ाने में होता है। बाकी सभी लोगों से वो पैसा छीनता है।

मुसलमान सारी मुफ्त सुविधाओं का लाभ लेता है, अस्पतालों में भीड़ देखो, बैंकों में योजनाओं का लाभ लेने वालों की भीड़ देखो, तुम्हें सच पता चल जायेगा।

मुसलमान हर पल भारत पर कब्जा करने की तैयारी में लगा हुआ है, और हिंदू दान दक्षिणा से ऊपर ही नही उठ पा रहा है।

जब तक हिंदू की नींद खुलेगी, तब तक मुसलमान भारत पर कब्जा जमा चुके होंगे। फिर ये धर्मगुरु, शिविर चलाने वाले, रक्तदान करने वाले, भंडारा करने वाले, पेड़ लगाने वाले; ये सब बैठ के रोएंगे कि "हमे बचा लो, हमें बचा लो"। पर बचाएगा कौन?
जब तुम्हें युद्ध की तैयारी करनी चाहिए थी, तब तो तुम दान पुण्य में लगे थे। अब रोने से क्या होगा, क्योंकि तुमने सिर्फ धर्म को करने पर ध्यान दिया लेकिन तुमने यह नहीं सोचा कि कोई अधर्म द्वारा तुम्हारे धर्म को मिट्टी में मिला रहा है, क्योंकि तूने सिर्फ अच्छा किया लेकिन तुम्हारे घर में कोई डाका डाल रहा है तुम्हारे देश में कोई डाका डाल रहा है तुमने उसे आंख मूंद लिया रोना तो पड़ेगा ? तुम्हारा सबकुछ मुसलमानों का है। उन्होंने अपना दिमाग सही जगह लगाया। फालतू के चोंचले कभी पाले ही नही।

तुमने कभी युद्ध की तैयारी नही की। ना हथियार खरीदे, ना हथियार बांटे, ना दूसरों को चलाना सिखाया, ना अपने बच्चों को चलाना सिखाया। इसकी कीमत तो तुम्हें चुकानी ही होगी।

इन भंडारों, दान दक्षिणा से आगे निकलो, और युद्ध की तैयारी करो।
भंडारे लगाना ही है, तो हथियारों के लगाओ। बाकी सब बेकार की बातें हैं।
ट्रेनिंग देना ही है तो पुण्य और वृद्ध आश्रम खोलने के बजाय, हथियार कैसे चलाना है, चाकू कैसे चलाना है, तलवार कैसे चलाना है, पेपेर स्प्रे कैसे चलाना है, गुलेल कैसे चलाना है, पत्थर कैसे फेंकना है, बंदूक कैसे चलाना है, पेट्रोल का प्रयोग कैसे करना है। ये सिखाओ...

सामने वाली टीम इसी काम में लगी हुई है। तुम कब शुरू करोगे, ये सोच लो।

इससे पहले कि समय हाथ से निकल जाए, अपनी ऊर्जा सही काम में लगा लो।
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Saturday, 17 June 2023

सामाजिक रितियाँ

 मृत्युभोज पाप है इसलिए बन्द करो, शादी में खर्च करना पाप है इसलिए कोर्ट मैरिज करो। 


लेकिन हनीमून बहुत बड़ा पुण्य है इसको मनाने विदेश जाओ पैसा लुटाओ क्योंकि हनीमून से हजारों गरीबों का पेट भरता है।


मतलब परिवार, रिश्तेदार, गाँव-समाज, पड़ोसी गाँव के परिचित व्यक्ति, पिताजी के हितैषी और व्यवहारियों को एकजुट करना, उनसे मिलना तथा पीढ़ियों से चले आ रहे व्यवहार को अगली पीढ़ी में सुचारू रूप से चलाए रखने के लिए मृत्युभोज या शादी के न्यौते दिए जाते हैं। ताकि हम समझ सकें कि हमारी रिश्तेदारियाँ कँहा कँहा है, हमारे पुरखों के सम्बंध व्यवहार कँहा कँहा और किन किन लोगों से हैं। 


इसलिए मिलने वाले लोग कुछ भेंट लेकर जाते हैं और उस भेंट को एक डायरी में लिखा जाता है ताकि याद रहे कि हमारे परिवार के सम्पर्क कँहा कँहा किन किन लोगों से हैं। 

वैसे तो लोग अपनी निजी जिंदगी में इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें पता ही नहीं होता है कि उनके अपने कौन कौन है। इसलिए ऐसे ही कुछ कार्यक्रम होते हैं जँहा अपनों से भेंट हो पाती है। 


आज इन समाजिक और मानवीय व्यवस्था को तोड़कर मनुष्य को एकांकी बनाने पर जोर दिया जा रहा है। अब 2 बच्चे ही अच्छे के कारण परिवार और रिश्तेदार वैसे भी सीमित हो गए हैं ऐसे में सामाजिक व्यवहार ही एकदूसरे मनुष्य के सहायक हो सकते हैं अगर उनसे भी दूर कर दिया गया तो मुसीबत के समय कौन खड़ा होगा अपनों के साथ?? 


आज हम लोग पार्टी करते हैं तो कुछ अपने दोस्तों को बुलाकर इंजॉय करते हैं क्योंकि अच्छा लगता है। लेकिन ये कभी नहीं सोचते की ये भोज भी एक तरह की पार्टी होते हैं जँहा हमारे रिश्तेदार एकजुट होते हैं और न जाने कितनी पीढ़ियों के व्यवहार और रिश्तेदारियों का नवीकरण होता है। 


आज अगर इसी तरह से एकांकी जीवन पर जोर दिया जाता रहा तो एक दिन ऐसा आएगा जब मानसिक अशांत लोगों की संख्या बहुत अधिक होगी, आत्महत्या के मामले बहुत अधिक होंगे। 


आज की पीढ़ी अपनी मस्ती में इतनी व्यस्त होती है कि उसको कुछ प्रमुख रिश्तेदार को छोड़कर 2-3 पीढ़ियों की रिश्तेदारी तक याद नहीं होती है। साथ ही साथ पिता के कुछ जान-परिचितों को छोड़कर दादा-परदादा के व्यवहारियों तक का पता नहीं होता है। आसपास के 10-15 गाँव में हमारी जाति के तथा हमारे परिचित के कौन कौन व्यक्ति है ये तक पता नहीं होता है। 


लेकिन जब मृत्युभोज होता है तो ऐसे सभी परिचितों को मिलने समझने का मौका मिलता है और पीढ़ियों से चले आ सम्बन्ध अब हमको आगे लेकर चलना है ये सीख मिलती है। 

हमारे यँहा मृत्युभोज में जाने के लिए बड़े-बूढ़े अधिक जोर देते हैं क्योंकि परिचित का व्यक्ति चला गया है अब उसकी अगली पीढ़ी से परिचय बहुत जरूरी है ताकि सम्बन्ध बने रहें ऐसी धारणा है। लोग खाने के भूँखे नहीं होते हैं बल्कि समाजिक भावना का ध्येय होता है वैसे भी नियम होता है कि आयु और पद में छोटे की मृत्यु पर खाना नहीं खाते हैं। 


हमें बचपन से पढ़ाया जाता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है लेकिन समाजिक भावना का जिस प्रकार लोप हो रहा है उस हिसाब से मनुष्य के अस्तित्व पर खतरा बढ़ता जा रहा है। हमारे पूर्वज बहुत बुद्धिमान थे जिन्होंने ऐसी व्यवस्थाएं बनाई थी जिनमें समाजिक भवनायें पोषित होती रहें लेकिन आधुनिकता की इस दौड़ में हम अपने पूर्वजों की दूरदर्शिता को समझे बिना ही मूर्खता की ओर भागे जा रहे हैं। 

 

Monday, 1 May 2023

इंदौर में सीनियर डॉक्टर द्वारा 50 रुपए के शुल्क में इलाज

 इंदौर में 50 रुपए में सीनियर डॉक्टरों से करवाएं इलाज, जांचों का दाम भी बेहद कम, सभी से शेयर करें यह जरूरी जानकारी 👩🏻‍⚕️


इंदौर में श्री गुरुजी सेवा न्यास द्वारा संचालित ‘माधव सृष्टि चमेली देवी अग्रवाल मेडिकल सेंटर’ में बड़े डॉक्टरों द्वारा न्यूनतम शुल्क में इलाज की सुविधा दी जा रही है। जिसमें निम्न सुविधाएं न्यूनतम शुल्क पर उपलब्ध हैं-

ओपीडी :मात्र 50/-

सोनोग्राफी :मात्र 500/-

डायलिसिस : मात्र 400/-

फिजियोथेरेपी : मात्र 100/-

योग क्लास मात्र : 300/- प्रति माह

आंखो की जांच मात्र :100/-

पैथोलॉजी टेस्ट एवं एक्सरे सस्ती दरों पर

दवाइयां 30% से 70% तक सस्ती


कार्डियोलॉजिस्ट

डॉ. भारत रावत : हर मंगलवार, सुबह 10-11

डॉ. उल्लास महाजन : हर सोमवार-मंगलवार, सुबह 11-12


न्यूरोलॉजिस्ट

डॉ. दीपक जैन  : हर शनिवार, दोपहर 3-5


नेफ्रोलॉजिस्ट

डॉ. जय कृपलानी : हर मंगलवार, शनिवार, सुबह 9-10


सर्जन

डॉ. संजय दाते : हर गुरुवार, शाम 4-5


चेस्ट एवं टीबी

डॉ. विजय छजलानी  : हर शुक्रवार, सुबह 10-11

डॉ. इशानी वैद्य : हर मंगलवार, गुरुवार दोपहर 3-5


जनरल फिजिशियन

डॉ. सपना चौधरी : सोमवार-शनिवार, सुबह 10-12

डॉ. कल्याण राठी : सोमवार-शनिवार, शाम 4-6


पेट रोग विशेषज्ञ

डॉ. अमोल पाटिल : हर शनिवार, सुबह 10-12


मधुमेह रोग विशेषज्ञ

डॉ. रीता गुप्ता पाटिल : हर मंगलवार, दोपहर 11-1


शिशु रोग विशेषज्ञ

डॉ. रत्नेश खरे : हर बुधवार, सुबह 10-12

डॉ. पल्लवी कलंत्री : हर सोमवार, गुरुवार, सुबह 10-12

डॉ. सौरभ पिपरसानिया : हर शुक्रवार, सुबह 10-12


दंत रोग विशेषज्ञ

डॉ. सौम्या जैन : हर मंगलवार, शनिवार, सुबह 10-12

डॉ. ईश तारणकर : हर बुधवार, शुक्रवार, दोपहर 3-5

डॉ. विजय मोहन अग्रवाल : सोमवार-शनिवार, दोपहर 12-2


हड्डी रोग विशेषज्ञ

डॉ. अंकुश अग्रवाल : हर मंगलवार, शुक्रवार, सुबह 1.30-3

डॉ. लवेश अग्रवाल : हर गुरुवार 10-12


स्त्री रोग विशेषज्ञ

डॉ. नेहा खटोड़ : हर मंगलवार, शुक्रवार सुबह 10-12

डॉ. चित्रा श्रीवास्तव : हर बुधवार, सुबह 10-12

डॉ. रेखा अग्रवाल : हर गुरुवार, सुबह 10-12


नाक कान गला विशेषज्ञ

डॉ. माधवी पटेल : हर बुधवार, शनिवार, सुबह 10-12

डॉ. राजकुमारी (खत्री) सचदेवा : हर गुरुवार, सुबह 10-12


चर्म रोग विशेषज्ञ

डॉ. बुरहानुद्दीन सैफी : हर मंगलवार, शुक्रवार दोपहर 3-4

डॉ. शीतल सेठी : हर सोमवार, सुबह 10-11


रेडियोलॉजिस्ट (सोनोग्राफी)

डॉ. सचिन गडपाल

सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार

सुबह 9-11


पता :माधव सृष्टि चमेली देवी अग्रवाल मेडिकल सेंटर, वसंत विहार बॉम्बे हॉस्पिटल के पीछे, इंदौर

Saturday, 12 June 2021

 सम्पूर्ण पृथ्वी का जब जल और थल इन दो तत्वों में वर्गीकरण करते हैंतब सात द्वीप एवं सात महासमुद्र माने जाते हैं। हम इसमें से प्राचीन नाम जम्बूद्वीप जिसे आज एशिया द्वीप कहते हैं तथा इन्दू सरोवरम् जिसे आज हिन्दू महासागर कहते हैंके निवासी हैं। इस जम्बूद्वीप (एशिया) के लगभग मध्य में हिमालय पर्वत स्थित है। हिमालय पर्वत में विश्व की सर्वाधिक ऊँची चोटी सागरमाथागौरीशंकर हैंजिसे 1835 में अंग्रेज शासकों ने एवरेस्ट नाम देकर इसकी प्राचीनता व पहचान को बदलने का कूटनीतिक षड्यंत्र रचा।

हम पृथ्वी पर जिस भू-भाग अर्थात् राष्ट्र के निवासी हैं उस भू-भाग का वर्णन अग्नि,वायु एवं विष्णु पुराण में लगभग समानार्थी श्लोक के रूप में है :-

उत्तरं यत् समुद्रस्यहिमाद्रश्चैव दक्षिणम्।

वर्ष तद् भारतं नामभारती यत्र संतति।।

अर्थात् हिन्द महासागर के उत्तर में तथा हिमालय पर्वत के दक्षिण में जो भू-भाग है उसे भारत कहते हैं और वहां के समाज को भारती या भारतीय के नाम से पहचानते हैं।

वर्तमान में भारत के निवासियों का पिछले सैकडों हजारों वर्षों से हिन्दू नाम भी प्रचलित है और हिन्दुओं के देश को हिन्दुस्तान कहते हैं। विश्व के अनेक देश इसे हिन्द व नागरिक को हिन्दी व हिन्दुस्तानी भी कहते हैं। बृहस्पति आगम में इसके लिए निम्न श्लोक उपलब्ध है :-

हिमालयं समारम्भ्य यावद् इन्दु सरोवरम।

तं देव निर्मित देशंहिन्दुस्थानं प्रचक्षते।।

अर्थात् हिमालय से लेकर इन्दु (हिन्द) महासागर तक देव पुरुषों द्वारा निर्मित इस भूगोल को हिन्दुस्तान कहते हैं। इन सब बातों से यह निश्चित हो जाता है कि भारतवर्ष और हिन्दुस्तान एक ही देश के नाम हैं तथा भारतीय और हिन्दू एक ही समाज के नाम हैं।

जब हम अपने देश (राष्ट्र) का विचार करते हैं तब अपने समाज में प्रचलित एक परम्परा रही हैजिसमें किसी भी शुभ कार्य पर संकल्प पढ़ा अर्थात् लिया जाता है। संकल्प स्वयं में महत्वपूर्ण संकेत करता है। संकल्प में काल की गणना एवं भूखण्ड का विस्तृत वर्णन करते हुएसंकल्प कर्ता कौन है इसकी पहचान अंकित करने की परम्परा है। उसके अनुसार संकल्प में भू-खण्ड की चर्चा करते हुए बोलते (दोहराते) हैं कि जम्बूद्वीपे (एशिया) भरतखण्डे (भारतवर्ष) यही शब्द प्रयोग होता है। सम्पूर्ण साहित्य में हमारे राष्ट्र की सीमाओं का उत्तर में हिमालय व दक्षिण में हिन्द महासागर का वर्णन हैपरन्तु पूर्व व पश्चिम का स्पष्ट वर्णन नहीं है। परंतु जब श्लोकों की गहराई में जाएं और भूगोल की पुस्तकों अर्थात् एटलस का अध्ययन करें तभी ध्यान में आ जाता है कि श्लोक में पूर्व व पश्चिम दिशा का वर्णन है। जब विश्व (पृथ्वी) का मानचित्र आँखों के सामने आता है तो पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है कि विश्व के भूगोल ग्रन्थों के अनुसार हिमालय के मध्य स्थल कैलाश मानसरोवर‘ से पूर्व की ओर जाएं तो वर्तमान का इण्डोनेशिया और पश्चिम की ओर जाएं तो वर्तमान में ईरान देश अर्थात् आर्यान प्रदेश हिमालय के अंतिम छोर हैं। हिमालय 5000 पर्वत श्रृंखलाओ तथा 6000 नदियों को अपने भीतर समेटे हुए इसी प्रकार से विश्व के सभी भूगोल ग्रन्थ (एटलस) के अनुसार जब हम श्रीलंका (सिंहलद्वीप अथवा सिलोन) या कन्याकुमारी से पूर्व व पश्चिम की ओर प्रस्थान करेंगे या दृष्टि (नजर) डालेंगे तो हिन्द (इन्दु) महासागर इण्डोनेशिया व आर्यान (ईरान) तक ही है। इन मिलन बिन्दुओं के पश्चात् ही दोनों ओर महासागर का नाम बदलता है।

इस प्रकार से हिमालयहिन्द महासागरआर्यान (ईरान) व इण्डोनेशिया के बीच के सम्पूर्ण भू-भाग को आर्यावर्त अथवा भारतवर्ष अथवा हिन्दुस्तान कहा जाता है। प्राचीन भारत की चर्चा अभी तक कीपरन्तु जब वर्तमान से 3000 वर्ष पूर्व तक के भारत की चर्चा करते हैं तब यह ध्यान में आता है कि पिछले 2500 वर्ष में जो भी आक्रांत यूनानी (रोमन ग्रीक) यवनहूणशककुषाणसिरयनपुर्तगालीफेंच,डचअरबतुर्कतातारमुगल व अंग्रेज आदि आए, इन सबका विश्व के सभी इतिहासकारों ने वर्णन किया। परन्तु सभी पुस्तकों में यह प्राप्त होता है कि आक्रान्ताओं ने भारतवर्ष परहिन्दुस्तान पर आक्रमण किया है। सम्भवत: ही कोई पुस्तक (ग्रन्थ) होगी जिसमें यह वर्णन मिलता हो कि इन आक्रमणकारियों ने अफगानिस्तान, (म्यांमार),श्रीलंका (सिंहलद्वीप)नेपालतिब्बत (त्रिविष्टप)भूटानपाकिस्तान,मालद्वीप या बांग्लादेश पर आक्रमण किया। यहां एक प्रश्न खड़ा होता है कि यह भू-प्रदेश कबकैसे गुलाम हुए और स्वतन्त्र हुए। प्राय: पाकिस्तान व बांग्लादेश निर्माण का इतिहास तो सभी जानते हैं। शेष इतिहास मिलता तो है परन्तु चर्चित नहीं है। सन 1947 में विशाल भारतवर्ष का पिछले 2500 वर्षों में 24वां विभाजन है। अंग्रेज का 350 वर्ष पूर्व के लगभग ईस्ट इण्डिया कम्पनी के रूप में व्यापारी बनकर भारत आनाफिर धीरे-धीरे शासक बनना और उसके पश्चात् सन 1857 से 1947 तक उनके द्वारा किया गया भारत का 7वां विभाजन है। आगे लेख में सातों विभाजन कब और क्यों किए गए इसका संक्षिप्त वर्णन है।

सन् 1857 में भारत का क्षेत्रफल 83 लाख वर्ग कि.मी. था। वर्तमान भारत का क्षेत्रफल 33 लाख वर्ग कि.मी. है। पड़ोसी 9 देशों का क्षेत्रफल 50 लाख वर्ग कि.मी. बनता है।

भारतीयों द्वारा सन् 1857 के अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े गए स्वतन्त्रता संग्राम (जिसे अंग्रेज ने गदर या बगावत कहा) से पूर्व एवं पश्चात् के परिदृश्य पर नजर दौडायेंगे तो ध्यान में आएगा कि ई. सन् 1800 अथवा उससे पूर्व के विश्व के देशों की सूची में वर्तमान भारत के चारों ओर जो आज देश माने जाते हैं उस समय देश नहीं थे। इनमें स्वतन्त्र राजसत्ताएं थीं,परन्तु सांस्कृतिक रूप में ये सभी भारतवर्ष के रूप में एक थे और एक-दूसरे के देश में आवागमन (व्यापारतीर्थ दर्शनरिश्तेपर्यटन आदि) पूर्ण रूप से बे-रोकटोक था। इन राज्यों के विद्वान् व लेखकों ने जो भी लिखा वह विदेशी यात्रियों ने लिखा ऐसा नहीं माना जाता है। इन सभी राज्यों की भाषाएं व बोलियों में अधिकांश शब्द संस्कृत के ही हैं। मान्यताएं व परम्पराएं भी समान हैं। खान-पानभाषा-बोलीवेशभूषा,संगीत-नृत्यपूजापाठपंथ सम्प्रदाय में विविधताएं होते हुए भी एकता के दर्शन होते थे और होते हैं। जैसे-जैसे इनमें से कुछ राज्यों में भारत इतर यानि विदेशी पंथ (मजहब-रिलीजन) आये तब अनेक संकट व सम्भ्रम निर्माण करने के प्रयास हुए।

सन 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम से पूर्व-मार्क्स द्वारा अर्थ प्रधान परन्तु आक्रामक व हिंसक विचार के रूप में मार्क्सवाद जिसे लेनिनवादमाओवादसाम्यवादकम्यूनिज्म शब्दों से भी पहचाना जाता हैयह अपने पांव अनेक देशों में पसार चुका था। वर्तमान रूस व चीन जो अपने चारों ओर के अनेक छोटे-बडे राज्यों को अपने में समाहित कर चुके थे या कर रहे थेवे कम्यूनिज्म के सबसे बडे व शक्तिशाली देश पहचाने जाते हैं। ये दोनों रूस और चीन विस्तारवादीसाम्राज्यवादीमानसिकता वाले ही देश हैं। अंग्रेज का भी उस समय लगभग आधी दुनिया पर राज्य माना जाता था और उसकी साम्राज्यवादी,विस्तारवादीहिंसक व कुटिलता स्पष्ट रूप से सामने थी।

अफगानिस्तान :- सन् 1834 में प्रकिया प्रारम्भ हुई और 26 मई, 1876 को रूसी व ब्रिटिश शासकों (भारत) के बीच गंडामक संधि के रूप में निर्णय हुआ और अफगानिस्तान नाम से एक बफर स्टेट अर्थात् राजनैतिक देश को दोनों ताकतों के बीच स्थापित किया गया। इससे अफगानिस्तान अर्थात् पठान भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम से अलग हो गए तथा दोनों ताकतों ने एक-दूसरे से अपनी रक्षा का मार्ग भी खोज लिया। परंतु इन दोनों पूंजीवादी व मार्क्सवादी ताकतों में अंदरूनी संघर्ष सदैव बना रहा कि अफगानिस्तान पर नियन्त्रण किसका हो अफगानिस्तान (उपगणस्तान) शैव व प्रकृति पूजक मत से बौद्ध मतावलम्बी और फिर विदेशी पंथ इस्लाम मतावलम्बी हो चुका था। बादशाह शाहजहाँशेरशाह सूरी व महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में उनके राज्य में कंधार (गंधार) आदि का स्पष्ट वर्णन मिलता है।

नेपाल :-मध्य हिमालय के 46 से अधिक छोटे-बडे राज्यों को संगठित कर पृथ्वी नारायण शाह नेपाल नाम से एक राज्य का सुगठन कर चुके थे। स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानियों ने इस क्षेत्र में अंग्रेजों के विरुद्ध लडते समय-समय पर शरण ली थी। अंग्रेज ने विचारपूर्वक 1904 में वर्तमान के बिहार स्थित सुगौली नामक स्थान पर उस समय के पहाड़ी राजाओं के नरेश से संधी कर नेपाल को एक स्वतन्त्र अस्तित्व प्रदान कर अपना रेजीडेंट बैठा दिया। इस प्रकार से नेपाल स्वतन्त्र राज्य होने पर भी अंग्रेज के अप्रत्यक्ष अधीन ही था। रेजीडेंट के बिना महाराजा को कुछ भी खरीदने तक की अनुमति नहीं थी। इस कारण राजा-महाराजाओं में जहां आन्तरिक तनाव थावहीं अंग्रेजी नियन्त्रण से कुछ में घोर बेचैनी भी थी। महाराजा त्रिभुवन सिंह ने 1953 में भारतीय सरकार को निवेदन किया था कि आप नेपाल को अन्य राज्यों की तरह भारत में मिलाएं। परन्तु सन 1955 में रूस द्वारा दो बार वीटो का उपयोग कर यह कहने के बावजूद कि नेपाल तो भारत का ही अंग हैभारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने पुरजोर वकालत कर नेपाल को स्वतन्त्र देश के रूप में यू.एन.ओ. में मान्यता दिलवाई। आज भी नेपाल व भारतीय एक-दूसरे के देश में विदेशी नहीं हैं और यह भी सत्य है कि नेपाल को वर्तमान भारत के साथ ही सन् 1947 में ही स्वतन्त्रता प्राप्त हुई। नेपाल 1947 में ही अंग्रेजी रेजीडेंसी से मुक्त हुआ।

भूटान :-सन 1906 में सिक्किम व भूटान जो कि वैदिक-बौद्ध मान्यताओं के मिले-जुले समाज के छोटे भू-भाग थे इन्हें स्वतन्त्रता संग्राम से लगकर अपने प्रत्यक्ष नियन्त्रण से रेजीडेंट के माध्यम से रखकर चीन के विस्तारवाद पर अंग्रेज ने नजर रखना प्रारम्भ किया। ये क्षेत्र(राज्य) भी स्वतन्त्रता सेनानियों एवं समय-समय पर हिन्दुस्तान के उत्तर दक्षिण व पश्चिम के भारतीय सिपाहियों व समाज के नाना प्रकार के विदेशी हमलावरों से युद्धों में पराजित होने पर शरणस्थली के रूप में काम आते थे। दूसरा ज्ञान (सत्यअहिंसाकरुणा) के उपासक वे क्षेत्र खनिज व वनस्पति की दृष्टि से महत्वपूर्ण थे। तीसरा यहां के जातीय जीवन को धीरे-धीरे मुख्य भारतीय (हिन्दू) धारा से अलग कर मतान्तरित किया जा सकेगा। हम जानते हैं कि सन 1836 में उत्तर भारत में चर्च ने अत्यधिक विस्तार कर नये आयामों की रचना कर डाली थी। सुदूर हिमालयवासियों में ईसाईयत जोर पकड़ रही थी।

तिब्बत :-सन 1914 में तिब्बत को केवल एक पार्टी मानते हुए चीनी साम्राज्यवादी सरकार व भारत के काफी बड़े भू-भाग पर कब्जा जमाए अंग्रेज शासकों के बीच एक समझौता हुआ। भारत और चीन के बीच तिब्बत को एक बफर स्टेट के रूप में मान्यता देते हुए हिमालय को विभाजित करने के लिए मैकमोहन रेखा निर्माण करने का निर्णय हुआ। हिमालय सदैव से ज्ञान-विज्ञान के शोध व चिन्तन का केंद्र रहा है। हिमालय को बांटना और तिब्बत व भारतीय को अलग करना यह षड्यंत्र रचा गया। चीनी और अंग्रेज शासकों ने एक-दूसरों के विस्तारवादी,साम्राज्यवादी मनसूबों को लगाम लगाने के लिए कूटनीतिक खेल खेला। अंग्रेज ईसाईयत हिमालय में कैसे अपने पांव जमायेगीयह सोच रहा था परन्तु समय ने कुछ ऐसी करवट ली कि प्रथम व द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् अंग्रेज को एशिया और विशेष रूप से भारत छोड़कर जाना पड़ा। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने समय की नाजकता को पहचानने में भूल कर दी और इसी कारण तिब्बत को सन 1949 से 1959 के बीच चीन हड़पने में सफल हो गया। पंचशील समझौते की समाप्ति के साथ ही अक्टूबर सन 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर हजारों वर्ग कि.मी. अक्साई चीन (लद्दाख यानि जम्मू-कश्मीर) व अरुणाचल आदि को कब्जे में कर लिया। तिब्बत को चीन का भू-भाग मानने का निर्णय पं. नेहरू (तत्कालीन प्रधानमंत्री) की भारी ऐतिहासिक भूल हुई। आज भी तिब्बत को चीन का भू-भाग मानना और चीन पर तिब्बत की निर्वासित सरकार से बात कर मामले को सुलझाने हेतु दबाव न डालना बड़ी कमजोरी व भूल है। नवम्बर 1962 में भारत के दोनों सदनों के संसद सदस्यों ने एकजुट होकर चीन से एक-एक इंच जमीन खाली करवाने का संकल्प लिया। आश्चर्य है भारतीय नेतृत्व (सभी दल) उस संकल्प को शायद भूल ही बैठा है। हिमालय परिवार नाम के आन्दोलन ने उस दिवस को मनाना प्रारम्भ किया है ताकि जनता नेताओं द्वारा लिए गए संकल्प को याद करवाएं।

श्रीलंका व म्यांमार :-अंग्रेज प्रथम महायुद्ध (1914 से 1919) जीतने में सफल तो हुए परन्तु भारतीय सैनिक शक्ति के आधार पर। धीरे-धीरे स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु क्रान्तिकारियों के रूप में भयानक ज्वाला अंग्रेज को भस्म करने लगी थी। सत्याग्रहस्वदेशी के मार्ग से आम जनता अंग्रेज के कुशासन के विरुद्ध खडी हो रही थी। द्वितीय महायुद्ध के बादल भी मण्डराने लगे थे। सन् 1935 व 1937 में ईसाई ताकतों को लगा कि उन्हें कभी भी भारत व एशिया से बोरिया-बिस्तर बांधना पड़ सकता है। उनकी अपनी स्थलीय शक्ति मजबूत नहीं है और न ही वे दूर से नभ व थल से वर्चस्व को बना सकते हैं। इसलिए जल मार्ग पर उनका कब्जा होना चाहिए तथा जल के किनारों पर भी उनके हितैषी राज्य होने चाहिए। समुद्र में अपना नौसैनिक बेड़ा बैठानेउसके समर्थक राज्य स्थापित करने तथा स्वतन्त्रता संग्राम से उन भू-भागों व समाजों को अलग करने हेतु सन 1965 में श्रीलंका व सन 1937 में म्यांमार को अलग राजनीतिक देश की मान्यता दी। ये दोनों देश इन्हीं वर्षों को अपना स्वतन्त्रता दिवस मानते हैं। म्यांमार व श्रीलंका का अलग अस्तित्व प्रदान करते ही मतान्तरण का पूरा ताना-बाना जो पहले तैयार था उसे अधिक विस्तार व सुदृढ़ता भी इन देशों में प्रदान की गई। ये दोनों देश वैदिकबौद्ध धार्मिक परम्पराओं को मानने वाले हैं। म्यांमार के अनेक स्थान विशेष रूप से रंगून का अंग्रेज द्वारा देशभक्त भारतीयों को कालेपानी की सजा देने के लिए जेल के रूप में भी उपयोग होता रहा है।

पाकिस्तानबांग्लादेश व मालद्वीप :-1905 का लॉर्ड कर्जन का बंग-भंग का खेल 1911 में बुरी तरह से विफल हो गया। परन्तु इस हिन्दु मुस्लिम एकता को तोड़ने हेतु अंग्रेज ने आगा खां के नेतृत्व में सन 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना कर मुस्लिम कौम का बीज बोया। पूर्वोत्तर भारत के अधिकांश जनजातीय जीवन को ईसाई के रूप में मतान्तरित किया जा रहा था। ईसाई बने भारतीयों को स्वतन्त्रता संग्राम से पूर्णत: अलग रखा गया। पूरे भारत में एक भी ईसाई सम्मेलन में स्वतन्त्रता के पक्ष में प्रस्ताव पारित नहीं हुआ। दूसरी ओर मुसलमान तुम एक अलग कौम होका बीज बोते हुए सन् 1940 में मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में पाकिस्तान की मांग खड़ी कर देश को नफरत की आग में झोंक दिया। अंग्रेजीयत के दो एजेण्ट क्रमश: पं. नेहरू व मो. अली जिन्ना दोनों ही घोर महत्वाकांक्षी व जिद्दी (कट्टर) स्वभाव के थे। अंग्रेजों ने इन दोनों का उपयोग गुलाम भारत के विभाजन हेतु किया। द्वितीय महायुद्ध में अंग्रेज बुरी तरह से आर्थिकराजनीतिक दृष्टि से इंग्लैण्ड में तथा अन्य देशों में टूट चुके थे। उन्हें लगता था कि अब वापस जाना ही पड़ेगा और अंग्रेजी साम्राज्य में कभी न अस्त होने वाला सूर्य अब अस्त भी हुआ करेगा। सम्पूर्ण भारत देशभक्ति के स्वरों के साथ सड़क पर आ चुका था। संघसुभाषसेना व समाज सब अपने-अपने ढंग से स्वतन्त्रता की अलख जगा रहे थे। सन 1948 तक प्रतीक्षा न करते हुए 3 जून, 1947 को अंग्रेज अधीन भारत के विभाजन व स्वतन्त्रता की घोषणा औपचारिक रूप से कर दी गयी। यहां यह बात ध्यान में रखने वाली है कि उस समय भी भारत की 562 ऐसी छोटी-बड़ी रियासतें (राज्य) थींजो अंग्रेज के अधीन नहीं थीं। इनमें से सात ने आज के पाकिस्तान में तथा 555 ने जम्मू-कश्मीर सहित आज के भारत में विलय किया। भयानक रक्तपात व जनसंख्या की अदला-बदली के बीच 14, 15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि में पश्चिम एवं पूर्व पाकिस्तान बनाकर अंग्रेज ने भारत का 7वां विभाजन कर डाला। आज ये दो भाग पाकिस्तान व बांग्लादेश के नाम से जाने जाते हैं। भारत के दक्षिण में सुदूर समुद्र में मालद्वीप (छोटे-छोटे टापुओं का समूह) सन 1947 में स्वतन्त्र देश बन गयाजिसकी चर्चा व जानकारी होना अत्यन्त महत्वपूर्ण व उपयोगी है। यह बिना किसी आन्दोलन व मांग के हुआ है।

भारत का वर्तमान परिदृश्य :-सन 1947 के पश्चात् फेंच के कब्जे से पाण्डिचेरी,पुर्तगीज के कब्जे से गोवा देव- दमन तथा अमेरिका के कब्जें में जाते हुए सिक्किम को मुक्त करवाया है। आज पाकिस्तान में पख्तूनबलूचसिंधीबाल्टीस्थानी (गिलगित मिलाकर)कश्मीरी मुजफ्फरावादी व मुहाजिर नाम से इस्लामाबाद (लाहौर) से आजादी के आन्दोलन चल रहे हैं। पाकिस्तान की 60 प्रतिशत से अधिक जमीन तथा 30 प्रतिशत से अधिक जनता पाकिस्तान से ही आजादी चाहती है। बांग्लादेश में बढ़ती जनसंख्या का विस्फोटचटग्राम आजादी आन्दोलन उसे जर्जर कर रहा है। शिया-सुन्नी फसादअहमदिया व वोहरा (खोजा-मल्कि) पर होते जुल्म मजहबी टकराव को बोल रहे हैं। हिन्दुओं की सुरक्षा तो खतरे में ही है। विश्वभर का एक भी मुस्लिम देश इन दोनों देशों के मुसलमानों से थोडी भी सहानुभूति नहीं रखता। अगर सहानुभूति होती तो क्या इन देशों के 3 करोड़ से अधिक मुस्लिम (विशेष रूप से बांग्लादेशीय) दर-दर भटकते। ये मुस्लिम देश अपने किसी भी सम्मेलन में इनकी मदद हेतु आपस में कुछ-कुछ लाख बांटकर सम्मानपूर्वक बसा सकने का निर्णय ले सकते थे। परन्तु कोई भी मुस्लिम देश आजतक बांग्लादेशी मुसलमान की मदद में आगे नहीं आया। इन घुसपैठियों के कारण भारतीय मुसलमान अधिकाधिक गरीब व पिछड़ते जा रहा है क्योंकि इनके विकास की योजनाओं पर खर्च होने वाले धन व नौकरियों पर ही तो घुसपैठियों का कब्जा होता जा रहा है। मानवतावादी वेष को धारण कराने वाले देशों में से भी कोई आगे नहीं आया कि इन घुसपैठियों यानि दरबदर होते नागरिकों को अपने यहां बसाता या अन्य किसी प्रकार की सहायता देता। इन दर-बदर होते नागरिकों के आई.एस.आई. के एजेण्ट बनकर काम करने के कारण ही भारत के करोडों मुस्लिमों को भी सन्देह के घेरे में खड़ा कर दिया है। आतंकवाद व माओवाद लगभग 200 समूहों के रूप में भारत व भारतीयों को डस रहे हैं। लाखों उजड़ चुके हैंहजारों विकलांग हैं और हजारों ही मारे जा चुके हैं। विदेशी ताकतें हथियारप्रशिक्षण व जेहादीमानसिकता देकर उन प्रदेश के लोगों के द्वारा वहां के ही लोगों को मरवा कर उन्हीं प्रदेशों को बर्बाद करवा रही हैं। इस विदेशी षड्यन्त्र को भी समझना आवश्यक है।

सांस्कृतिक व आर्थिक समूह की रचना आवश्य :-आवश्यकता है वर्तमान भारत व पड़ोसी भारतखण्डी देशों को एकजुट होकर शक्तिशाली बन खुशहाली अर्थात विकास के मार्ग में चलने की। इसलिए अंग्रेज अर्थात् ईसाईयत द्वारा रचे गये षड्यन्त्र को ये सभी देश (राज्य) समझें और साझा व्यापार व एक करन्सी निर्माण कर नए होते इस क्षेत्र के युग का सूत्रपात करें। इन देशों 10 का समूह बनाने से प्रत्येक देश का भय का वातावरण समाप्त हो जायेगा तथा प्रत्येक देश का प्रतिवर्ष के सैंकड़ों-हजारों-करोड़ों रुपये रक्षा व्यय के रूप में बचेंगे जो कि विकास पर खर्च किए जा सकेंगे। इससे सभी सुरक्षित रहेंगे व विकसित होंगे।

Thursday, 4 February 2021

सनातन धर्म सनातन संस्कृति

जब हम किसी मुस्लिम परिवार के पांच साल के बच्चे को भी बाक़ायदा नमाज़ पढ़ते देखो तो लगता है मुस्लिम परिवारों की ये अच्छी चीज़ है कि वो अपना धर्म और अपने संस्कार अपनी अगली पीढ़ी में ज़रूर देते हैं। कुछ पुचकार कर तो कुछ डराकर, लेकिन उनकी नींव में अपने मूल संस्कार गहरे घुसे होते हैं।

यही ख़ूबसूरती सिखों में भी है। सरदार को यदि पगड़ी या उसके केश आदि पर उंगली उठाते ही  उसी वक़्त तेज़ आवाज़ आप को रोक देगी।

लगभग हर धर्म में नियमों के पालन पर विशेष जोर दिया जाता है।

हिन्दू धर्म चाहें कितना ही अपने पुराने होने का दावा कर ले, पर इसका प्रभाव अब सिर्फ सरनेम तक सीमित होता जा रहा है।

 अक्सर एक माँ आरती कर रही होती है, उसका बेटा जल्दी में प्रसाद छोड़ जाता है, लड़का कूल-डूड है, उसे इतना ज्ञान है कि प्रसाद गैरज़रूरी है।

बेटी इसलिए प्रसाद नहीं खाती कि उसमें कैलोरीज़ ज़्यादा हैं, उसे अपनी फिगर की चिंता है।

छत पर खड़े अंकल जब सूर्य को जल चढ़ाते हैं तो लड़के हँसते हैं।

इस पर मां कहती हैं कि अरे! आज की जेनरेशन है माडर्न हो रही है। पिताजी खीज कर कहते हैं कि ये तो हैं ही ऐसे इनके मुंह कौन लगे!

दो वक़्त पूजा करने वाले को हम सहज ही मान लेते हैं कि वह दो नंबर का पैसा कमाता होगा, इसीलिए इतना पूजा-पाठ करता है। 
'राम-राम जपना, पराया माल अपना' ये तो फिल्मों में भी सुना है।

नतीजतन बच्चों का हवनपूजा के वक़्त हाज़िर होना मात्र दीपावली तक सीमित रह जाता है।

यही बच्चे जब अपने हम उम्रों को हर रविवार गुरुद्वारे में मत्था टेकते या हर शुक्रवार विधिवत नमाज़ पढ़ते या हर रविवार चर्च में मोमबत्ती जलाते देखते हैं, तो बहुत फेसिनेट होते हैं। सोचते हैं ये है असली गॉड! मम्मी तो यूं ही थाली घुमाती रहती थी।
अब क्योंकि धर्म बदलना तो पॉसिबल नहीं, इसलिए मन ही मन खुद को नास्तिक मान लेते हैं।

शायद हिन्दू अपने धर्म को अच्छे से प्रोमोट नहीं कर पाए।

शायद उन्हें कभी ज़रूरत नहीं महसूस हुई।

शायद आपसी वर्णों की मारा मारी में रीतिरिवाज और हवन पूजा पाठ आदि का महत्त्व हमें नजर नहीं आया !

वर्ना सूरज को जल चढ़ाना, सुबह जल्दी उठने की वजह ले आता है। हवन-पूजा करना नहाने का बहाना बन जाता है। और मंदिर घर में रखा हो तो घर साफ सुथरा रखने का कारण बना रहता है। भजन बजने से जो ध्वनि होती है वो मन शांत करने में मदद करती है। 

आरती गाने से कॉन्फिडेंस लेवल बढ़ता है। हनुमान चालीसा तो डर को भगाने और शक्ति संचार करने के लिए सर्वोत्तम है। सुबह हवन करके निकलो तो पूरा बदन महकता है, टीका लगा लो तो ललाट चमक उठता है। प्रसाद में मीठा खाना तो शुभ होता है। टीवी में एड नहीं देखते।

संस्कार घर से शुरु होते हैं। जब घर के बड़े ही आपको अपने संस्कारों के बारे में नहीं समझाते तो आप इधर-उधर भटकते ही हैं। इस भटकन में जब आपको कोई कुछ ग़लत समझा जाता हैं, तो आप भूल जाते हो कि आप उस सनातन सभ्यता का मज़ाक बना रहे हो, जिस पर आपका पूरा संसार टिका है, जिस पर आपके माता-पिता का विश्वास टिका है।

हमने कभी किसी धर्म का मज़ाक नहीं उड़ाया है, लेकिन किसी को भी इतनी छूट नहीं है कि हमारे सत्य सनातन वैदिक धर्म का मज़ाक बनाये।

हिन्दू होना अत्यंत गौरव का विषय है। हर वर्ग के मित्रों से अनुरोध है कि अपने बच्चों को कम से कम एक बार श्री मद्भागवत गीता अवश्य पढ़ाएं, रामायण के बारे में, महाभारत के बारे में बताएं या दूरदर्शन पर अवश्य दिखाएं।

हर हर गीता  घर घर गीता

याद रखें सनातन सिर्फ धर्म नहीं बल्कि एक सभ्यता संस्कृति है, सुबह उठने से लेकर रात्रि विश्राम तक अपने आप को सनातन परंपरा से जोड़ कर रखिये और उत्कृष्ट जीवन को प्रति क्षण महसूस कीजिये। संभवत: हम आखरी पीढ़ी हैं जो अपने धर्म को किसी तरह संभाले है यदि हम चूक गए तो हमारी संस्कृति को इतिहास होने में समय नहीं लगेगा।

Saturday, 7 November 2020

धर्म हित

चलो मान लिया मैं  नफरत फैलाता हूं तो आप किस भाईचारे के भ्रम में जी रहे हैं?
     मैं विदेशी मज़हब और देश-धर्म-समाज के दुश्मनों से न केवल नफरत करता हूं बल्कि बिना किसी आर्थिक लाभ के नफरत फैलाता भी हूं और मरते दम तक फैलाता रहूंगा क्योंकि यही मेरी मातृभूमि, धर्म, समाज के प्रति मेरी प्रतिबद्धता का आईना है।
     अगर यह कानून विरुद्ध है तो देश-धर्म-समाज के लिये इस लचर कानून को तोड़ना मेरे लिये वैसा ही है जैसा की क्रांतिकारियों के लिये अंग्रेजी कानून तोड़ना था।
     अगर आपको लगता है कि मेरी यह नफरत देश के विकास में बाधा है तो आप स्वयं विचार कीजिये कि आप किन दुश्मनों के बीच फंसते जा रहे हैं और उनके साथ भाईचारे से देश को भविष्य में इस्लामिक बनाने से कहीं बेहतर है आज की आपकी नफरत!
     उस विदेशी अरबी मज़हब के प्रति मेरी नफरत है जिसका ध्येय वाक्य है 'दारुल इस्लाम' क्योंकि हमारा ध्येय वाक्य है 'सर्वधर्म सम्भाव' और इन दोनों विचारधाराओं का मेल असंभव है।
     मैं किसी ऐसे विदेशी मज़हब का यहां स्वागत कैसे कर सकता हूं जो मेरे धर्म का उनके यहां स्वागत नहीं करता और जिसका यहां आगमन प्रेम के संदेश से नहीं बल्कि तलवार के संदेश से हुआ हो! (712 ई. मोहम्मद बिन कासिम)
     जो क़ुरआन गैर-मज़हबियों को बुरा बल्कि वाजेबुल कत्ल तक कहती हो, मैं उस क़ुरआन को मानने वाले मज़हबियों को अच्छा कैसे कहूं?
     हां मैं नफरत करता हूं उन मुसलमानों से जो हिंदुस्तान के कन्वर्टेड हिंदुओं को 'अल-हिंद-मस्कीन' कहकर जलील करते हैं यानि मेरी नफरत रैबीज़ और उस रैबीज़ग्रस्थ भेड़िये से है जिसने मेरे डॉगी को काटा पर मेरी नफरत मेरे डॉगी से नहीं है।
     जब हम अंग्रेजों के शासन को उखाड़ फैंकने की क्षमता सिद्ध कर चुके हैं तो हम 'गजवा-ए-हिंद' को भी उखाड़ फेंकने की क्षमता रखते हैं यानि अगर इस्लाम गजवा-ए-हिंद तक भी पहुंच गया तो भी इस सनातन भूमि पर उसका अंत निश्चित है।
     जो देश आज अखंड नहीं और अलग हो चुके खंडों में हिंदू सुरक्षित नहीं तो अब कैसा और किससे भाईचारा?
     जो आपकी लड़की ले तो सकता है पर दे नहीं सकता उससे कैसा भाईचारा?
     जो आपको अपने मज़हब में शामिल करने के लिए हर प्रपंच कर सकता है पर उसका मज़हब छोड़ने वाले का कत्ल करने के लिये उसे ढूंढता है उससे कैसा भाईचारा?
     जो आपके हिंदू बहुल इलाके में आराम से रह सकता है पर उसके बहुल यानि कश्मीर घाटी में आपको नहीं रहने दे सकता उससे कैसा भाईचारा?
     जो आपके मंदिर, गुरुद्वारे के प्रांगण में नमाज पढ़ सकता है पर उसकी मस्जिद में आपको भजन-कीर्तन की अनुमती नहीं दे सकता उससे कैसा भाईचारा?
     जो आपके शासन में हज़ के लिये सब्सिडी लेता रहा पर उसके शासन में आपसे जजिया कर लेता रहा उससे कैसा भाईचारा?
     जो दिन में 5 बार आप ही पर अजाब डालने की अल्लाह से दुआ करता हो उससे कैसा भाईचारा?
     जो सनातनियों की इस भूमि पर शरिया लॉ, गजवा-ए-हिंद, निजाम-ए-मुस्तफा और दारुल इस्लाम की बात करता हो उससे कैसा भाईचारा?
     जिनका एक भी आदर्श यहां की सभ्यता-संस्कृति का कायल नहीं हो उनसे कैसा भाईचारा?
     जो आपके बहुसंख्यक होने पर आपको भाई कहते हों पर उनके बहुसंख्यक होने पर आपको काफिर कहते हों उनसे कैसा भाईचारा?
     जिनका आज तक का एक-एक वोट देश नहीं कौम की खातिर गया हो उनसे कैसा भाईचारा?😡😡
     भाईचारे से हुए हर नुकसान की भरपाई अब केवल नफरत की शुरुआत से ही संभव है,🙏🙏🚩🚩