Wednesday, 20 December 2017

स्तिथियाँ तब भी खराब थी और अब भी....

नमस्ते जी सभी को.....

          तब भी हिन्दू एक नही थे आज भी हिन्दू एक नही है...सोचने की बात है हम पद्मावती के जौहर के लिए लड़ रहे हैं....हम सब जौहर को हिन्दुओ की महानता से ,बलिदान से जोड़ते हैं,यह होना भी चाहिए...क्योंकि हमारे पूर्वजों ने कभी अधर्मियों से हार नही मानी, सामने हार निश्चित हो तब भी लड़ते हुए मरे(कुछ गद्दार हर जगह होते हैं,उनका हम विरोध करते हैं)....राजा रत्न सिंह ने भी यही किया...सामने इतनी बड़ी सेना थी फिर भी लड़ते हुए मरना अच्छा समझा...रानी पद्मावती ने परिस्थितयों के अनुसार जौहर करना उचित समझा....उन्होंने किया...

          पर सोचने वाली बात यह है कि उनकी जौहर करने की परिस्तिथियाँ बनी क्यों...?हमारी माताओं को जौहर जैसा बलिदान करना पड़ा उसका कारण क्या था...?पहले तो यदि आप जौहर शब्द को छोटी मोटी चीज लगा रहे हो तो इस शब्द के महत्व को समझने के लिए अपनी ऊँगली किसी जलते हुए दीपक के ऊपर करो ,फिर आप इस पोस्ट को सही से समझ पाएंगे....एक नारी जौहर ख़ुशी से नही करती,जलने के बारे में सिर्फ सोचना ही रोंगटे खड़े कर देता है....आप क्या सोचते हैं एक नारी जलने का फैसला ऐसे ही ले लेती है...जलने से पहले उन 16000 माताओं ने क्या इधर उधर नजर दौड़ाकर अपने पुत्रों,भाइयों को अपनी रक्षा के लिए नही खोजा होगा...क्या उन्होंने नही खोजा होगा अपने रक्षको को अपनी रक्षा के लिए...हमारी संस्कृति में प्रत्येक नारी को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है...स्त्री की इज्जत मर्द की जान से ज्यादा महत्व रखती है,यह बताया जाता है...औरतों को ऐसा जताया जाता है कि आप की रक्षा हम मर्दों की जिम्मेदारी है,तो क्या उन माताओं ने नही ढूंढा होगा उन जिम्मेदार लोगों को अपनी जिम्मेवारी निभाने के लिए...पर जब उन्हें कोई चारा नही दिखा होगा अपनी रक्षा का ,तब उन्होंने जौहर किया था....

         क्या उस समय भारत में और क्षत्रिय नही थे जो उन माताओ की रक्षा कर सकें...?राजा रत्न सिंह और उनकी सेना युद्ध में मारी गई,पर क्या इस देश में एक रत्न सिंह ही राजा थे,और कोई राजा नही था क्या...?क्या पद्मिनी उन राजाओं की कुछ नही लगती थी क्या....?लगती थी.. पर जो भी कारण रहे हो उस समय किसी और राजा ने पद्मिनी की रक्षा नही की....और नतीजा यह रहा कि उन्हें जौहर करना पड़ा....अब विचारकर बताइये कि जौहर हमारे स्वाभिमान का प्रतीक ज्यादा है या हमारी आपसी फुट का...?बल्कि कठोर शब्दों में अगर यह बात कहनी हो तो मैं कहूंगा कि जौहर हमारी नपुंसकता का प्रतीक था ,हम आपस में इतना लड़ते थे कि हम अपनी माताओं ,बहनों की रक्षा तक करने में असमर्थ हो गए थे....

         आज तो ज्यादातर हिन्दू समाज सोशल मीडिया पर सक्रीय है.....एक जगह कोई घटना घटती है तो कुछ ही समय में वो खबर पुरे भारत में पता चल जाती है,पर आज भी हम एक नही हो पा रहे...!आज भी फेसबुक पर बहुत से लोगों को देखता हूँ जो अपनी अपनी जातियों का झंडा उठाये रहते हैं...स्वयं को बहुत बड़ा राष्ट्रभक्त कहते हैं पर पद्मावती विषय पर इक्कट्ठी हो रही हिन्दू कौम पर तंज कसने से पीछे नही हटते....हे पढ़े लिखे आधुनिक देशभक्तो इतिहास सीख लेने के लिए होता है,इतिहास से सबक लो,और इक्कट्ठा हो जाने दो इस सोई हुई कौम को...कहीं यह न हो कि हम फिर से इतना बंट जाएँ कि कल फिर उसी कौम के दुष्ट लोगों के कारण हमारी माताओं ,बहनों को जौहर व्रत लेना पड़े और हम इन तथाकथित जातियों में बंटे हुए दूर खड़े देखते रहें...और सच मानिये जिस दिन वह कौम एक तय प्रतिशत से ज्यादा यहाँ हो गई उस दिन कोई संविधान,कोई कानून आपकी व आपकी नारियों की रक्षा नही करेगा और उन अभागी माताओं ,बहनों के सामने जौहर या आत्मसमर्पण के अलावा और कोई विकल्प नही होगा.....समय है ,संभल जाओ...
         और हाँ ,मैं जौहर को अपना सम्मान नही मानता अपितु उसे अपनी छाती में गड़ा हुआ अपमान का शूल मानता हूँ....और इसीलिए चाहता हूँ कि यह जाति पाति का बंधन टूटे और हम एक होकर धर्म की रक्षा के लिए लड़ें ताकि कल किसी माँ बहन को हमारी कमजोरी के कारण जौहर न करना पड़े....
क्या कारण रहा कि हम खण्ड खण्ड में बंटे पड़े हैं ? क्यों  हमारे हाथ अपनों की रक्षार्थ नहीं उठ पाते ? क्यों अपनों के ही विनाश में हम प्रसन्न होते हैं ? क्या  कारण है इन सब विघटनकारी तत्त्वों का ?
        धन्यवाद...!

@nitinmudgal_ Twitter Handel 

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