Monday, 19 February 2018

सनातन धर्म की परिभाषा
सनातन ही सत्य है सनातन ही सास्वत है सनातन ही सद्मार्ग है सनातन ही मोक्ष है सनातन ही आदि है और सनातन ही अंत भी है मित्रों जो इंसान अपने धर्म को छोड़ता है धर्म उसे छोड़ देता है भगवान् कृष्ण ने गीता में कहा भी है अपने धर्म की मृत्यु से दूसरे धर्म का जीवन भी भयावह होता है ईश्वर हमारे पिता हैं तो शास्त्र हमारी माता है हम आकाश के तारों को देख कर आकर्षित तो होते हैं लेकिन अपने कदमो में पड़े हुए फूलों की तरफ हमारी नजर भी नहीं जाती जबकि ये फूल सहज प्राप्य हैं क्या नहीं है हिन्दू सनातन धर्म में शास्त्र संहिताएं स्मृतियां उपनिसद वेद ग्रन्थ महाकाव्य पुराण अगर कोई एक को भी पढ़ ले उसका जीवन कृतार्थ हो जाय आज हम उत्सव नहीं मनाते हैं भाइयों आज उत्सव के नाम पर आडंबर करते हैं उत्सव तो वो होता है क्या निर्धन और क्या धनिक जो समान रूप से इस पर्व में शामिल हो जो घोर से घोर वेदना का क्षय करके मानव के शरीर को ही नहीं आत्मा को भी तरंगित और आनंदित कर दे वो होता है उत्सव और ये हिन्दू सनातन धर्म में सहज प्राप्त है हिन्दू सनातन धर्म एक धर्म नहीं ईश्वर द्वारा रचित एक सभ्यता एक समुद्र है जैसे सारी नदियों का जल आकर समुद्र में विलीन हो जाता है ऐसा ही है हिन्दू सनातन धर्म यही जीवन का उद्गम भी है यही जीवन का अंत भी इसलिए मित्रों ये उस वृक्ष के मूल के समान है जो दिखाई तो नहीं देती लेकिन अस्तित्व का आधार है बस इतना जान लीजिए मूल खतम तो अस्तित्व भी ख़त्म मूल ही हमारी पहचान है इसे मत छोड़िये भगवान् कृष्ण ने भगवत गीता में प्रतिज्ञा ली है तू मेरा नाम लेकर प्रारम्भ तो कर परिणाम तक तो मैं वासुदेव कृष्ण पहुंचा दूंगा तुझे अब क्या लोगे साक्षात ब्रम्ह ने अस्वासन दे रखा है मृगतृष्णा में नहीं यतार्थ में जियें हिन्दू सनातन धर्म ही यतार्थ है।  ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

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