सभी अवश्य पढ़ें। प्रेम क्या है प्रेम ? जो आज कल के बच्चे कर रहे है उसे कहेंगे क्या प्रेम? ये लोग प्रेम को भी कपड़ो की तरह बदलते रहते है, आज ये है कल वो है परसो कोई और है। नही इसे तो प्रेम नही कह सकते। इसे वासना,शारीरिक आकर्षण तो कह सकते है पर प्रेम नही कह सकते है, क्योकि प्रेम का सम्बन्ध शरीर से न हो कर ह्रदय से होता है।वास्तव में प्रेम के प्रतीक भी लोगो को गलत बताये गए है, युवाओ को बताया जाता है ताजमहल प्रेम की निशानी है, बिल्कुल झूठ। मुमताज न तो शाहजंहा की पहली पत्नी थी और न ही आखरी, इसके अतिरिक्त उसके हरम में हजारों महिलाये थी वो जब चाहता किसी के साथ सम्बन्ध बनाता तो इसमे प्रेम कहा हुआ ये तो वासना है। प्रेम था तो मर्यादा परुषोतम श्री राम और माता सीता के बीच मे, जहाँ मेरे आदर्श श्री राम ने अपनी पत्नी की रक्षा के लिए समुंदर पर पूल बना दिया और असुरों का उनके कुल सहित नाश कर दिया, और एक विशेष बात श्री राम जी 14 वर्ष तक वनों में रहे पर उन्होंने कभी सीता जी के साथ शारीरिक सम्बन्ध नही बनाये, यदि श्री राम जी चाहते तो उनका दूसरा विवाह भी हो जाता पर नही उन्हें सीता जी से प्रेम था इसलिए वन के लोगो को एकत्रित कर युद्ध करने चल दिये, पर आज कल मैने क्या देखा कि लड़के के सामने ही उसकी प्रेमिका को दूसरे लोग छेड़ देते है और वो लड़का चुप चाप सुनता रहता है यदि उनमे सच मे प्रेम होता तो वो चुप चाप नही सुनेगा। या एक दूसरे पर कोई कष्ट आता है तो साथ छोड़ देते है एक दूसरे के लिए त्याग करना तो बहुत दूर की बात है आज कल के तथाकथित प्रेमी बच्चो के लिये। प्रेम में स्वयं की बजाए व्यक्ति अपने साथी के हित को प्राथमिकता देते है पर आज कल तो स्वार्थ,सेक्स,पैसो का खेल है सब। पश्चमी संस्कृति तो आपको वासना सीखा सकती है, पर सच्चा प्रेम आपको वैदिकधर्म को मानने वाले लोग ही दे सकते है, जहाँ वे अपने प्राणों की भी प्रवाह नही करते अपने साथी के लिए। भोगवाद को छोड़ो, ह्रदय से नाता जोड़ो, किसी को धोखा मत दो, यही आर्य संस्कृति है।
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