Monday, 23 September 2019

          सच की मजबूरी नहीं होती कि वो सबको कुछ खुश करता फिरे!

ट्रम्प ने Radical Islamic Terrorism से लड़ने की बात बोलने के बाद लंबा Pause दिया। उनके इस Pause के बाद भीड़ ने भी खड़े होकर तालियां बजाईं। मोदी सहित वहां मौजूद बाकी भारतीय अधिकारी भी खड़े हो गए। ट्रम्प ने Pause इसलिए दिया क्योंकि वो अपनी बात का असर देखना चाहते थे। Pause देकर वो एक ख़ास संदेश देना चाहते थे। Pause देकर उन्होंने ये भी जता दिया कि आखिर मैंने वो बोल दिया जो बहुत से लोग बोलने से बचते हैं। 

राष्ट्रपति बनने से तकरीबन 30 साल पहले ट्रम्प से एक इंटरव्यू में पूछा गया था कि आपको क्यों लगता है कि आप देश के राष्ट्रपति बन सकते हैं, तो उनका जवाब था, क्योंकि मैं Politically Incorrect हूं। मतलब मैं हमेशा वो बात नहीं बोलता जो 'आदर्श रूप' में बोलनी जानी चाहिए, बल्कि मैं वो बोलता हूं जिसे लोग सच मानते हैं, मगर मुख्यधारा (राजनीति और मीडिया) जिसके बारे में कभी बात नहीं करती। ट्रम्प के ये तेवर ही आज उनकी सबसे बड़ी ताकत हैं। इन्हीं तेवरों ने उन्हें अमेरिका का राष्ट्रपति बनाया। 

मगर भारत में सच को सच बोलना तो दूर इतने सालों तक हम उसे सच मानने को ही तैयार नहीं थे। उस मुख्यधारा ने कभी माना ही नहीं आतंकवाद को कोई धर्म हो सकता है। किसी खास तरह की मानसिकता आतंकवाद को बढ़ावा दे सकती है। और मोदी की जिस राजनीति को आज भी देश का एक वर्ग (राजनीति और वामपंथी मीडिया) गलत मानती है वो इसलिए लोकप्रिय हुई, क्योंकि उसने उस झूठ को सच मानने से इंकार कर दिया। 

उन्होंने ट्रम्प की तरह खुले शब्दों में भले न बोला हो लेकिन उसकी तरफ इशारा ज़रूर कर दिया। वो इशारा जिसे बहुत से लोग साम्प्रदायिक राजनीति कहते हैं। क्योंकि उनके हिसाब से जो धर्मनिरपेक्ष राजनीति है उसमें किसी को बुरा नहीं कहा जाता। हमेशा यही बोला जाता है कि सभी अच्छे हैं। हज़ारों सालों से गंगा-जमनी तहज़ीब है, कोई भी धर्म नफरत नहीं सिखाता, जैसी मीठी-मीठी बातें बोली जाती हैं। उन्हें लगता है कि किसी को भी ऐसा सच बोलने से परहेज़ करना चाहिए या उसे इग्नोर करना चाहिए जिससे कोई खास पक्ष शर्मिंदा हो। भले उसने उस शर्मिंदगी से बचने के लिए आज तक कुछ भी क्यों न किया हो। 

यही वो सोच है जो मानती है कि धर्मनिपरेक्षा की रक्षा में आप बहुसंख्यक को कुछ भी कह सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे गली के झगड़े में कोई महिला झूठा बड़प्पन दिखाने के लिए हर बार अपने ही बच्चे को डांट देती हो। महिला को लगता है कि उसके ऐसा करने से लगेगा कि देखा, वो बाकी माओं की तरह नहीं है। लोगों के ऐसा सोचने से महिला को सम्मान मिलेगा। और अगर वो कभी अपने बच्चे को सच मानकर उसका पक्ष लेगी तो लोग उसे भी बाकी महिलाओं की तरह आम और झगड़ालू मान लेंगे। 

महिला की तरह सम्मान की उस भूख ने कई सालों तक इस देश के मीडिया और राजनीतिक वो वैसा ही मक्कार बना दिया था। मगर देश की जनता उस बच्चे जितनी बदनसीब नहीं थी। बच्चा मां नहीं बदल सकता मगर जनता सत्ता बदल सकती है। जब वो जनता हद से ज़्यादा मजबूर हो गई। उसे विकल्प मिला, तो उसने सत्ता बदल दी। ये वो जनता थी जिसके अंदर सालों से पीड़ित होने के बावजूद छले जाने की पीड़ा थी। खुद को अकेला महसूस करने का दर्द था।

एक नेता को सफल या महान बनने के लिए कई पैमानों पर कामयाब होना पड़ता है। मोदी कई पैमानों पर खरे उतरे हैं और कईयों पर फेल भी हुए हैं। मगर ये एक पैमाना ऐसा है जिस पर बिना किसी शक ओ शुबाह के वो बेहद कामयाब हैं। उनके आने से उस पीड़ित जानता को तसल्ली मिली है। भले ही उनको पसंद न करने वाले लोग डिनायल मोड में जीते रहें मगर वो हर बदलते दिन के साथ ज्यादा लोकप्रिय और मज़बूत होते जा रहे हैं। 

वो मज़बूत हो रहे हैं क्योंकि आडवाणी की तरह उन्होंने कभी परवाह नहीं की कि मुझे भी Politically Correct होना है। जिन्ना को सबसे बड़ा देशभक्त बताकर कोई मिडिल पाथ चुनना है। क्योंकि उन्होंने माना, सच हमेशा लोकप्रिय नहीं होता। वो हमेशा बड़प्पन लिए नहीं आता। वो हमेशा मुंह का मीठा नहीं होता। सच हमेशा सच होता है और उसकी ऐसी कोई मजबूरी नहीं कि वो हर किसी को खुश करता फिरे।


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