आज प्रश्न उठ रहा है कि बेटी अपने माता-पिता की देखभाल क्यों नहीं कर सकती?उसे भी पूरा अधिकार है। एक प्रश्न यह उठता है कि पैतृक संपत्ति में बेटी का अधिकार क्यों नहीं?
कुछ यह भी कहते है कि बेटे-बेटी को समान रूप से पालन -पोषण नहीं किया जाता।
कुछ यह भी कहते है कि बेटे-बेटी को समान रूप से पालन -पोषण नहीं किया जाता।
तो इन सभी प्रश्नों व समस्या का मूल जड़ एक ही है कि हमने हमारी सनातन परंपरा को छोड़ दिया।जो सामाजिक व्यवस्था हमारे प्राचीन पंरपरा में थी उसे छिन्न-भिन्न कर दिया है ।हमारे प्राचीन युग में समाज में अपनी योग्यता के अनुसार सभी को शिक्षा प्राप्त होती थी लड़कियों को भी पूरी शिक्षा दी जाती थी जिससे वो अपनी संतान को उचित संस्कार दे सके।पुरुष शारीरिक रूप से शक्तिशाली होते थे तो उनको उसी तरह शिक्षा मिलती थी उनका दायित्व बाहर जाकर धनोपार्जन करना होता या युद्ध करना होता था।किन्तु शिक्षा सभी को मिलती थी।सबकी अपनी-अपनी जगह थी अपना- अपना महत्व था।कोई किसी की बराबरी का अर्थ नहीं था।जो गुण स्त्री में है वो पुरुष में नहीं जो पुरुष में गुण है वो स्त्री में नहीं।इसलिए कन्या जन्म पर कोई शोक नहीं होता था और पुत्र होने पर कोई विशेष उत्सव की बात नहीं ,कोई भी हो सन्तान होने पर खुशी मनाई जाती थी इसलिए भ्रूण हत्या जैसा महापाप नहीं होता था।
कालांतर में बाहरी आक्रांताओ की वजह से स्त्रीयों पर संकट बढने लगा ,तो उन्हें घर में छुपा कर व पर्दे में रखा जाने लगा।
धीरे-धीरे इस प्रकार स्त्री कमजोर होती गई और यह कुरीति बन गई ।स्त्री दोयम दर्जे का प्राणी बन कर रह गई ।स्त्री का महत्व घटने लगा परिवार में कन्या पैदा होना बोझ समझा जाने लगा।उसकी शिक्षा में कमी आ गई तो वो अपनी संतान को क्या संस्कार दे इस वजह से समाज में विकृति आती गई ।
जिसका परिणाम आज तक भुगत रहा है समाज।मानसिक विकृति अपने चरम पर होती गई ।
उसके बाद स्त्री उद्धार के आंदोलन चले जिसमें स्त्रियों को शिक्षा व स्वतंत्रता देने के कार्यक्रम चले।जिसमें जो उचित शिक्षा देनी चाहिए थी वो देने के बजाय विदेशी आयातित शिक्षा दी जाने लगी।जिससे समाज में उत्थान होने के बदले पतन ही हुआ। स्त्रीयों का जीवन तो काफी हद तक सुधरने लगा किन्तु जो शिक्षा मिलनी चाहिए थी वो नहीं मिली यहां पुरूषों से होड़ लगाती सी दिखने लगी स्त्री।उसका स्त्रैण खोने लगा वो स्त्री के शरीर में पुरूष बनने लगी। इससे सामाजिक, पारिवारिक मान्यताए और भी विकट होने लगी।यहां अहम टकराने लगे।परिवार में जो भूमिका स्त्री की होनी चाहिए वो नहीं रही ।माता-पिता भी समानता रखते हुए लड़के-लड़की को एक ही तरह की शिक्षा देने लगे, जबकि जरूरत अलग-अलग होती है।
अब बताए-जब हर किसी की लड़की अपने ही माता-पिता की देखभाल करने लगेगी तो फिर वह अपने परिवार को किस तरह देखेगी?फिर विवाह करने का क्या औचित्य? ऐसा तो नहीं कि विवाह के बाद दामाद सहित घर बैठालो इस तरह तो पूरी श्रंखला ही बिगड़ जायेगी।
कालांतर में बाहरी आक्रांताओ की वजह से स्त्रीयों पर संकट बढने लगा ,तो उन्हें घर में छुपा कर व पर्दे में रखा जाने लगा।
धीरे-धीरे इस प्रकार स्त्री कमजोर होती गई और यह कुरीति बन गई ।स्त्री दोयम दर्जे का प्राणी बन कर रह गई ।स्त्री का महत्व घटने लगा परिवार में कन्या पैदा होना बोझ समझा जाने लगा।उसकी शिक्षा में कमी आ गई तो वो अपनी संतान को क्या संस्कार दे इस वजह से समाज में विकृति आती गई ।
जिसका परिणाम आज तक भुगत रहा है समाज।मानसिक विकृति अपने चरम पर होती गई ।
उसके बाद स्त्री उद्धार के आंदोलन चले जिसमें स्त्रियों को शिक्षा व स्वतंत्रता देने के कार्यक्रम चले।जिसमें जो उचित शिक्षा देनी चाहिए थी वो देने के बजाय विदेशी आयातित शिक्षा दी जाने लगी।जिससे समाज में उत्थान होने के बदले पतन ही हुआ। स्त्रीयों का जीवन तो काफी हद तक सुधरने लगा किन्तु जो शिक्षा मिलनी चाहिए थी वो नहीं मिली यहां पुरूषों से होड़ लगाती सी दिखने लगी स्त्री।उसका स्त्रैण खोने लगा वो स्त्री के शरीर में पुरूष बनने लगी। इससे सामाजिक, पारिवारिक मान्यताए और भी विकट होने लगी।यहां अहम टकराने लगे।परिवार में जो भूमिका स्त्री की होनी चाहिए वो नहीं रही ।माता-पिता भी समानता रखते हुए लड़के-लड़की को एक ही तरह की शिक्षा देने लगे, जबकि जरूरत अलग-अलग होती है।
अब बताए-जब हर किसी की लड़की अपने ही माता-पिता की देखभाल करने लगेगी तो फिर वह अपने परिवार को किस तरह देखेगी?फिर विवाह करने का क्या औचित्य? ऐसा तो नहीं कि विवाह के बाद दामाद सहित घर बैठालो इस तरह तो पूरी श्रंखला ही बिगड़ जायेगी।
अब कोई कहता है जिनके बेटा हो ही नहीं केवल बेटियां ही हो तो ?इस प्रश्न में बहनें आपस में तय कर सकती है जिसकी जिम्मेदारी कम है वो संभाल सकती है एक बात तो यह है दूसरी कि एकाकी परिवारों के चलते एक दूसरे से व्यवहार रखते नहीं है लोग, वरना पहले भाई-बंधु के परिवार आपस में ही सब देख लेते थे।तात्पर्य यह कि यदि सभी की बेटियां घर छोड़- छोड़ कर अपने ही माता-पिता की देखभाल करने दौड़ेगी तो व्यवस्था ही बिगड़ जायेगी,परिवारों में कलह बढेगा। वैसे भी आजकल हर छोटी बात पर झगड़े होते है और सम्बन्ध विच्छेद होते देखे गये है।मैं यह नहीं कहती कि बिल्कुल आप अपने माता-पिता को देख ही नहीं सकते समय के साथ कुछ सामंजस्य कर सकते है किन्तु समाजिक स्तर पर अधिकार की बात मुझे ठिक नहीं लगती ।https://m.facebook.com/mudgalboynitin?_e_pi_=7%2CPAGE_ID10%2C9859396879इसी प्रकार सम्पत्ति के अधिकार की बात में भी संशोधन की आवश्यकता है जब लड़की एकदम असहाय व उसके लिए भरण-पोषण की भी व्यवस्था नहीं है तो अधिकार हो सकता है वरना सभी को अपने-अपने ससुराल व पति की सम्पत्ति में ही अधिकार होना चाहिए जिससे भाई-भाभी से जीवन भर मधुर संबंध बने रहें नहीं तो धन को लेकर रिश्ते बिगड़ते है और अमूल्य रिश्तों को संभालना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
इस तरह हमारी मूल परंपराओं व मूल शिक्षा को अपनाना आज बहुत जरूरी है तभी समाज में सुधार हो सकता है नहीं तो हर रोज एक नयी समस्या जन्म लेती रहेगी और हम इसी प्रकार अपने-अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहेंगे।
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